यूपी में धान की खेती लाखों किसानों की रोज़ी-रोटी का बड़ा जरिया है और राज्य में यह फसल बड़े रकबे में बोई जाती है। बिजाई से लेकर रोपाई तक का काम किसानों को ज्यादा नहीं उलझाता, मगर असली परीक्षा रोपाई खत्म होने के बाद शुरू होती है, जब पौधों की सही देखभाल जरूरी हो जाती है। सही समय पर खाद और पानी न मिलने पर धान के पौधे ठीक से नहीं बढ़ पाते और आखिर में पैदावार में सीधी गिरावट आ जाती है, जिसका सीधा असर किसानों की जेब पर पड़ता है।
रोपाई के बाद कहां अटकते हैं किसान
धान की रोपाई पूरी होते ही किसानों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा होता है कि फसल की देखभाल कैसे करें। ज्यादातर किसानों को यह अंदाजा नहीं लग पाता कि पौधों को किस मोड़ पर खाद चाहिए और किस मोड़ पर सिर्फ पानी की जरूरत है। यही उलझन कई बार बरसों की मेहनत पर पानी फेर देती है, क्योंकि गलत समय पर डाली गई खाद या जरूरत से ज्यादा भरा पानी पौधों की जड़ों और बढ़वार दोनों को नुकसान पहुंचा सकता है।
50 साल के अनुभव से निकली सीख
बहराइच जिले के एक छोटे से गांव टिकुरी में रहने वाले किसान सुरेंद्र सिंह के पास इस उलझन को सुलझाने के लिए ठोस जवाब हैं। सुरेंद्र सिंह कोई नए किसान नहीं हैं, बल्कि पिछले करीब 50 सालों से लगातार धान की उन्नत खेती कर रहे हैं। पांच दशकों के इस अनुभव के आधार पर वह बताते हैं कि रोपाई के शुरुआती दिन सबसे नाजुक होते हैं, क्योंकि इसी दौर में पौधों की जड़ें जमीन में मजबूती से पकड़ बनाती हैं और कल्ले फूटना शुरू होते हैं। इस समय जरा सी लापरवाही सीधे उत्पादन पर असर डाल सकती है, इसलिए विशेष सावधानी बरतने की जरूरत होती है।
खाद के इस्तेमाल में जल्दबाजी बड़ी भूल
सुरेंद्र सिंह की सलाह है कि धान की फसल में अंधाधुंध खाद डालने से हमेशा बचना चाहिए। जब रोपाई के बाद पौधे मिट्टी में अच्छी तरह पकड़ बना लें, तभी नाइट्रोजन और दूसरे जरूरी पोषक तत्व संतुलित मात्रा में देने चाहिए। उनके मुताबिक ज्यादातर किसान यहीं गलती कर बैठते हैं और जरूरत से कहीं ज्यादा खाद खेत में डाल देते हैं, जिससे फसल को फायदे की जगह नुकसान होता है और खेती की लागत भी बेवजह बढ़ जाती है। इसी तरह खेत में हर वक्त बहुत ज्यादा पानी भरे रखना भी सही तरीका नहीं है। इसके बजाय खेत में नमी और पौधों की जरूरत के हिसाब से पानी का स्तर बनाए रखना चाहिए, ताकि जड़ों तक हवा और धूप की सही मात्रा पहुंच सके। सुरेंद्र सिंह यह भी बताते हैं कि जानकारी की कमी के चलते अक्सर किसान भाई जरूरत से ज्यादा रसायनों का छिड़काव कर देते हैं। इससे न सिर्फ खेती का खर्च बढ़ता है, बल्कि लंबे समय में मिट्टी की सेहत भी बिगड़ने लगती है। टिकुरी गांव से निकली यह सीधी और व्यावहारिक सलाह उन तमाम धान उत्पादकों के लिए एक मार्गदर्शिका जैसी है, जो कम लागत में अपने खेत से रिकॉर्ड तोड़ पैदावार लेना चाहते हैं।
दिन के हिसाब से जानें खाद-पानी का पूरा शेड्यूल
अनुभवी किसानों और कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक रोपाई के बाद के हर पड़ाव के लिए खाद-पानी का एक तय क्रम अपनाना चाहिए। रोपाई के बाद पहले 15 दिनों तक जड़ें जमने के लिए खेत में लगातार 2 से 3 इंच पानी भरा रखना जरूरी है, और अगर डीएपी, पोटाश व जिंक अब तक नहीं डाला गया है, तो इसे 7 दिनों के भीतर डाल देना चाहिए।
रोपाई के 20 से 25 दिन बाद पौधों में कल्ले निकलने का समय आता है। इस दौरान खेत में पानी का स्तर घटाकर आधा से 1 इंच तक कर देना चाहिए और पहली यूरिया खाद 5 से 6 किलो प्रति बीघा की दर से छिड़कनी चाहिए। इसके बाद रोपाई के 40 से 45 दिन बाद पौधों की बढ़वार का दौर शुरू होता है, तब खेत में सिर्फ हल्की नमी बनाए रखनी चाहिए और दूसरी यूरिया खाद भी 5 से 6 किलो प्रति बीघा की मात्रा में डालनी चाहिए।
रोपाई के 55 से 60 दिन बाद बालियां बनने का समय आता है, जो फसल का सबसे अहम पड़ाव माना जाता है। इस चरण में खेत में हमेशा 2 इंच पानी भरा रखना चाहिए और आखिरी बार यूरिया खाद 5 किलो प्रति बीघा की दर से डालनी चाहिए। बालियां निकलने के बाद जब तक दानों में दूध भरने की प्रक्रिया चलती है, तब तक खेत में नमी बनाए रखनी जरूरी है। इसके बाद कटाई से 12 से 15 दिन पहले खेत का पूरा पानी निकाल देना चाहिए, ताकि फसल पकने के लिए सही स्थिति मिल सके। सुरेंद्र सिंह के मुताबिक अगर किसान इन बातों का ध्यान रखते हुए समय पर खाद-पानी का प्रबंधन करें, तो कम लागत में भी धान की खेती से तगड़ा मुनाफा कमाया जा सकता है।
कृषि विशेषज्ञ मानते हैं कि रोपाई के बाद का यह पूरा दौर धान की फसल के लिए सबसे संवेदनशील समय होता है, जिसमें जड़ों की मजबूती से लेकर बालियों में दाना भरने तक हर चरण पर सही खाद और पानी का प्रबंधन तय करता है कि खेत से कितनी पैदावार निकलेगी। सुरेंद्र सिंह की सलाह मानें तो न तो खाद में जल्दबाजी करनी चाहिए और न ही खेत को जरूरत से ज्यादा पानी में डुबोए रखना चाहिए, बल्कि हर पड़ाव पर पौधों की असली जरूरत को समझकर ही कदम उठाना चाहिए।




















