राजस्थान की पावन धार्मिक नगरी करौली में रक्षाबंधन का पर्व एक बेहद अनोखे और भक्तिमय रूप में मनाया जाता है। जब देशभर के बाजारों में आधुनिक डिजाइन, प्लास्टिक और रेशम की रंग-बिरंगी राखियों की धूम होती है, तब करौली में सदियों पुरानी एक विशेष पारंपरिक राखी की मांग सबसे ऊपर रहती है। इस खास राखी को 'सोना सरवन' या 'बामन राखी' के नाम से जाना जाता है। आम राखियों के विपरीत, इस राखी का मुख्य उद्देश्य किसी भाई की कलाई पर सजावट करना नहीं होता, बल्कि इसे पूर्ण श्रद्धा भाव से भगवान की कलाई पर अर्पित किया जाता है और पूजनीय पंडितों को बांधा जाता है। करौली की यह पावन परंपरा फैशन के दौर में भी आस्था की अनूठी मिसाल बनी हुई है और स्थानीय धार्मिक पहचान को मजबूती प्रदान करती है।
चार पीढ़ियों से परंपरा को संजोए हुए है पटवा परिवार
करौली की इस ऐतिहासिक और धार्मिक राखी को तैयार करने का कार्य एक स्थानीय पटवा परिवार चार पीढ़ियों से लगातार करता आ रहा है। यह परिवार रक्षाबंधन से लगभग दो महीने पहले ही राखी बनाने की व्यापक तैयारियों में जुट जाता है। त्योहार का समय नजदीक आते ही परिवार के सभी सदस्य दिन-रात मेहनत करके बड़ी संख्या में 'सोना सरवन' और 'बामन राखी' तैयार करते हैं। तैयार की गई इन राखियों की आपूर्ति न केवल करौली के स्थानीय बाजारों में की जाती है, बल्कि आसपास के तमाम ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में भी इन्हें भेजा जाता है। पीढ़ियों से चली आ रही यह हस्तशिल्प कला न केवल इस परिवार की आजीविका का मुख्य साधन बनी हुई है, बल्कि करौली की सांस्कृतिक विरासत को भी जीवंत रखे हुए है।
मशीनों के बिना रुई और धागे से हाथों द्वारा होता है निर्माण
इस पारंपरिक राखी को तैयार करने की पूरी प्रक्रिया ही इसे आधुनिक राखियों से बिल्कुल अलग और पवित्र बनाती है। इसे किसी मशीन या औद्योगिक संयंत्र की मदद से नहीं बनाया जाता, बल्कि शुद्ध रुई और धागे के उपयोग से पूरी तरह हाथों से गढ़ा जाता है। राखी का बुनियादी ढांचा तैयार करने के बाद इसे विभिन्न धार्मिक रंगों में रंगा जाता है। रंगाई की प्रक्रिया पूरी होने के पश्चात इन्हें अलग-अलग लच्छों के रूप में सुव्यवस्थित किया जाता है, ताकि बाजार में बिक्री के लिए भेजा जा सके। इस पूरी प्रक्रिया में अत्यधिक समय, एकाग्रता और शारीरिक श्रम की आवश्यकता होती है, जिसके कारण रक्षाबंधन से दो महीने पूर्व ही इसका उत्पादन शुरू कर दिया जाता है।
ठाकुरजी और पंडितों को अर्पित करने की विशेष धार्मिक मान्यता
करौली में रक्षाबंधन पर 'सोना सरवन' अथवा 'बामन राखी' का विशेष आध्यात्मिक महत्व माना गया है। इस पारंपरिक राखी का उपयोग घरों के पूजा स्थलों से लेकर शहर के प्रसिद्ध देवी-देवताओं के मंदिरों तक में व्यापक रूप से किया जाता है। श्रद्धालु इसे भगवान ठाकुरजी के चरणों और कलाई पर अर्पित कर सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। इसके अलावा स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुसार रक्षाबंधन के शुभ अवसर पर यह राखी कुल पुरोहितों और पंडितों को भी बांधी जाती है। वर्षों पुरानी धार्मिक मान्यताओं से जुड़े होने के कारण त्योहार के सीजन में इसकी मांग में भारी उछाल दर्ज किया जाता है।
परिवार की महिलाओं का योगदान और सामूहिक परिश्रम
पटवा परिवार की वरिष्ठ सदस्य शकुंतला देवी के अनुसार, इस पारंपरिक राखी को स्थानीय बोली में 'बामन राखी' भी कहा जाता है। उन्होंने बताया कि इसे तैयार करने में अत्यधिक मेहनत लगती है और हर एक राखी को हाथों से सहेजकर बनाया जाता है। उत्पादन के इस विशाल कार्य में परिवार के पुरुष सदस्यों के साथ-साथ महिलाएं भी पूरी निष्ठा से भाग लेती हैं। रक्षाबंधन से पहले घर की महिलाएं अपना अधिकांश समय राखियां तैयार करने और उन्हें लच्छों में बांधने में लगाती हैं। परिवार के प्रत्येक सदस्य के इस सामूहिक प्रयास के बल पर ही समय पर बाजार की भारी मांग को पूरा करना संभव हो पाता है।
करोड़ों का वार्षिक उत्पादन और किफायती दामों पर बिक्री
पटवा परिवार के सदस्य विष्णु पटवा ने बताया कि उनके पूर्वज भी इसी श्रद्धा के साथ इस पारंपरिक काम को अंजाम देते आ रहे थे। उनके अनुसार परिवार की ओर से हर साल करोड़ों की संख्या में 'सोना सरवन' और 'बामन राखी' का उत्पादन किया जाता है। रक्षाबंधन के दिनों में अकेले करौली और आसपास के क्षेत्रों में ही इसकी मांग लाखों की संख्या तक पहुंच जाती है। उन्होंने जानकारी दी कि बाजार में इस राखी को करीब 10 रुपये प्रति लच्छा के हिसाब से थोक आपूर्ति में भेजा जाता है, जबकि खुदरा बाजारों में इसका एक पैकेट लगभग 15 से 20 रुपये की किफायती कीमत में उपलब्ध होता है। कम कीमत और उच्च धार्मिक मान्यता के कारण आधुनिक राखियों के दबदबे के बावजूद इसकी लोकप्रियता आज भी बरकरार है।



















