जब पूरी दुनिया इंग्लैंड दौरे पर भारतीय टीम का हिस्सा रहे युवा बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी की आक्रामक बल्लेबाजी की तारीफ कर रही है, तब समस्तीपुर का यह उभरता हुआ सितारा अपनी जड़ों से गहराई से जुड़ा हुआ है। कैमरों की चमक और स्टेडियम के शोर-शराबे से दूर, यह अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी आज भी वही साधारण गांव का लड़का है। वैभव को महंगी होटलों के बजाय अपने पुश्तैनी घर और परिवार के साथ सादे भोजन में ही असली सुकून मिलता है। स्थानीय मैदानों से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक का उनका यह सफर सिर्फ उनकी खेल प्रतिभा का ही नहीं, बल्कि उनके बेहतरीन संस्कारों का भी प्रमाण है।
जड़ों से गहरा जुड़ाव
क्रिकेट के मैदान पर वैभव के आक्रामक तेवर और घर पर उनके बेहद शांत स्वभाव के बीच का यह अंतर पूरे समस्तीपुर जिले के लिए गर्व का विषय बन गया है। एक तरफ जहां पूरे देश में उनके उज्ज्वल खेल भविष्य की चर्चा हो रही है, वहीं मिथिलांचल में उनके करीबी इस बात का जश्न मना रहे हैं कि वैभव आज भी बिल्कुल नहीं बदले हैं। उनके परिवार के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि केवल उनका राष्ट्रीय टीम में चुना जाना नहीं है, बल्कि यह देखना है कि इतनी शोहरत हासिल करने के बावजूद उन्होंने अपनी सादगी और बड़ों के प्रति सम्मान को कभी कम नहीं होने दिया।
सादगी और शिष्टाचार की अहमियत
इस गहरी सादगी की नींव उनके बचपन में ही रख दी गई थी, जिसे उनकी दादी उषा सिंह बहुत प्यार से याद करती हैं। वैभव को अपनी गोद में खिलाकर बड़ा करने वाली उषा सिंह ने उस नन्हे बच्चे को धूल भरे मैदानों से निकलकर इंग्लैंड में देश का प्रतिनिधित्व करते हुए देखा है। दादी बड़े गर्व के साथ बताती हैं कि पूरी दुनिया घूमने और अलग-अलग तरह के खानपान देखने के बावजूद, वैभव ने कभी भी कोई नखरा नहीं किया। उन्होंने अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को लेकर कभी कोई खास फरमाइश नहीं की और हमेशा जमीन से जुड़े रहे।
पारंपरिक मिथिला खानपान से प्रेम
मिथिलांचल की समृद्ध संस्कृति के सच्चे सपूत वैभव की खाने-पीने की पसंद आज भी पूरी तरह से पारंपरिक है। खेल में मिली सफलता का उनके स्वाद पर कोई असर नहीं पड़ा है। उनकी दादी एक बेहद भावुक कर देने वाली बात साझा करती हैं कि वैभव ने बचपन में कभी खाने को लेकर जिद नहीं की, और अनुशासन की वह आदत आज भी कायम है। घर की रसोई में जो भी सादा भोजन बनता है, वह उसे बिना किसी शिकायत के खुशी-खुशी खा लेते हैं। आज भी उनका सबसे पसंदीदा व्यंजन खिचड़ी के साथ परोसी जाने वाली पारंपरिक पीठी है। इसके अलावा, उनके आहार में गांव का शुद्ध भोजन शामिल है, जिसमें ताजी रोटी, चावल, दाल, दूध और घर का जमाया हुआ दही प्रमुख है, जिसे वह बेहद चाव से खाते हैं।
सफलता के बाद भी नहीं बदले संस्कार
उषा सिंह के लिए उनके पोते की सबसे बड़ी और सार्थक उपलब्धि मैदान पर बनाए गए रन या अंतरराष्ट्रीय पहचान नहीं है, बल्कि अपने पारिवारिक संस्कारों को सहेज कर रखना है। वह खुशी से बताती हैं कि अचानक मिली शोहरत और लोगों के ध्यान के बावजूद वैभव की सादगी, विनम्रता और शिष्टाचार में कोई कमी नहीं आई है। समस्तीपुर के अपने पुश्तैनी गांव में कदम रखते ही यह मशहूर युवा क्रिकेटर तुरंत एक आज्ञाकारी पारिवारिक सदस्य बन जाता है। वह किसी भी तरह की खास मेहमाननवाजी से दूर रहते हैं और अपने प्रियजनों के साथ बिताए गए समय को सबसे ज्यादा अहमियत देते हैं।
परिवार और बुजुर्गों का सम्मान
घर वापसी पर उनके द्वारा निभाए जाने वाले संस्कार परिवार के बुजुर्गों के प्रति उनके गहरे सम्मान को दर्शाते हैं। उनकी भावुक दादी के अनुसार, किसी भी लंबे और थकाऊ दौरे से गांव लौटने के बाद वैभव का सबसे पहला काम परिवार के वरिष्ठ सदस्यों का आशीर्वाद लेना होता है। वह अपनी दादी के साथ अकेले में समय बिताना और उनकी बातें सुनना कभी नहीं भूलते। इन सबसे बढ़कर, उन्हें परिवार के साथ बैठकर घर का बना सादा खाना खाने में जो आनंद मिलता है, वह उनके लिए दुनिया की किसी भी खुशी से बड़ा है। अपनी मिट्टी से यह जुड़ाव, अपनापन और विनम्रता पूरे परिवार को असीम खुशी देती है, और यह साबित करती है कि भले ही वैभव की प्रतिभा अब दुनिया की हो गई है, लेकिन उनका दिल आज भी घर में ही बसता है।




















