अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के मैदान पर जब किसी टीम के सामने हार का काला साया मंडराने लगता है और विरोधी टीम का दबाव लगातार बढ़ता जाता है, तब किसी युवा खिलाड़ी का संयम और साहस ही पूरी बाजी पलट सकता है। भारत और श्रीलंका के बीच खेले गए कोलंबो टेस्ट मैच में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला। श्रीलंकाई टीम जब अपनी दूसरी पारी में फॉलोऑन खेलते हुए भारी संकट में घिरी हुई थी और उस पर पारी की हार का खतरा मंडरा रहा था, तब 26 साल के युवा बल्लेबाज पसिंदु सूरियाबंदारा ने एक चट्टान की तरह क्रीज पर टिककर भारतीय गेंदबाजी आक्रमण का सामना किया। अपनी धैर्यपूर्वक बल्लेबाजी और शानदार शॉट सिलेक्शन के बल पर पसिंदु सूरियाबंदारा ने अपनी टीम को संभावित हार के मुंह से बाहर निकाल लिया और श्रीलंका के नए संकटमोचक बनकर उभरे।
गॉल टेस्ट में अनपेक्षित डेब्यू और शून्य की निराशा
पसिंदु सूरियाबंदारा के अंतरराष्ट्रीय करियर की शुरुआत बेहद अनपेक्षित परिस्थितियों में हुई थी। यह कहानी कुछ हफ्तों पहले भारत के खिलाफ गॉल में खेले गए टेस्ट मैच से शुरू होती है। उस मुकाबले के दौरान श्रीलंका के मुख्य और अनुभवी बल्लेबाज दिनेश चांदीमल सिर में गेंद लगने से गंभीर रूप से चोटिल हो गए थे। दिनेश चांदीमल की जगह टीम को एक मजबूत विकल्प की जरूरत थी, जिसके बाद मैच रेफरी की विशेष अनुमति से पसिंदु सूरियाबंदारा को बतौर कन्कशन सब्स्टीट्यूट प्लेइंग-11 में शामिल किया गया। इस तरह 26 वर्षीय पसिंदु सूरियाबंदारा को अचानक और अनियोजित तरीके से अपने अंतरराष्ट्रीय टेस्ट करियर का डेब्यू करने का मौका मिला।
हालांकि, डेब्यू मैच में किस्मत ने उनका साथ बिल्कुल नहीं दिया। गॉल टेस्ट की पहली पारी में जब वह बल्लेबाजी करने उतरे, तो बिना कोई रन बनाए (शून्य पर) ही पवेलियन लौट गए। किसी भी युवा खिलाड़ी के लिए टेस्ट क्रिकेट की पहली ही पारी में खाता खोले बिना आउट हो जाना मानसिक रूप से बेहद निराशाजनक होता है। इससे खिलाड़ी का आत्मविश्वास डगमगा सकता था, लेकिन पसिंदु सूरियाबंदारा ने इस असफलता को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया और खुद को आगे आने वाली बड़ी चुनौतियों के लिए पूरी तरह तैयार रखा।
घरेलू क्रिकेट का लंबा अनुभव और प्रथम श्रेणी का रिकॉर्ड
कोलंबो में 19 अक्टूबर 1999 को जन्मे पसिंदु सूरियाबंदारा अचानक रातों-रात इस मुकाम पर नहीं पहुंचे हैं। राष्ट्रीय टीम के दरवाजे तक पहुंचने के पीछे उनकी सालों की कड़ी मेहनत और घरेलू क्रिकेट का लंबा अनुभव छुपा है। पसिंदु सूरियाबंदारा ने श्रीलंका की अंडर-19 टीम और श्रीलंका-ए टीम की तरफ से खेलते हुए लंबे समय तक अपनी बल्लेबाजी को निखारा है। प्रथम श्रेणी (फर्स्ट क्लास) क्रिकेट में उनका रिकॉर्ड उनकी बेहतरीन क्षमता और निरंतरता की खुद गवाही देता है।
अपने प्रथम श्रेणी करियर में पसिंदु सूरियाबंदारा ने कुल 69 मुकाबले खेले हैं, जिनमें उन्होंने 4,893 शानदार रन बनाए हैं। इस दौरान उनके बल्ले से 14 बेहतरीन शतकीय पारियां और 23 अर्धशतक निकले हैं। श्रीलंकाई घरेलू क्रिकेट के कठिन और दबाव वाले माहौल में उनके इस लगातार दमदार प्रदर्शन ने चयनकर्ताओं का ध्यान खींचा था। इसी ठोस प्रदर्शन के बूते उन्हें भारतीय टीम की मजबूत चुनौती का सामना करने के लिए श्रीलंकाई राष्ट्रीय टेस्ट टीम में जगह दी गई थी।
