तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद का किंग कोठी क्षेत्र अपने एक विशिष्ट धार्मिक स्थल के कारण ऐतिहासिक और वास्तुकला प्रेमियों के बीच विशेष स्थान रखता है। यहाँ स्थित ऐतिहासिक मस्जिद-ए-जूदी अपने भीतर स्थापत्य कला का एक अनोखा उदाहरण समेटे हुए है। इस्लामी शरीयत और धार्मिक परंपराओं के सामान्य नियमों के अनुसार क़ब्रों की सीधी दिशा में अथवा किसी सार्वजनिक क़ब्रिस्तान के भीतर नमाज़ अदा करने से परहेज़ किया जाता है। इसके बावजूद, आसफ़ जाही राजवंश की 32 शाही क़ब्रों वाले इस परिसर में रोज़ाना पाँचों समय की नमाज़ निर्बाध रूप से अदा की जाती है। यह व्यवस्था श्रद्धालुओं और पर्यटकों दोनों के लिए लंबे समय से कौतुहल का विषय बनी हुई है।
धार्मिक मर्यादा और पृथक स्थापत्य की व्यवस्था
इस धार्मिक स्थल पर नमाज़ की पवित्रता और मक़बरों के सम्मान के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए बेहद विचारशील स्थापत्य योजना अपनाई गई है। स्थानीय जानकार मोहम्मद सरवर रज़ा के अनुसार, मस्जिद-ए-जूदी का ढांचा धार्मिक नियमों तथा सामाजिक मर्यादाओं को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था। इस परिसर में इबादत के लिए तय किया गया स्थान और शाही क़ब्रों का अहाता पूरी तरह से दो अलग-अलग हिस्सों में बंटे हुए हैं।
इबादत के दौरान नमाज़ियों की पंक्तियाँ यानी सफ़ें सीधे तौर पर क़ब्रों के सम्मुख नहीं बनती हैं। मस्जिद की मुख्य संरचना और शाही मज़ार के बीच एक स्पष्ट भौतिक दूरी और विभाजन रेखा रखी गई है। स्थापत्य की इस विशेष संरचना के कारण इबादत की शुचिता भी अक्षुण्ण बनी रहती है और साथ ही ऐतिहासिक मक़बरों की गरिमा एवं सम्मान को भी कोई ठेस नहीं पहुँचती है।
सातवें निज़ाम का निर्माण और पारिवारिक इतिहास
मस्जिद-ए-जूदी के निर्माण की पृष्ठभूमि एक भावुक पारिवारिक घटना से जुड़ी हुई है। हैदराबाद के सातवें निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान ने 1930 के दशक में इस विशेष मस्जिद की नींव रखी थी। उन्होंने इस भव्य इबादतगाह का निर्माण अपने नन्हें पुत्र मीर जवाद अली ख़ान की पावन स्मृति में कराया था, जिनका बाल्यावस्था में ही असमय इंतक़ाल हो गया था।
वर्तमान में इस पूरे परिसर के भीतर आसफ़ जाही राजवंश से ताल्लुक रखने वाली कुल 32 शाही क़ब्रें स्थित हैं। इन सभी मक़बरों में सबसे प्रमुख और केंद्रीय मज़ार स्वयं सातवें निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान की है, जो इस स्थान के ऐतिहासिक महत्व को और बढ़ा देती है।
शाही परिवार की अंतिम विश्रामस्थली और वर्तमान स्थिति
सातवें निज़ाम का निधन 24 फ़रवरी 1967 को हुआ था। अपने जीवनकाल में तैयार की गई अंतिम वसीयत के अनुसार, उन्हें प्रसिद्ध मक्का मस्जिद में सुपुर्द-ए-ख़ाक करने के बजाय मस्जिद-ए-जूदी परिसर में ही उनकी वालिदा ज़ोहरा बेगम के मज़ार के समीप दफ़नाया गया। इसके अतिरिक्त, उनकी अहलिया आज़म-उन-निसा बेगम की अंतिम विश्रामस्थली भी इसी परिसर में मौजूद है।
आज भी स्थानीय मुस्लिम समुदाय के लोग इस मस्जिद में पाबंदी के साथ पाँचों वक़्त की नमाज़ अदा करने एकत्र होते हैं। इबादत के पश्चात नमाज़ी यहाँ मदफ़ून सातवें निज़ाम और उनके परिवार के दिवंगत सदस्यों की आत्मा की शांति के लिए दुरूद व फ़ातिहा पेश करते हैं। आस्था, श्रद्धा और स्थापत्य का यह दुर्लभ संगम मस्जिद-ए-जूदी को हैदराबाद की अन्य सभी ऐतिहासिक इमारतों से पृथक और विशिष्ट पहचान प्रदान करता है।



















