भारतीय क्रिकेट के इतिहास में कई ऐसे खिलाड़ी रहे हैं, जिनका योगदान हमेशा अविस्मरणीय रहता है, भले ही उन्हें उतनी सुर्खियां न मिली हों। यशपाल शर्मा इसी श्रेणी के एक ऐसे खिलाड़ी थे, जिनकी बल्लेबाजी ने 1983 के विश्व कप के दौरान भारतीय टीम की तकदीर बदल दी थी। वेस्टइंडीज जैसी घातक टीम के खिलाफ भारत को पहली जीत दिलाने में उनकी भूमिका सबसे निर्णायक थी।
लुधियाना से इंटरनेशनल क्रिकेट तक का सफर
यशपाल शर्मा का जन्म लुधियाना, पंजाब में हुआ था। उन्हें बचपन से ही क्रिकेट खेलने का गहरा जुनून था और उन्होंने काफी कम उम्र में ही इसे अपने करियर के रूप में चुनने का फैसला ले लिया था। उस समय भारतीय क्रिकेट खुद को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने के संघर्ष में लगा हुआ था। घरेलू क्रिकेट में अपने लगातार बेहतरीन प्रदर्शन से उन्होंने चयनकर्ताओं का ध्यान खींचा। दिलचस्प बात यह है कि उनके करियर को सही दिशा देने में फिल्म अभिनेता दिलीप कुमार का बड़ा हाथ रहा था। घरेलू मैचों में उनकी बल्लेबाजी से प्रभावित होकर ही दिलीप कुमार ने भारतीय टीम में शामिल करने के लिए उनकी सिफारिश की थी।
1983 विश्व कप के नायक
1983 के वर्ल्ड कप में यशपाल का प्रदर्शन शिखर पर था। टूर्नामेंट के शुरुआती मैच में जब भारत का सामना वेस्टइंडीज से हुआ, तो भारतीय बल्लेबाजी लड़खड़ाती हुई नजर आ रही थी। उस दबाव भरी स्थिति में यशपाल क्रीज पर टिक गए और 120 गेंदों का सामना करते हुए शानदार 89 रनों की पारी खेली। इसी पारी की बदौलत भारत उस मैच को जीतने में कामयाब रहा। इसके बाद सेमीफाइनल मुकाबले में भी उनकी चमक बरकरार रही। उन्होंने इंग्लैंड के खिलाफ नंबर चार पर उतरकर 115 गेंदों में 3 चौकों और 2 छक्कों की मदद से 61 रन बनाए, जिससे भारत ने 6 विकेट से जीत दर्ज कर फाइनल में अपनी जगह पक्की की।
वनडे क्रिकेट का अनूठा रिकॉर्ड
यशपाल शर्मा के नाम एक ऐसा रिकॉर्ड दर्ज है जिसे शायद ही कोई अन्य खिलाड़ी कभी तोड़ पाए। उन्होंने अपने पूरे वनडे करियर में कभी भी अपना खाता खोलने से पहले विकेट नहीं गंवाया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वे हमेशा पिच पर अपना समय बिताने के लिए जाने जाते थे।
करियर के आंकड़े और बाद का योगदान
यशपाल शर्मा ने भारत के लिए 37 टेस्ट मैच खेले, जिसमें 33 की औसत से उन्होंने 1606 रन बनाए, जिसमें 2 शतक और 9 अर्धशतक शामिल थे। वहीं वनडे फॉर्मेट में उन्होंने 42 मुकाबलों में 4 अर्धशतकों के साथ 883 रन बनाए। खेल को अलविदा कहने के बाद भी वे टीम से जुड़े रहे। वे दो बार भारतीय मुख्य चयनकर्ता के पद पर भी रहे, और उनकी देखरेख में ही 2011 में भारतीय टीम ने वनडे विश्व कप का गौरवपूर्ण खिताब जीता। 13 जुलाई, 2021 को दिल का दौरा पड़ने से इस महान खिलाड़ी का निधन हो गया।











