केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की ऑन-स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) यानी डिजिटल मूल्यांकन व्यवस्था के कारण शैक्षणिक संकट झेल रहे विद्यार्थियों के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर रुख अपनाया है। सर्वोच्च अदालत ने सीबीएसई को उन छात्रों के हितों की रक्षा के लिए व्यावहारिक और प्रभावी समाधान तलाशने का निर्देश दिया है, जिन्हें बोर्ड में मिले अंकों की वजह से उच्च शिक्षा में प्रवेश लेने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इस संवेदनशील विषय से जुड़ी जनहित याचिका पर अगली अदालती सुनवाई 21 अगस्त को नियत की गई है।
फंसे हुए छात्रों के भविष्य पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
यह मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष विचारार्थ आया। अदालती कार्यवाही के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने पीठ को अवगत कराया कि कई विद्यार्थियों ने सीबीएसई की बोर्ड परीक्षा पास करने के बाद विभिन्न व्यावसायिक और उच्च शिक्षण पाठ्यक्रमों की प्रतियोगी प्रवेश परीक्षाएं भी सफलतापूर्वक उत्तीर्ण कर ली हैं। इसके बावजूद, ओएसएम डिजिटल जांच व्यवस्था के तहत कम अंक मिलने के कारण वे संबंधित पाठ्यक्रमों में दाखिले के लिए निर्धारित न्यूनतम योग्यता अंक हासिल नहीं कर सके।
वकील ने अदालत के सामने यह गंभीर स्थिति भी रखी कि कई संस्थानों में संबंधित पाठ्यक्रमों की कक्षाएं और शैक्षणिक सत्र पहले ही शुरू हो चुके हैं। ऐसी स्थिति में केवल सीबीएसई के अंकों की विसंगति के कारण विद्यार्थियों के करियर पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। इन तर्कों पर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सीबीएसई के कानूनी प्रतिनिधि को स्पष्ट हिदायत दी कि वे बोर्ड प्रबंधन से बातचीत कर इन प्रभावित विद्यार्थियों के शैक्षणिक हितों को सुरक्षित करने का उपाय तलाशें।
21 अगस्त तक सुनवाई स्थगित, तुषार मेहता से मांगी गई मदद
अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 21 अगस्त की तारीख निर्धारित की है। सुनवाई के दौरान पीठ को जानकारी दी गई कि भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता उस समय अदालत में उपस्थित नहीं थे। पूर्व की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल से इस जटिल मामले में न्यायिक सहायता प्रदान करने का अनुरोध किया था। इसी कारण अदालत ने ठोस विचार-विमर्श हेतु सुनवाई की तिथि आगे बढ़ाने का फैसला किया।
इससे पहले 15 जुलाई को हुई सुनवाई में भी सुप्रीम कोर्ट ने सीबीएसई की डिजिटल मार्किंग प्रणाली के चलते परीक्षार्थियों में पनप रही निराशा और मानसिक तनाव पर गहरी चिंता प्रकट की थी। उस समय सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया था कि याचिका में उठाए गए व्यक्तिगत परीक्षार्थियों की अंकतालिकाओं से जुड़ी व्यक्तिगत शिकायतों को काफी हद तक हल कर लिया गया है। हालांकि, उन्होंने यह स्वीकार किया था कि सरकार इस मूल्यांकन व्यवस्था से जुड़ी प्रणालीगत कमियों को अत्यंत गंभीरता से ले रही है।
ओएसएम प्रणाली की समीक्षा के लिए गठित आयोग
न्यायिक प्रक्रिया के दौरान सर्वोच्च अदालत को यह भी अवगत कराया गया कि मौजूदा उत्तर पुस्तिका मूल्यांकन व्यवस्था की गहन समीक्षा के लिए पूर्व प्रशासनिक अधिकारी एस. राधा चौहान की अध्यक्षता में एक सदस्यीय आयोग का गठन किया जा चुका है। इस आयोग का मुख्य उद्देश्य वर्तमान ओएसएम डिजिटल प्रक्रिया की बारीकियों का अध्ययन करना और इसमें आवश्यक ढांचागत व तकनीकी सुधारों की सिफारिश करना है। सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल को यह निर्देश भी दिया था कि सीबीएसई द्वारा सुधार की दिशा में अब तक उठाए गए कदमों की अद्यतन जानकारी अदालत के समक्ष रखी जाए।
जनहित याचिका में की गई मुख्य मांगें
यह जनहित याचिका याचिकाकर्ता राकेश बिंजोला की ओर से अधिवक्ता लक्ष्मीकांत मताडन शुक्ला के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत की गई है। याचिका में केंद्र सरकार और सीबीएसई को यह स्पष्ट आदेश जारी करने का अनुरोध किया गया है कि ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली के माध्यम से आयोजित होने वाली बोर्ड परीक्षाओं की जांच के लिए पारदर्शी, निष्पक्ष और सुदृढ़ नियम बनाए जाएं। साथ ही, इन सुधारात्मक नियमों की सख्त निगरानी और उन्हें लागू करने के लिए एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति गठित करने की मांग रखी गई है।
इसके अतिरिक्त, याचिका में उन छात्रों के लिए विशेष राहत का प्रावधान करने की मांग की गई है, जिन्होंने प्रवेश परीक्षाएं उत्तीर्ण कर ली हैं या किसी शैक्षणिक संस्थान में प्रोविजनल दाखिला हासिल कर लिया है। याचिकाकर्ता का आग्रह है कि ऐसे विद्यार्थियों को कक्षा 12 में 75 प्रतिशत अंक या अन्य न्यूनतम अर्हता अंकों की अनिवार्य शर्त में उचित छूट दी जाए, ताकि सीबीएसई मूल्यांकन की तकनीकी खामियों की कीमत छात्रों को अपने भविष्य से न चुकानी पड़े।
क्या है ऑन-स्क्रीन मार्किंग व्यवस्था और क्यों खड़ा हुआ विवाद?
सीबीएसई की ऑन-स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) व्यवस्था के तहत उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन पारंपरिक कागजी तरीके के बजाय डिजिटल माध्यम से किया जाता है। परीक्षा संपन्न होने के बाद छात्रों की मूल उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन करके सुरक्षित सर्वर पर अपलोड कर दिया जाता है। इसके बाद मूल्यांकनकर्ता शिक्षक कंप्यूटर स्क्रीन पर इन स्कैन की गई उत्तर पुस्तिकाओं को देखकर अंक प्रदान करते हैं।
हालांकि, डिजिटल मूल्यांकन की इस पद्धति को लेकर छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों द्वारा लगातार सवाल उठाए जाते रहे हैं। मुख्य शिकायतों में कंप्यूटर स्क्रीन पर देखने में होने वाली असहजता, उत्तरों के मूल्यांकन में जल्दबाजी, तकनीकी त्रुटियां और उत्तर पुस्तिकाओं की री-चेकिंग या पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी शामिल है। याचिका में इन्हीं चिंताओं को रेखांकित करते हुए एक पारदर्शी और त्रुटिहीन मूल्यांकन तंत्र की मांग की गई है।



















