भारत के राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' को लेकर हाल ही में वरिष्ठ अभिनेत्री शर्मिला टैगोर उर्फ आयशा सुल्ताना द्वारा दिए गए बयान ने देश भर में एक नई वैचारिक और सांस्कृतिक चर्चा को जन्म दे दिया है। किसी भी राष्ट्र के लिए उसके राष्ट्रीय प्रतीक केवल शब्दों या ध्वनियों का संग्रह नहीं होते, बल्कि वे उसकी ऐतिहासिक यात्रा, संप्रभुता और जनमानस की चेतना के प्रतीक होते हैं। 19वीं सदी के अंतिम चरण से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति तक, वंदे मातरम भारत के स्वतंत्रता संग्राम का मूल स्वर बना रहा। ऐसे में जब किसी सार्वजनिक मंच पर राष्ट्रीय गीत के स्वरूप और उसकी स्वीकार्यता को लेकर सवाल उठाए जाते हैं, तो इसके ऐतिहासिक संदर्भ, साहित्यिक सौंदर्य और राष्ट्रीय भावना पर गहराई से विचार करना आवश्यक हो जाता है।
स्वतंत्रता संग्राम का अमर प्रतीक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत का इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब देश ब्रिटिश हुकूमत की पराधीनता में जकड़ा हुआ था, तब 'वंदे मातरम' के उद्घोष ने करोड़ों देशवासियों के भीतर देशप्रेम की एक अभूतपूर्व ज्वाला प्रज्वलित की थी। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में रचित इस गीत ने औपनिवेशिक शासन की नींव हिलाकर रख दी थी। इतिहास के पन्नों को देखें तो वर्ष 1905 के ऐतिहासिक बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन से लेकर वर्ष 1947 में देश की आजादी मिलने तक, यह गीत स्वाधीनता सेनानियों का सबसे बड़ा संबल रहा।
ब्रिटिश हुकूमत के क्रूर दमन के बावजूद, भारत माता के अनगिनत वीरों ने मुस्कुराते हुए फांसी के फंदे को गले लगाया और उनके अंतिम शब्द 'वंदे मातरम' ही थे। इस पावन आह्वान ने जाति, संप्रदाय और क्षेत्रीय सीमाओं से ऊपर उठकर देश को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया था। यही कारण है कि इस ऐतिहासिक बलिदानी पृष्ठभूमि वाले गीत को किसी संकीर्ण दृष्टिकोण या धार्मिक चश्मे से देखना उन सभी स्वाधीनता सेनानियों के त्याग का अनादर माना जाता है, जिनकी बदौलत आज भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में सांस ले रहा है।
अभिनेत्री के बयान और धार्मिक दृष्टिकोण पर उठे सवाल
हाल ही में एक मीडिया साक्षात्कार के दौरान वरिष्ठ अभिनेत्री शर्मिला टैगोर उर्फ आयशा सुल्ताना ने वंदे मातरम की पंक्तियों और उसके धार्मिक पक्ष को लेकर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने तर्क दिया कि भारत विभिन्न आस्थाओं और संप्रदायों का देश है, जहां एक ईश्वर में विश्वास रखने वाले एकेश्वरवादी लोग भी बड़ी संख्या में निवास करते हैं। उनके अनुसार, गीत में विभिन्न देवियों के संदर्भ आने के कारण एक ईश्वर को मानने वाले समुदायों के लिए इसकी कुछ पंक्तियों का उच्चारण करना सहज नहीं होता।
अपने विचार को स्पष्ट करते हुए शर्मिला टैगोर ने कहा
"अगर हम भारत में रहने वाले सभी धर्मों के लोगों को एक साथ लेकर चलें, तो पहले दो श्लोक बहुत अच्छे हैं।"
अभिनेत्री का मानना था कि गीत के शुरुआती दो श्लोक सर्वसमावेशी हैं और सभी वर्गों द्वारा आसानी से स्वीकार किए जा सकते हैं, जबकि बाद के श्लोकों में प्रयुक्त धार्मिक संदर्भ बहुदेववाद की ओर संकेत करते हैं। हालांकि, इस दृष्टिकोण पर बुद्धिजीवियों और इतिहासकारों का मानना है कि राष्ट्रीय गीत को 'एकेश्वरवाद बनाम बहुदेववाद' की बहस में खींचना इसके सर्वसमावेशी और व्यापक राष्ट्रीय स्वरूप को सीमित करने जैसा है।
