देश के हर नागरिक को मौलिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता के हनन की स्थिति में न्यायपालिका की शरण लेने का पूरा अधिकार है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने सोमवार को इस बात पर जोर दिया कि देश का कोई भी व्यक्ति अगर अपने अधिकारों पर आंच महसूस करता है, तो वह सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है। शीर्ष अदालत ऐसे मामलों पर पूरी निष्पक्षता और स्थापित कानूनी प्रावधानों के अनुरूप सुनवाई करने के लिए प्रतिबद्ध है। दिल्ली में हालिया विरोध प्रदर्शनों के मद्देनजर प्रशासन द्वारा लगाई गई व्यापक बंदिशों और लोगों को हिरासत में लिए जाने के घटनाक्रम के बीच शीर्ष अदालत का यह रुख सामने आया है। जब उनसे यह सवाल किया गया कि क्या राष्ट्रीय राजधानी में मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए नागरिक स्वतंत्रता में बाधा उत्पन्न होने संबंधी याचिकाओं पर विचार किया जाएगा, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसे कई विषय पहले से ही पीठ के समक्ष विचाराधीन हैं।
सीजेआई सूर्यकांत ने इस विषय पर अपनी बात रखते हुए कहा कि अदालत के समक्ष आ रहे कुछ मामलों पर पहले से ही विचार किया जा रहा है और अगर नागरिक स्वतंत्रता के उल्लंघन की कोई शिकायत सामने आती है, तो देश का प्रत्येक नागरिक अदालत का रुख करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। उन्होंने रेखांकित किया कि न्याय पाने का यह अधिकार हर व्यक्ति के पास है और न्यायपालिका विधि सम्मत तरीके से ही आगे बढ़ेगी।
राष्ट्रीय राजधानी में सुरक्षा पाबंदियों और पुलिस कार्रवाई की समीक्षा
शीर्ष अदालत का यह रुख ऐसे संवेदनशील समय पर सामने आया है, जब राष्ट्रीय राजधानी में विरोध प्रदर्शनों से ठीक पहले लागू की गई प्रशासनिक पाबंदियों, वकीलों तथा प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने की घटनाओं और कानून व्यवस्था बनाए रखने के उपायों की गहराई से समीक्षा की जा रही है। दिल्ली के विभिन्न हिस्सों में कड़ी चौकसी और निषेधाज्ञा लागू करने के पुलिस व प्रशासन के फैसलों पर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं। यह पहला मौका नहीं है जब शीर्ष अदालत ने सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और आवश्यक जनसुविधाओं की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए दखल दिया हो। इससे पहले भी इस तरह के टकरावों में अदालत नागरिक अधिकारों और प्रशासनिक जरूरतों के बीच संतुलन तलाशने के निर्देश देती रही है।
वर्तमान कानूनी विवाद दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और विपक्षी इंडिया गठबंधन की ओर से चुनाव आयोग के खिलाफ बुलाए गए विरोध प्रदर्शनों के बाद उपजा है। इन राजनीतिक दलों ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण कार्य में कथित गड़बड़ियों और अनियमितताओं को लेकर आंदोलन का आह्वान किया था। विरोध प्रदर्शनों की घोषणा के बाद कानून व्यवस्था बिगड़ने की आशंका जताते हुए अधिकारियों ने दिल्ली के संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए, रास्ते बंद किए और सख्त पाबंदियां लागू कर दीं। प्रशासन ने इन सख्त कदमों को सार्वजनिक शांति बनाए रखने और संभावित अव्यवस्था से निपटने के लिए आवश्यक कदम बताया था।
सार्वजनिक जीवन, दैनिक आवागमन और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा
मामले की न्यायिक सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने यह बड़ा सवाल उठाया कि नागरिकों के बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकारों और प्रशासनिक पाबंदियों के बीच किस तरह संतुलन साधा जाए। पीठ ने विशेष रूप से इस बात पर गहरी चिंता जताई कि व्यापक सुरक्षा इंतजामों के कारण आम जनता, दफ्तर जाने वालों और दैनिक यात्रियों की आवाजाही पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अदालत ने निर्देश दिया कि यह सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है कि सार्वजनिक परिवहन नेटवर्क और दैनिक जीवन से जुड़ी आवश्यक सेवाएं बिना किसी ठोस कारण के बाधित न हों।
इसी क्रम में शीर्ष अदालत ने संकेत दिए कि वह दिल्ली मेट्रो की सेवाओं को सामान्य बनाए रखने और यात्रियों के निर्बाध आवागमन को सुनिश्चित करने के लिए उचित अंतरिम निर्देश जारी करेगी। सभी संबंधित पक्षों की दलीलें सुनने के उपरांत अदालत इस दिशा में आवश्यक आदेश तय करेगी। अदालत के इस न्यायिक हस्तक्षेप ने यह साफ कर दिया कि भीड़ या प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के प्रशासनिक उपायों को हमेशा संवैधानिक कसौटियों पर परखा जाना चाहिए, जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने के बुनियादी अधिकार शामिल हैं।
मनमानी हिरासत पर सख्त संदेश और संतुलन की आवश्यकता
दिल्ली में प्रदर्शनों के दौरान सुप्रीम कोर्ट से जुड़े वकीलों को हिरासत में लिए जाने के आरोपों के बाद नागरिक अधिकारों को लेकर विमर्श और अधिक गंभीर हो गया। इस घटनाक्रम की जानकारी सामने आने के तुरंत बाद सीजेआई सूर्यकांत ने संज्ञान लेते हुए मामले में हस्तक्षेप किया। अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी नागरिक या पेशेवर को मनमाने तरीके से हिरासत में लिए जाने की कार्रवाई को कतई स्वीकार नहीं किया जाएगा। इस घटना ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया कि क्या प्रदर्शनों में शामिल होने अथवा कानूनी प्रक्रिया के तहत हालात की निगरानी करने वाले वकीलों को अपने वैध अधिकारों के प्रयोग से रोका जा रहा था।
इससे पूर्व 10 अक्टूबर को सीजेपी के आंदोलन से पूर्व लागू पाबंदियों पर हुई सुनवाई के दौरान भी शीर्ष अदालत ने शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था की अनिवार्यता के बीच व्यावहारिक संतुलन बनाने पर बल दिया था। अदालत की इन तल्ख टिप्पणियों ने यह रेखांकित किया कि दिल्ली जैसे सघन आबादी वाले महानगर में कानून व्यवस्था लागू करते समय सिर्फ प्रदर्शनकारियों पर ध्यान केंद्रित करना काफी नहीं है, बल्कि स्थानीय निवासियों, यात्रियों, व्यापारियों और आम कामकाजी लोगों के जीवन पर पड़ने वाले असर को ध्यान में रखना भी उतना ही अनिवार्य है।























