बिहार में मतदाता सूची और एसआईआर से जुड़े मामले में उच्चतम न्यायालय ने नए फॉर्म-6 को लेकर अपनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट कर दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान दो टूक शब्दों में कहा कि अदालत ने इस नए प्रारूप को न तो हरी झंडी दी है और न ही इसे अमान्य घोषित किया है। पीठ ने रेखांकित किया कि न्यायिक टिप्पणियों को अपने हिसाब से अर्थ देकर प्रस्तुत करना पूरी तरह गलत है। इसी पृष्ठभूमि में निर्वाचन आयोग के दावों को चुनौती देते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एक नई जनहित याचिका भी शीर्ष अदालत में दाखिल की गई है।
टिप्पणियों को तोड़-मरोड़कर पेश करने पर पीठ की सख्त हिदायत
सुनवाई के दौरान अदालत कक्ष में मौजूद अधिवक्ताओं और मीडिया को संबोधित करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा, “कृपया सनसनीखेज खबरें बनाने के लिए अदालत के शब्दों को तोड़-मरोड़कर पेश न करें।” पीठ का मानना था कि अदालती कार्यवाही और मौखिक टिप्पणियों को संदर्भ से काटकर प्रसारित करने से जनता के बीच अनावश्यक भ्रम पैदा होता है। न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि जो बात जिस संदर्भ में कही गई हो, उसे उसी रूप में समझा और प्रस्तुत किया जाए।
निर्णय के समय मौजूद नहीं था नया प्रारूप
भ्रम की स्थिति को पूरी तरह समाप्त करते हुए न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने स्पष्टीकरण दिया कि नए फॉर्म-6 पर कोई भी न्यायिक मुहर नहीं लगी है। उन्होंने याद दिलाया कि जब बिहार एसआईआर पर मूल निर्णय पारित किया गया था, उस समय यह नया फॉर्म अस्तित्व में ही नहीं था। इसलिए यह निष्कर्ष निकालना तथ्यात्मक रूप से गलत है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इसे वैध ठहराया है अथवा निरस्त कर दिया है। पीठ के अनुसार, जिस दस्तावेज की समीक्षा न्यायिक प्रक्रिया के तहत हुई ही नहीं, उस पर अदालत की स्वीकृति या अस्वीकृति का दावा करना अनुचित है।
मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ नई जनहित याचिका
मामले में नया मोड़ तब आया जब इस पूरे घटनाक्रम को लेकर अदालत में एक ताजा जनहित याचिका पेश की गई। इस याचिका में सीधे तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पक्षकार बनाया गया है। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील पेश करते हुए कहा कि 5 अक्टूबर को अदालत ने स्वयं स्पष्ट कर दिया था कि नए फॉर्म-6 को कोई न्यायिक अनुमोदन प्राप्त नहीं है। इसके बावजूद निर्वाचन आयोग की ओर से ऐसा माहौल बनाया जा रहा था जैसे शीर्ष अदालत ने इस व्यवस्था पर अपनी सहमति जता दी हो।
मतदाता सूची सुधार और आगे की प्रक्रिया
शीर्ष अदालत के इस रुख के बाद निर्वाचन आयोग द्वारा किए जा रहे दावों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। नए फॉर्म-6 के माध्यम से नाम जोड़ने अथवा हटाने की प्रक्रिया को लेकर अब आयोग को नए सिरे से जवाबदेह होना पड़ेगा। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि मुख्य चुनाव आयुक्त और आयोग इस नई याचिका तथा अदालत की स्पष्ट टिप्पणियों के आलोक में क्या कानूनी रुख अपनाते हैं।






















