भारतीय क्रिकेट इतिहास में कुछ खिलाड़ी ऐसे रहे हैं जिनकी मैदान पर आक्रामकता ने प्रशंसकों को रोमांचित किया, लेकिन मैदान के बाहर उनकी सादगी ने दिल जीत लिया। पूर्व तेज गेंदबाज वेंकटेश प्रसाद ऐसे ही एक क्रिकेटर हैं। क्रिकेट प्रशंसक 1996 विश्व कप में पाकिस्तान के बल्लेबाज आमिर सोहेल को बोल्ड करने के बाद उनका उग्र इशारा आज भी याद करते हैं। हालांकि, अपनी तेज गेंदों से बल्लेबाजों को परेशान करने वाले वेंकटेश प्रसाद असल जीवन में बेहद शांत और संकोची स्वभाव के रहे हैं। उनकी निजी जिंदगी किसी बॉलीवुड फिल्म की पटकथा जैसी रोचक और प्रेरणादायक है, जिसमें उन्होंने सामाजिक रूढ़ियों को पीछे छोड़ते हुए अपने प्यार को पाया और उसे निभाया।
1994 की वह ऐतिहासिक मुलाकात और अनिल कुंबले की भूमिका
वेंकटेश प्रसाद और उनकी पत्नी जयंती की इस खूबसूरत प्रेम कहानी की नींव साल 1994 में रखी गई थी। इस रिश्ते को शुरू कराने में भारतीय टीम के महान स्पिनर अनिल कुंबले ने मुख्य भूमिका निभाई थी। अनिल कुंबले उस समय मशहूर घड़ी निर्माता कंपनी टाइटन के ब्रांड एंबेसडर के रूप में काम कर रहे थे। उसी कंपनी में जयंती पब्लिक रिलेशंस ऑफिसर (PRO) के पद पर तैनात थीं। अपनी व्यावसायिक जिम्मेदारियों के कारण अनिल कुंबले और जयंती के बीच नियमित बातचीत होती थी, जिससे दोनों में अच्छी दोस्ती हो गई।
इसी दोस्ती के चलते 1994 में अनिल कुंबले ने जयंती का परिचय अपने साथी तेज गेंदबाज वेंकटेश प्रसाद से कराया। उस समय यह केवल दो लोगों के बीच एक साधारण औपचारिक मुलाकात थी। अनिल कुंबले या किसी भी अन्य व्यक्ति को यह अंदाजा नहीं था कि यह अनौपचारिक मुलाकात आगे चलकर दो जिंदगियों के हमेशा के लिए जुड़ने का कारण बन जाएगी। उस समय से दोनों के बीच एक नए रिश्ते का अंकुर फूटा जो आगे चलकर एक अटूट बंधन में बदल गया।
दो विपरीत स्वभाव के लोगों के बीच गहराता संवाद
मनोविज्ञान और आम जीवन में अक्सर माना जाता है कि अलग-अलग स्वभाव वाले लोग एक-दूसरे की तरफ तेजी से आकर्षित होते हैं। वेंकटेश प्रसाद और जयंती के मामले में भी यही बात पूरी तरह सच साबित हुई। दोनों का व्यक्तित्व एक-दूसरे से बिल्कुल अलग था। वेंकटेश प्रसाद स्वभाव से बेहद शर्मीले, कम बोलने वाले और संकोची थे। दूसरी ओर जयंती अत्यधिक सामाजिक, बातूनी, बेबाक और ऊर्जावान व्यक्तित्व की धनी थीं।
शुरुआत में जयंती अनिल कुंबले और वेंकटेश प्रसाद दोनों की अच्छी दोस्त बनीं। समय बीतने के साथ वेंकटेश और जयंती के बीच मुलाकातों का दायरा बढ़ा और टेलीफोन पर लंबी बातचीत शुरू हुई। जयंती के खुले और दोस्ताना व्यवहार ने वेंकटेश के भीतर की झिझक को दूर करने में मदद की। वहीं वेंकटेश प्रसाद की सादगी और शांत स्वभाव ने जयंती का दिल जीत लिया। धीरे-धीरे दोस्ती का यह दौर कब प्यार में तब्दील हो गया, इसका अहसास दोनों को वक्त बीतने के साथ हुआ।
