राजधानी दिल्ली के विभिन्न कॉलेजों में पढ़ने वाली छात्राओं का आक्रोश एक बार फिर सड़कों पर दिखाई दे रहा है। कालकाजी मंदिर के समीप स्थित आस्था कुंज पार्क में एक 17 वर्षीय किशोरी के साथ हुई बलात्कार की खौफनाक वारदात ने पूरी दिल्ली को हिलाकर रख दिया है। इस जघन्य अपराध के सामने आने के बाद उच्च शिक्षण संस्थानों की छात्राओं में अपनी हिफाजत को लेकर गहरी बेचैनी और रोष पनप गया है। अलग-अलग परिसरों से निकलकर छात्राएं संगठित हो रही हैं और राजधानी में महिलाओं की जमीनी सुरक्षा व्यवस्था की हकीकत पर सार्वजनिक बहस छेड़ रही हैं।
कानूनी प्रक्रिया और जमानत के नियमों पर कड़े सवाल
प्रदर्शनकारी छात्राओं का विरोध केवल उस एक वीभत्स घटना की निंदा तक सीमित नहीं है, बल्कि वे मौजूदा न्यायिक प्रक्रिया और प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली को भी कठघरे में खड़ा कर रही हैं। छात्राओं का स्पष्ट कहना है कि जब इस तरह के संगीन अपराधों के आरोपियों को अदालत से आसानी से रिहाई मिल जाती है, तो आम महिलाओं का व्यवस्था पर से भरोसा उठने लगता है। विरोध प्रदर्शन के दौरान सामने आए नारों और पोस्टरों में कानूनी सख्ती की मांग प्रमुखता से छाई रही।
“लड़के रेप करने के बाद 20 हजार की बेल पर छूट जाते हैं, क्या लड़कियों की औकात सिर्फ 20 हजार रुपये की है?”
एक छात्रा ने रोष व्यक्त करते हुए यह तीखा सवाल उठाया। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि मामूली मुचलके पर रिहाई का यह चलन समाज में अपराधियों के हौसले बढ़ाता है और पीड़ित लड़कियों की गरिमा को ठेस पहुंचाता है। छात्राओं के अनुसार, न्याय प्रणाली को ऐसे मामलों में यह संदेश देना चाहिए कि महिला सुरक्षा के प्रति किसी भी स्तर पर नरमी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
लड़कियों पर बंदिशों के बजाय लड़कों की जवाबदेही तय करने की मांग
प्रदर्शन के दौरान छात्राओं ने उस सामाजिक परिपाटी की भी कड़ी आलोचना की, जिसमें अपराध होने पर सारा दोष लड़कियों की गतिविधियों पर मढ़ दिया जाता है। उन्होंने रेखांकित किया कि हर ऐसी घटना के बाद समाज लड़कियों को ही घर में रहने, देर रात बाहर न जाने और अतिरिक्त सतर्कता बरतने की नसीहतें देने लगता है। इसके विपरीत, पुरुषों को महिलाओं का आदर करने और कानून के दायरे में जिम्मेदार व्यवहार करने के लिए बाध्य करने पर पर्याप्त चर्चा नहीं होती।
छात्राओं ने कहा कि महिलाओं को बराबरी का इंसान समझने के बजाय उपभोग की वस्तु मानने वाली सोच ही इस प्रकार के अपराधों की जड़ है। उनका तर्क है कि सुरक्षा के बहाने आधी आबादी की आजादी पर अंकुश लगाना किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। कॉलेज परिसरों से शुरू हुआ यह जनआक्रोश अब व्यापक स्तर पर महिला अधिकार, सख्त कानूनी जवाबदेही और सामाजिक नजरिए में बदलाव की निर्णायक मांग बन चुका है।



















