देश में आगामी त्योहारों का मौसम शुरू होने से ठीक पहले आम उपभोक्ताओं और व्यापारियों को महंगाई का बड़ा झटका लगा है। बाजार में महज 10 दिन पहले तक जो चीनी 46 रुपये प्रति किलो के भाव पर मिल रही थी, उसकी कीमत अचानक बढ़कर 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। महज 10 दिनों के भीतर चीनी के दामों में 20 रुपये प्रति किलो से अधिक की यह बढ़ोतरी बेहद चिंताजनक है। इस अचानक आई तेजी से जहां आम परिवारों का रसोई बजट बिगड़ रहा है, वहीं मिठाई विक्रेताओं और बेकरी उद्योग की चिंताएं भी बढ़ गई हैं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार ने तत्काल सख्त कदम उठाए हैं। सरकार ने चीनी के निर्यात पर सख्ती बरतने के साथ ही लगभग एक दशक (10 साल) में पहली बार 10 लाख मीट्रिक टन (1 मिलियन टन) चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। इसके अलावा बाजार में कालाबाजारी रोकने के लिए व्यापारियों के लिए स्टॉक रखने की सीमा को और कड़ा कर दिया गया है।
चीनी की कीमतों में अचानक उछाल के 5 मुख्य कारण
बाजार विशेषज्ञों और कृषि क्षेत्र के विश्लेषकों के अनुसार देश में चीनी के दामों में आए इस अप्रत्याशित उछाल के पीछे मुख्य रूप से पांच बड़े कारण जिम्मेदार हैं
1. राष्ट्रीय बफर स्टॉक में भारी गिरावट: देश में चीनी की उपलब्धता को लेकर बनी स्थिति सबसे मुख्य वजह है। सितंबर के अंत तक देश के पास चीनी का कुल स्टॉक घटकर महज 30 लाख से 35 लाख टन के बीच रह जाने का अनुमान है। यह भंडार नवंबर और दिसंबर के महीनों तक की जरूरतें पूरी करने के लिए भी अपर्याप्त साबित हो सकता है। यद्यपि सरकार को इस कमी का अंदाजा था और पूर्व में स्टॉक सीमा तय की गई थी, लेकिन फिर भी कीमतों में तेजी को रोक पाना संभव नहीं हो सका।
2. त्योहारों से पहले कमर्शियल मांग में तेजी: भारत में रक्षा बंधन से लेकर गणेश चतुर्थी, दशहरा, दिवाली और छठ पूजा तक का समय मिठाइयों और पकवानों का होता है। बड़े त्योहारों से काफी पहले ही कमर्शियल बेकरी, मिठाई निर्माता, कन्फेक्शनरी इकाइयां और पेय पदार्थ (बेवरेज) बनाने वाली कंपनियां बड़े पैमाने पर चीनी की खरीदारी शुरू कर देती हैं। कंपनियों द्वारा भारी मात्रा में अग्रिम स्टॉक जमा करने से खुले बाजार में अचानक आपूर्ति का संकट गहरा गया है।
3. चीनी मिलों के गोदामों में कमी: बीते वर्षों की तुलना में इस बार देश का कुल बफर स्टॉक और चीनी मिलों के गोदामों में बचा हुआ स्टॉक काफी कम दर्ज किया गया है। इसका सीधा असर यह हुआ कि देश में चीनी के कुल वार्षिक उत्पादन और वास्तविक मांग के बीच का अंतर बहुत घट गया, जिससे बाजार संवेदनशील हो गया।
4. मुख्य गन्ना उत्पादक राज्यों में फसल की तबाही: भारत में गन्ने का सबसे अधिक उत्पादन उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में होता है। इस वर्ष इन प्रमुख गन्ना उत्पादक जिलों में अत्यधिक बारिश और बाढ़ के कारण गन्ने की खड़ी फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है। प्राकृतिक आपदा के कारण गन्ने की कटाई और पेराई का चक्र बुरी तरह प्रभावित हुआ है, जिससे कुल चीनी उत्पादन में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है।
5. क्षेत्रीय व्यापारियों द्वारा सट्टेबाजी और जमाखोरी: थोक बाजार में चीनी के दाम बढ़ते ही क्षेत्रीय डीलरों और बड़े थोक व्यापारियों के बीच असमंजस और डर का माहौल बन गया। भविष्य में चीनी की और किल्लत होने की आशंका में कई बड़े व्यापारियों ने कृत्रिम कमी पैदा करके जमाखोरी शुरू कर दी। गोदामों में चीनी दबाए जाने से खुदरा बाजार में आपूर्ति बाधित हुई और कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गईं।
क्या आने वाले महीनों में और महंगी होगी चीनी?