शर्मीलेपन को पीछे छोड़कर जयंती ने बढ़ाया प्रपोजल का कदम
जैसे-जैसे दोनों का रिश्ता गहरा होता गया, बात प्यार के इजहार तक पहुंची। हालांकि, वेंकटेश प्रसाद का शर्मीला स्वभाव उनके रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा बन गया। वेंकटेश मन ही मन जयंती को बहुत चाहने लगे थे, लेकिन अपनी संकोची प्रकृति की वजह से वे अपने दिल की बात सामने रखने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे। खुद वेंकटेश प्रसाद ने कई साक्षात्कारों में स्वीकार किया है कि वे इतने झिझकने वाले व्यक्ति थे कि शायद कभी खुद आगे बढ़कर प्रपोज नहीं कर पाते।
जयंती ने वेंकटेश के इस स्वभाव को भली-भांति समझा। उन्होंने महसूस किया कि इस रिश्ते को आगे बढ़ाने के लिए पहला कदम उन्हें ही उठाना होगा। आखिरकार जयंती ने खुद आगे बढ़कर वेंकटेश प्रसाद के सामने शादी का प्रस्ताव रखा। जयंती का यह फैसला वेंकटेश की जिंदगी का सबसे बड़ा और यादगार मोड़ साबित हुआ, जिसने उनके रिश्ते को एक औपचारिक दिशा दे दी।
सामाजिक मान्यताओं को चुनौती और परिवार की सहमति
जयंती और वेंकटेश प्रसाद के रिश्ते के सामने समाज की पारंपरिक सोच एक बड़ी चुनौती बनकर खड़ी थी। जयंती वेंकटेश से उम्र में 9 साल बड़ी थीं और वे पहले से तलाकशुदा भी थीं। उस दौर के भारतीय समाज में किसी तलाकशुदा और उम्र में बड़ी महिला से विवाह करना आसान नहीं माना जाता था। वेंकटेश के लिए अपने पारंपरिक दक्षिण भारतीय परिवार को इस विवाह के लिए राजी करना एक कठिन कार्य था।
वेंकटेश प्रसाद ने हिम्मत दिखाते हुए अपने परिवार के सामने पूरी स्थिति रखी। उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों को जयंती के गुणों, उनके प्रति अपने आदर और सच्चे प्रेम के बारे में विस्तार से समझाया। परिवार ने वेंकटेश की भावनाओं को समझा और उनके निर्णय का पूरा सम्मान किया। परिजनों से हरी झंडी मिलने के बाद 22 अप्रैल 1996 को एक सादे लेकिन भव्य समारोह में दोनों ने शादी कर ली।
सफलता का सफर और एक सुखी गृहस्थी की मिसाल
शादी के बाद के दशकों में वेंकटेश प्रसाद और जयंती का रिश्ता और मजबूत होता गया। आज उनकी शादी को कई साल बीत चुके हैं और वे एक बेहद सुखी जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इस दंपती का एक बेटा है जिसका नाम पृथ्वी प्रसाद है। मैदान पर अपनी धारदार गेंदबाजी से विरोधी टीमों के छक्के छुड़ाने वाले वेंकटेश प्रसाद ने अपनी असल जिंदगी में साबित किया कि सच्चा प्यार सामाजिक रूढ़ियों से कहीं ऊपर होता है।
अनिल कुंबले की एक अनौपचारिक पहल से शुरू हुई यह प्रेम कहानी आज भी भारतीय खेल जगत की सबसे खूबसूरत और प्रेरणादायक कहानियों में गिनी जाती है। यह कहानी सिखाती है कि अगर प्यार सच्चा हो और एक-दूसरे के प्रति सम्मान हो, तो समाज की बंदिशें और उम्र का अंतर कोई रुकावट नहीं बन सकता।



















