हर साल 12वीं का रिजल्ट आते ही स्टूडेंट्स के दिमाग में सिर्फ एक ही सवाल घूमता है कि किस कॉलेज और किस कोर्स में एडमिशन लिया जाए. लेकिन जैसे ही एडमिशन फॉर्म खुलता है, ‘बीए इन इंग्लिश’ के सामने ‘इंग्लिश ऑनर्स’ या ‘बीकॉम’ के सामने ‘बीकॉम ऑनर्स’ जैसे विकल्प देखकर बड़े-बड़े स्टूडेंट्स भी उलझ जाते हैं. सवाल यही रहता है कि जनरल और ऑनर्स डिग्री में असल फर्क क्या है और इनमें से कौन सा कोर्स आगे चलकर बेहतर पैकेज दिला सकता है.
ज्यादातर मामलों में स्टूडेंट्स बिना पूरी जानकारी लिए सिर्फ ट्रेंड या दोस्तों को देखकर कोई कोर्स चुन लेते हैं और बाद में पढ़ाई के प्रेशर में उलझ जाते हैं. जबकि हकीकत यह है कि दिखने में एक जैसी लगने वाली ये दोनों डिग्री सिलेबस, पढ़ाई के तरीके और करियर के मौकों के लिहाज से बिल्कुल अलग हैं. जो स्टूडेंट्स इस साल कॉलेज एडमिशन की तैयारी में जुटे हैं, उनके लिए अपनी क्षमता और लक्ष्य के हिसाब से सही कोर्स चुनना जरूरी है.
फोकस का खेल: ऑल-राउंडर जनरल बनाम स्पेशलिस्ट ऑनर्स
जनरल और ऑनर्स डिग्री के बीच सबसे बड़ा फर्क ‘फोकस’ का ही है. जनरल डिग्री, जैसे बीए या बीकॉम, एक तरह से ऑल-राउंडर कोर्स है. इसमें किसी एक सब्जेक्ट पर पूरी तरह अटकने के बजाय कई मुख्य विषयों को बराबर अहमियत के साथ पढ़ना होता है. मसलन, जनरल बीए करने वाले स्टूडेंट को हिस्ट्री, पॉलिटिकल साइंस और इंग्लिश, तीनों साथ-साथ पढ़ने होते हैं. दूसरी तरफ ऑनर्स का सीधा मतलब है स्पेशलाइजेशन. इंग्लिश ऑनर्स चुनने वाले स्टूडेंट की करीब 70 से 80 प्रतिशत पढ़ाई सिर्फ इंग्लिश लिटरेचर, उसके इतिहास और अलग-अलग राइटर्स के इर्द-गिर्द ही घूमती है. बाकी विषय सिर्फ नाममात्र के सपोर्टिंग रोल में रहते हैं.
सिलेबस और पढ़ाई का प्रेशर: किसमें ज्यादा मेहनत लगती है
ऑनर्स डिग्री में स्टूडेंट को अपने विषय की गहराई में उतरना पड़ता है, इसलिए इसका सिलेबस भी काफी बड़ा और थोड़ा कठिन होता है. यहां थ्योरी, रिसर्च और इन-डेप्थ एनालिसिस पर ज्यादा ध्यान देना पड़ता है, यानी पढ़ाई का प्रेशर भी स्वाभाविक रूप से ज्यादा रहता है. इसके उलट, जनरल या पास कोर्स का सिलेबस ऑनर्स के मुकाबले काफी हल्का और आसान माना जाता है. इसमें बहुत गहराई में जाकर रिसर्च करने की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे स्टूडेंट्स को अपनी पर्सनल लाइफ या दूसरी गतिविधियों के लिए भी अच्छा-खासा समय मिल जाता है.
एडमिशन कटऑफ में दिखता है साफ फर्क
चूंकि ऑनर्स डिग्री को ज्यादा एडवांस माना जाता है, इसलिए देश की टॉप यूनिवर्सिटीज, जैसे दिल्ली यूनिवर्सिटी में ऑनर्स कोर्स की कटऑफ बहुत ऊंची जाती है. सिर्फ वही स्टूडेंट्स अच्छे कॉलेज में ऑनर्स पा सकते हैं जिनके 12वीं में बेहतरीन मार्क्स हों. वहीं जनरल कोर्स की कटऑफ इसके मुकाबले काफी कम होती है, जिससे एवरेज मार्क्स लाने वाले स्टूडेंट्स को भी आसानी से सीट मिल जाती है.
करियर के हिसाब से कौन सा कोर्स रहेगा बेहतर
अगर लक्ष्य किसी खास विषय में प्रोफेसर बनना है, रिसर्च करना है या आगे मास्टर डिग्री यानी एमए या एमकॉम करना है, तो ऑनर्स डिग्री ही बेहतर विकल्प है. कई विदेशी यूनिवर्सिटीज में भी 4 साल की ऑनर्स डिग्री को ही तरजीह दी जाती है, और कई बार कॉरपोरेट जॉब्स में भी ऑनर्स करने वाले स्टूडेंट्स को ज्यादा प्राथमिकता मिलती है. दूसरी तरफ, अगर ग्रेजुएशन खत्म होते ही यूपीएससी, एसएससी, बैंकिंग या किसी और सरकारी नौकरी की तैयारी करने का इरादा है, तो जनरल डिग्री ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकती है. जनरल कोर्स में पढ़ाई का प्रेशर कम होने से कॉम्पिटिटिव एग्जाम्स की तैयारी के लिए भरपूर समय मिल जाता है, और इसमें पढ़ाए जाने वाले कई विषय सरकारी परीक्षाओं के जीएस सिलेबस से भी मेल खाते हैं. यानी सही कोर्स का चुनाव इस बात पर निर्भर करता है कि स्टूडेंट का असली लक्ष्य रिसर्च और स्पेशलाइजेशन है, या फिर सरकारी नौकरी की जल्दी तैयारी.