मातृभूमि के प्रति कृतज्ञता और साहित्यिक रूपक का महत्व
वंदे मातरम का सीधा और भावनात्मक अर्थ है 'हे मां! मैं आपको प्रणाम करता हूं' अथवा 'आपकी वंदना करता हूं'। दुनिया की हर महान सभ्यता और संस्कृति में अपनी जन्मभूमि को मां का दर्जा देने की समृद्ध परंपरा रही है। हम जिस धरती का अन्न ग्रहण करते हैं और जिसका जल पीते हैं, उसके प्रति आभार व्यक्त करना किसी विशेष धर्म का अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक नागरिक का सर्वोच्च नैतिक कर्तव्य है।
भारतीय साहित्य और काव्य परंपरा में मातृभूमि को शक्ति, समृद्धि और चेतना के रूपक के रूप में चित्रित करने का सदियों पुराना इतिहास रहा है। गीत के उत्तरार्ध में मातृभूमि की तुलना शक्ति और समृद्धि की देवी के रूप में करना एक विशुद्ध साहित्यिक एवं काव्यात्मक अभिव्यक्ति (मेटाफर) है। इसे संकीर्ण धार्मिक सीमाओं में बांधने के बजाय उस काव्यात्मक भावना के रूप में देखा जाना चाहिए जो अपनी भूमि को सर्वोच्च मानकर उसका वंदन करती है।
राष्ट्रीय प्रतीकों की गरिमा बनाम व्यक्तिगत प्राथमिकताएं
जिस प्रकार भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा देश की अखंडता, संप्रभुता और गौरव का सर्वमान्य प्रतीक है, ठीक उसी प्रकार 'वंदे मातरम' का प्रत्येक शब्द भारतीय चेतना का प्रतिनिधित्व करता है। राष्ट्रीय ध्वज की ही तरह राष्ट्रीय गीत का सम्मान करना भी देश के हर नागरिक का संवैधानिक और नैतिक उत्तरदायित्व है। सिनेमा और मनोरंजन जगत की अपनी एक निश्चित भूमिका हो सकती है, लेकिन राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान की गरिमा कलात्मक प्राथमिकताओं या व्यक्तिगत पसंद से कहीं ऊपर है।
अक्सर यह देखा गया है कि फिल्मी दुनिया से जुड़ी हस्तियां राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर ऐसे वक्तव्य दे देती हैं जो जनभावनाओं को आहत करते हैं। 'वंदे मातरम' कोई बॉलीवुड फिल्म का ट्रैक या कोई व्यावसायिक संगीत एल्बम नहीं है, जिसे किसी व्यक्ति की सुविधा या व्यक्तिगत पसंद के आधार पर आंका जाए। जब कोई जनप्रिय या जाने-माने कलाकार राष्ट्रीय प्रतीकों पर ऐसी टिप्पणियां करते हैं, तो इससे समाज में अनावश्यक भ्रम और विभाजनकारी बहस पैदा होती है, जो देश की सामासिक संस्कृति के लिए उचित नहीं है।
सांस्कृतिक धरोहर और एक भारत का संकल्प
भारत एक विविधताओं से भरा देश है, जहां अनेक भाषाएं, बोलियां, रीतियां और धार्मिक मान्यताएं एक साथ फलती-फूलती हैं। लेकिन जब राष्ट्रीय प्रतीकों की बात आती है, तो वे पूरे देश को एकजुट करने वाली एक अटूट शक्ति के रूप में कार्य करते हैं। लता मंगेशकर से लेकर एआर रहमान जैसे भारत के महान संगीतकारों और गायकों ने 'वंदे मातरम' को अपनी सुरीली धुनों और गायकी से सजाया है। जब भी यह गीत गूंजता है, तो करोड़ों भारतीयों का हृदय देशभक्ति के गर्व से भर उठता है।
वंदे मातरम केवल अतीत का स्मरण कराने वाला कोई ऐतिहासिक दस्तावेज मात्र नहीं है, बल्कि यह भारत के वर्तमान और भविष्य की ऊर्जा का अटूट स्रोत है। इसे किसी संकीर्ण धार्मिक दृष्टिकोण से देखने के बजाय एक ऐसी राष्ट्रीय पहचान के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए जो जाति, धर्म और व्यक्तिगत मान्यताओं की सीमाओं को पार कर हम सभी को केवल और केवल 'भारतीय' होने का गौरव प्रदान करती है।



















