मानसून की पहली बारिश के साथ ही मौसम में जो ठंडक घुलती है, वह आम आदमी को भले राहत दे, लेकिन आम की बागवानी करने वाले किसानों के लिए यही मौसम कई नई मुश्किलें लेकर आता है। सहारनपुर क्षेत्र में देखा गया है कि लगभग 50 प्रतिशत किसान बरसात शुरू होते ही अपने बागों से आम की तुड़ाई पूरी तरह निपटा देते हैं और उसके बाद पेड़ों की देखभाल की तरफ से मुंह मोड़ लेते हैं। यही लापरवाही आगे चलकर भारी नुकसान की वजह बनती है, क्योंकि नमी और उमस भरे इस मौसम में पेड़ों पर कई तरह की फंगल बीमारियां तेजी से हमला करती हैं और अगले साल आने वाले फलों की मात्रा भी घटा देती हैं।
नमी बढ़ते ही क्यों बढ़ जाता है बीमारियों का खतरा
बरसात के मौसम में हवा में नमी का स्तर लगातार ऊंचा बना रहता है और मिट्टी में भी गीलापन बना रहता है। यही हालात फफूंद यानी फंगस के तेजी से पनपने के लिए सबसे अनुकूल माने जाते हैं। इसी वजह से आम के पौधों पर एन्थ्रेक्नोज़ यानी पत्तियों और टहनियों पर काले धब्बे, पाउडरी मिल्ड्यू यानी पत्तियों पर सफेद पाउडर जैसी परत, और गुच्छा रोग जैसी बीमारियां इसी मौसम में सबसे ज्यादा देखने को मिलती हैं। जिन बागों में तुड़ाई के बाद सफाई नहीं होती और पेड़ों को महीनों अनदेखा छोड़ दिया जाता है, वहां यह समस्या और तेज रफ्तार से फैलती है।
तीन बीमारियां जो पेड़ को अंदर से कमजोर कर देती हैं
कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी व प्रोफेसर डॉक्टर आई.के. कुशवाहा ने बताया कि आम के बागों में मुख्य रूप से तीन बीमारियां सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाती हैं। पहली बीमारी एन्थ्रेक्नोज़ है, जिसमें पत्तियों पर गहरे काले धब्बे उभर आते हैं और धीरे-धीरे यह टहनियों तक भी फैल जाती है। दूसरी बीमारी को डाइबेक कहा जाता है, इसमें पेड़ ऊपर के हिस्से से सूखना शुरू करता है और समय पर इलाज न मिलने पर यह सूखापन धीरे-धीरे नीचे की तरफ भी बढ़ता चला जाता है। तीसरी बीमारी सूट बॉल मेकर यानी गुच्छा रोग है, जिसे मैंगो मालफॉर्मेशन भी कहा जाता है, इसमें पेड़ की ऊपरी टहनियों पर गुलाब के फूल जैसी दिखने वाली गुच्छेदार कलियां बन जाती हैं, जो आगे चलकर पेड़ में फल लगने की पूरी प्रक्रिया को ही बिगाड़ देती हैं।
जलभराव है सबसे बड़ा दुश्मन, बरतें ये सावधानियां
डॉक्टर कुशवाहा के मुताबिक इन तीनों बीमारियों से बचाव के लिए सबसे पहली और सबसे जरूरी सावधानी यही है कि आम के बाग में कहीं भी बारिश का पानी जमा न रहने दिया जाए। अगर जड़ों के आसपास लगातार पानी भरा रहता है तो जड़ों तक पोषक तत्वों और हवा का पहुंचना कम हो जाता है, जिससे जड़ गलन जैसी गंभीर समस्या पैदा होती है। इसी के साथ-साथ पेड़ की टहनियां ऊपर से सूखने लगती हैं और तने व टहनियों पर गांठ बनने की समस्या भी तेजी से सामने आने लगती है। यही वजह है कि तुड़ाई के बाद पेड़ों को यूं ही छोड़ने के बजाय बाग की नियमित सफाई करते रहना बेहद जरूरी माना जाता है।
छंटाई और सही उर्वरक के छिड़काव से मिलेगा बचाव
अगर किसी टहनी पर गांठ जैसी बनावट या गुलाब की कली जैसा उभार नजर आए तो उसे बिना देर किए काटकर पेड़ से अलग कर देना चाहिए। इसी तरह जो टहनियां पूरी तरह सूख चुकी हैं उन्हें भी तुरंत काटकर हटा देना जरूरी है, ताकि बीमारी बाकी स्वस्थ हिस्सों तक आगे न फैल सके। अगर पेड़ ऊपर से सूखने की समस्या यानी डाइबेक के लक्षण दिखा रहा हो तो तुरंत बेंटोनाइट सल्फर और नैनो डीएपी जैसे उर्वरकों का छिड़काव पेड़ पर करना चाहिए, साथ ही इन्हें पेड़ की जड़ के पास डालना भी काफी फायदेमंद माना जाता है।
ज्यादा संक्रमण होने पर कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का इस्तेमाल जरूरी
अगर बाग में बीमारी का असर ज्यादा गंभीर नजर आ रहा हो तो कॉपर ऑक्सीक्लोराइड नाम की दवा का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके लिए 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की मात्रा के हिसाब से घोल तैयार कर पेड़ पर दो बार छिड़काव करना चाहिए। डॉक्टर कुशवाहा का कहना है कि अगर किसान इस तरीके से समय रहते अपने बागों की देखभाल करें तो जड़ गलन, टहनियों के सूखने और गांठ बनने जैसी सभी समस्याओं से पेड़ों को पूरी तरह बचाया जा सकता है, जिसका सीधा फायदा अगले साल की पैदावार में भी साफ नजर आएगा।













