बस्तर अंचल के ग्रामीण जीवन और लोक संस्कृति में 'नाट' नामक पारंपरिक नाट्य कला का एक विशेष स्थान है। क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों, पारंपरिक मड़ई उत्सवों और बड़े मेलों के दौरान नाट का आयोजन बड़े उत्साह के साथ किया जाता है। रात के समय आयोजित होने वाला यह लोक नाटक स्थानीय ग्रामीणों के लिए न केवल मनोरंजन का एक प्रमुख साधन है, बल्कि यह पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने का कार्य भी करता है। इसके माध्यम से रामायण और पुराणों की पौराणिक कथाओं को संगीत और जीवंत अभिनय के जरिए मंच पर प्रस्तुत किया जाता है।
ओडिशा की सांस्कृतिक विरासत और भाषाई संगम
भौगोलिक रूप से ओडिशा राज्य की सीमा के निकट होने के कारण बस्तर की लोक कलाओं और परंपराओं पर ओड़िया संस्कृति का गहरा प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। नाट की ऐतिहासिक जड़ें मूल रूप से ओडिशा से जुड़ी हुई हैं। बस्तर और ओडिशा के बीच के इस सांस्कृतिक जुड़ाव के कारण यहाँ नाट की लोकप्रियता काफी अधिक है। क्षेत्र की भाषाई विविधता को ध्यान में रखते हुए इस नाटक के गीतों में ओड़िया, हल्बी और भतरी भाषाओं का सुंदर समावेश देखने को मिलता है। बादल संस्थान में संस्कृति और लोक कला पर शोध कर रहे योगेश साहनी के अनुसार, यद्यपि नाट मूलतः ओडिशा की परंपरा है, परंतु बस्तर में इसकी स्वीकार्यता इतनी अधिक हो चुकी है कि यहाँ स्थानीय भतरी भाषा में भी नाट का नियमित आयोजन किया जाता है।
रात 10 बजे से सुबह तक का निर्बाध मंचन और गायन परंपरा
नाट की प्रस्तुति शैली और इसका संगीतमय ढांचा इसे अन्य लोक नाट्य रूपों से अलग बनाता है। नाट का प्रदर्शन आमतौर पर रात 10 बजे शुरू होता है और अगली सुबह तक निरंतर चलता रहता है। नाट्य मंडली का संचालन एक मुख्य 'गुरु' करते हैं, जो मंच के पीछे या साथ में रहकर कथा के गीतों का गायन करते हैं। नाटक में अभिनय करने वाले कलाकार पूरी निष्ठा से गुरु द्वारा दिए गए निर्देशों के अनुसार अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। संगीत संयोजन में ढोलक जैसे पारंपरिक लोक वाद्य के साथ-साथ आधुनिक कैसियो का उपयोग भी बखूबी किया जाता है। इस लोक नाट्य की एक और ऐतिहासिक परंपरा यह है कि इसमें पुरुष कलाकार ही महिला पात्रों का रूप धारण कर उनकी भूमिकाएं निभाते हैं।
मड़ई मेलों में प्रतियोगिताएं और व्यावसायिक पहचान
बस्तर में आयोजित होने वाले बड़े मड़ई मेलों के दौरान नाट का आयोजन केवल साधारण प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यहाँ विभिन्न नाट्य मंडलियों के बीच प्रतिस्पर्धा भी होती है। प्रतियोगिता में उत्कृष्ट प्रदर्शन और प्रभावी अभिनय करने वाले कला दलों को इनाम और प्रशस्ति पत्र देकर पुरस्कृत किया जाता है। वर्तमान समय में बस्तर का यह लोक नाट्य न केवल पौराणिक और ऐतिहासिक आख्यानों को दर्शाने का माध्यम है, बल्कि इसे एक व्यावसायिक आधार भी मिल चुका है। आज के दौर में बस्तर में किसी मांगलिक या पारंपरिक अवसर पर एक रात के नाट प्रदर्शन की बुकिंग राशि लगभग 30 हजार रुपये से शुरू होती है, जिससे कलाकारों की आजीविका को संबल मिलता है।



