कोलंबो टेस्ट की पहली पारी में 80 रनों का महत्वपूर्ण योगदान
गॉल टेस्ट में शून्य पर आउट होने के झटके को पीछे छोड़ते हुए पसिंदु सूरियाबंदारा ने कोलंबो टेस्ट में खुद को साबित करने का पूरा मौका भुनाया। जब कोलंबो टेस्ट की पहली पारी में भारतीय गेंदबाज लगातार दबाव बना रहे थे और श्रीलंकाई बल्लेबाजी क्रम लड़खड़ा रहा था, तब पसिंदु सूरियाबंदारा ने क्रीज पर कदम रखा। उन्होंने अपनी सूझबूझ, बेहतरीन तकनीक और जबरदस्त धैर्य का परिचय देते हुए भारतीय आक्रमण को बेअसर कर दिया।
पहली पारी में पसिंदु सूरियाबंदारा ने कुल 133 गेंदों का सामना किया और अपनी इस पारी में 9 दर्शनीय चौकों की मदद से 80 रनों की अमूल्य पारी खेली। यह उनके टेस्ट करियर का पहला अर्धशतक था। इस 80 रनों की जिम्मेदारी भरी पारी ने श्रीलंका को शुरुआती झटकों से उबारा और टीम के स्कोर को एक सम्मानजनक स्थिति तक पहुंचाने में बेहद अहम भूमिका निभाई।
फॉलोऑन के भारी दबाव में 92 रनों की जुझारू मैराथन पारी
हालांकि, पसिंदु सूरियाबंदारा की असली परीक्षा दूसरी पारी में होनी बाकी थी। भारत द्वारा श्रीलंका को फॉलोऑन थमाए जाने के बाद श्रीलंकाई टीम दूसरी पारी में बल्लेबाजी करने उतरी। दूसरी पारी की शुरुआत में ही श्रीलंका के शीर्ष क्रम के दो बल्लेबाज जल्दी-जल्दी आउट होकर पवेलियन लौट गए। टीम एक बार फिर से बेहद नाजुक मोड़ पर खड़ी थी और उस पर एक पारी से हारने का सीधा खतरा मंडरा रहा था।
ऐसे में एक बार फिर पसिंदु सूरियाबंदारा क्रीज पर पहुंचे और टीम के मुख्य रक्षक के रूप में सामने आए। उन्होंने एक छोर संभालते हुए भारतीय गेंदबाजों के हर हमले को नाकाम कर दिया। उन्होंने अपनी एकाग्रता को टूटने नहीं दिया और मैदान के चारों तरफ शानदार शॉट खेले। अपनी इस मैराथन पारी के दौरान पसिंदु सूरियाबंदारा ने 173 गेंदों का सामना किया, जिसमें 10 खूबसूरत चौके और एक गगनचुंबी छक्का शामिल था।
वह शतक बनाने से महज 8 रन दूर 92 के व्यक्तिगत स्कोर पर रहे, लेकिन उनकी इस 92 रनों की साहसी पारी ने श्रीलंका को फॉलोऑन के संकट से पूरी तरह उबार दिया और मैच में पारी की हार से बचा लिया।
श्रीलंकाई क्रिकेट का नया स्तंभ और भविष्य की उम्मीदें
भारत के खिलाफ पसिंदु सूरियाबंदारा की यह जुझारू पारी केवल एक स्कोरकार्ड का आंकड़ा भर नहीं है, बल्कि यह श्रीलंका क्रिकेट के उज्ज्वल भविष्य की एक बेहद मजबूत नींव स्थापित करती है। जब टीम को एक संकटमोचक की सबसे सख्त जरूरत थी, तब इस 26 वर्षीय युवा बल्लेबाज ने यह साबित कर दिया कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के कठिन दबाव में ही असली प्रतिभा निखर कर सामने आती है। भारत की विश्वस्तरीय टीम के खिलाफ यह सीरीज पसिंदु सूरियाबंदारा के लिए एक बड़ा मील का पत्थर साबित हुई है। आने वाले समय में उन्हें श्रीलंकाई टेस्ट बल्लेबाजी क्रम के मुख्य स्तंभों में से एक माना जा रहा है और दुनिया भर के क्रिकेट प्रेमियों की नजरें अब इस उदीयमान स्टार के अगले मुकाबलों पर रहेंगी।



