आगामी महीनों में चीनी की कीमतों को लेकर राहत मिलने की उम्मीद कम ही नजर आ रही है। बाजार विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि आने वाले दिनों में चीनी के दामों में और तेजी देखने को मिल सकती है। अगस्त के उत्तरार्ध में रक्षा बंधन के पर्व से शुरू होकर नवंबर में दिवाली और छठ पूजा तक देश में चीनी की मांग अपने उच्चतम स्तर पर रहती है। इस लंबी अवधि में घरेलू खपत अत्यधिक रहने के कारण बाजार में दबाव बना रहेगा, जिससे खुदरा दरों में गिरावट आने की गुंजाइश बेहद सीमित है।
10 साल बाद बिना शुल्क चीनी आयात करने का फैसला
त्योहारी सीजन में देश के भीतर चीनी की निर्बाध आपूर्ति बनाए रखने और आसमान छूती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए सरकार को कड़ा फैसला लेना पड़ा है। रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचे दामों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से सरकार ने 10 लाख मीट्रिक टन (1 मिलियन टन) चीनी के शुल्क-मुक्त (ड्यूटी-फ्री) आयात की मंजूरी दे दी है। भारतीय चीनी बाजार के इतिहास में लगभग 10 वर्षों बाद यह पहला मौका है जब देश को घरेलू मांग पूरी करने के लिए विदेशी चीनी आयात का सहारा लेना पड़ रहा है।
व्यापारियों के लिए कड़े हुए स्टॉक सीमा के नियम
चीनी की जमाखोरी रोकने और खुदरा बाजार में तत्काल उपलब्धता बढ़ाने के लिए सरकार ने व्यापारियों के लिए इन्वेंट्री रखने की अवधि को बेहद सीमित कर दिया है। बुधवार को जारी नए सरकारी आदेश के मुताबिक, अब चीनी व्यापारी और थोक डीलर 15 दिनों से अधिक समय तक अपने पास चीनी का स्टॉक नहीं रख सकेंगे। पहले व्यापारियों को 10 मीट्रिक टन से अधिक स्टॉक रखने की छूट थी, जिसे पिछले महीने घटाकर 30 दिन किया गया था। अब इसे और सख्त बनाते हुए 15 दिन की समय सीमा तय कर दी गई है। यह नया नियम 1 सितंबर से प्रभावी होगा और 30 नवंबर तक लागू रहेगा।
मिठाइयों, बिस्कुट और पैक्ड फूड्स पर पड़ेगा सीधा असर
चीनी की थोक कीमतों में आई इस तेजी का सीधा प्रभाव आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ना तय है। जब मिठाई बनाने वाले हलवाइयों और खाद्य प्रसंस्करण कंपनियों को महंगी चीनी मिलेगी, तो वे इसका अतिरिक्त वित्तीय बोझ ग्राहकों पर ही डालेंगे। इसके चलते बाजार में मिलने वाली स्थानीय मिठाइयां, पैक्ड कैंडीज, बिस्कुट, केक और बेकरी प्रोडक्ट्स महंगे हो जाएंगे। छोटे मिठाई दुकानदारों से लेकर बड़ी एफएमसीजी कंपनियों को अपना ऑपरेटिंग मार्जिन बचाए रखने के लिए उत्पादों के दाम बढ़ाने पड़ेंगे। गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली के दौरान घरों तथा कंपनियों द्वारा बड़े पैमाने पर होने वाली खरीदारी के बीच महंगाई का यह असर और अधिक दिखाई देगा।



















