गुजरात के कच्छ जिले से एक बेहद शर्मनाक और दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है, जहां एक आवासीय स्कूल के भीतर आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली 13 साल की मासूम छात्रा के साथ दरिंदगी को अंजाम दिया गया। यह घिनौना मामला रापर तालुका का है, जहां गांधीवादी सिद्धांतों पर चलने का दावा करने वाले और वंचित समाज के बच्चों के उत्थान के लिए काम करने वाले 'ग्राम स्वराज संघ' के आवासीय परिसर में इस वारदात को अंजाम दिया गया। इस सनसनीखेज मामले का खुलासा होने के बाद स्थानीय पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए स्कूल के प्रिंसिपल समेत चार लोगों के खिलाफ सामूहिक दुष्कर्म और अन्य गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
स्वतंत्रता दिवस की तैयारियों के दौरान हुआ सनसनीखेज खुलासा
इस खौफनाक वारदात का पर्दाफाश तब हुआ जब स्कूल परिसर में 15 अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस समारोह के आयोजन की तैयारियां चल रही थीं। तैयारियों के दौरान मैदान में काम कर रही एक महिला शिक्षिका को वहां एक इस्तेमाल की जा चुकी प्रेग्नेंसी टेस्ट किट पड़ी हुई मिली। स्कूल जैसी जगह पर इस तरह की संदिग्ध वस्तु मिलने से चिंतित होकर शिक्षिका ने तुरंत इसकी जानकारी गर्ल्स हॉस्टल की वॉर्डन को दी। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए दोनों ने सच का पता लगाने के लिए स्कूल परिसर में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगालने का फैसला किया।
जब उन्होंने सीसीटीवी फुटेज की बारीकी से जांच की, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। कैमरे की फुटेज में साफ तौर पर देखा गया कि वह प्रेग्नेंसी किट खुद स्कूल के प्रिंसिपल की जेब से नीचे गिरी थी। इस अकाट्य सबूत ने सीधे तौर पर प्रिंसिपल को इस घिनौने कृत्य से जोड़ दिया और हॉस्टल में रहने वाली छात्राओं की सुरक्षा पर बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया। इसके बाद मामले की जानकारी ट्रस्ट के सचिव और कोर कमेटी को दी गई, जिसके बाद धीरे-धीरे यह पूरा मामला पुलिस तक पहुंचा।
मामले को रफा-दफा करने और दबाने का प्रयास
इस बेहद गंभीर और संवेदनशील मामले में स्कूल प्रशासन का रवैया कानून के दायरे से बाहर और असंवेदनशील रहा। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, जब स्कूल प्रबंधन को इस घटना के बारे में पता चला, तो उन्होंने तुरंत पुलिस को सूचित करने के बजाय मामले को दबाने की कोशिश की। कानूनन नाबालिग बच्ची के साथ हुए किसी भी प्रकार के यौन उत्पीड़न की सूचना तुरंत पुलिस को देना अनिवार्य है, लेकिन स्कूल प्रशासन ने इस मामले को अंदरूनी स्तर पर ही रफा-दफा करने का प्रयास किया। उन्होंने आरोपी प्रिंसिपल को पद से केवल सस्पेंड कर दिया और पीड़ित बच्ची को उसके माता-पिता के पास वापस घर भेज दिया ताकि मामला बाहर न आ सके।
रापर पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर आर.एल. खट्टाणा ने स्कूल प्रबंधन के इस कदम पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि चूंकि नाबालिग छात्रा स्कूल प्रशासन की देखरेख और कानूनी कस्टडी में रह रही थी, इसलिए उसके साथ हुए किसी भी अपराध की सूचना पुलिस को देना पूरी तरह से स्कूल प्रबंधन की जिम्मेदारी थी। पुलिस को सूचित न करके, आरोपी को सिर्फ निलंबित करके और बच्ची को घर भेजकर स्कूल प्रशासन ने न केवल न्याय में देरी की बल्कि इस गंभीर अपराध को कानून की नजरों से छिपाने का भी प्रयास किया।
पुलिस की कड़ी कार्रवाई और आरोपियों पर दर्ज हुई एफआईआर
घटना की जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने बिना किसी देरी के कार्रवाई शुरू कर दी। पुलिस ने चाइल्ड वेलफेयर कमेटी की मदद से पीड़ित नाबालिग बच्ची और उसके परिवार से संपर्क स्थापित किया और उनका भरोसा जीता। पूरी स्थिति का आकलन करने और आवश्यक तथ्य जुटाने के बाद, बीते 25 सितंबर को रापर पुलिस स्टेशन में औपचारिक रूप से एफआईआर दर्ज की गई। इस प्राथमिकी में पुलिस ने आरोपी प्रिंसिपल, हॉस्टल वॉर्डन, ट्रस्ट के सचिव और कोर कमेटी के एक सदस्य सहित कुल चार लोगों को नामजद किया है।
सभी आरोपियों के खिलाफ BNS और POCSO एक्ट की कड़ी धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। पुलिस की प्राथमिक जांच में सामने आया है कि आरोपी प्रिंसिपल का घर लड़कियों के हॉस्टल के बेहद करीब स्थित था। इसी का फायदा उठाकर आरोपी प्रिंसिपल ने 15 अगस्त से दो दिन पहले और उसके दो दिन बाद मासूम बच्ची को डरा-धमकाकर हॉस्टल के पीछे एक सुनसान और वीरान जगह पर ले जाकर उसके साथ दुष्कर्म किया था। जांच के दौरान यह भी पता चला कि आरोपी प्रिंसिपल इसी आवासीय स्कूल का पूर्व छात्र रह चुका है। प्रिंसिपल के पद पर पदोन्नत होने से पहले उसने इसी संस्थान में दो साल तक एक शिक्षक के रूप में भी सेवाएं दी थीं।



















