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प्रधानमंत्री आवास क्षेत्र की झुग्गी बस्तियां हटाने के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट की राहत, निवासियों को मिले 6 सप्ताह और सावदा घेवरा में पुनर्वासदिल्ली
26 अग॰ 2026, 9:12 am (2 घंटे पहले)· 2

प्रधानमंत्री आवास क्षेत्र की झुग्गी बस्तियां हटाने के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट की राहत, निवासियों को मिले 6 सप्ताह और सावदा घेवरा में पुनर्वास

दिल्ली हाई कोर्ट ने लोक कल्याण मार्ग स्थित तीन झुग्गी बस्तियों के 717 निवासियों को सावदा घेवरा स्थानांतरित होने के लिए छह हफ़्ते की मोहलत दी है। अदालत ने पुनर्वास की प्रक्रिया की निगरानी के लिए एक सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी की अध्यक्षता में कमेटी गठित करने के निर्देश दिए हैं।

देश की राजधानी में लोक कल्याण मार्ग पर स्थित प्रधानमंत्री आवास के निकट बनी तीन प्रमुख झुग्गी बस्तियों को हटाने के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने निवासियों को बड़ी राहत दी है। मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने भाई राम कैंप, मस्जिद कैंप और डीआईडी कॉलोनी के निवासियों को अपने वर्तमान स्थल को खाली करने और सरकार द्वारा आवंटित सावदा घेवरा स्थित नए परिसरों में जाने के लिए छह सप्ताह का समय प्रदान किया है। इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने विस्थापन की प्रक्रिया को सुचारू और पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से एक सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी की अध्यक्षता में विशेष निगरानी समिति गठित करने का स्पष्ट निर्देश जारी किया है।

पुनर्वास की निगरानी के लिए समिति और संवैधानिक अधिकार

उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने इस बात पर विशेष बल दिया कि किसी भी नागरिक का बेदखली या पुनर्वास केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं हो सकती, बल्कि यह पूरी तरह सार्थक और मानवीय होनी चाहिए। अदालत ने रेखांकित किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा प्रत्येक नागरिक को दिए गए जीवन के अधिकार में सम्मान के साथ जीने का अधिकार अनिवार्य रूप से शामिल है। इसी सिद्धांत के तहत, एक पूर्व न्यायिक अधिकारी के नेतृत्व वाली मॉनिटरिंग कमेटी गठित की जा रही है, जो यह सुनिश्चित करेगी कि सावदा घेवरा स्थानांतरित हो रहे परिवारों को सभी तय नागरिक सुविधाएं बिना किसी अड़चन के प्राप्त हों।

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सुरक्षा आधार और केंद्र सरकार के तर्क

मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए वकीलों ने बेदखली की कार्रवाई का कड़ा बचाव किया। अधिकारियों के अनुसार, ये तीनों झुग्गी बस्तियां भारतीय वायु सेना के एक चालू और बेहद संवेदनशील एयर फोर्स स्टेशन से बिल्कुल सटी हुई हैं, जो एक उच्च सुरक्षा क्षेत्र में आती हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा बुनियादी ढांचे को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से इन अनधिकृत निर्माणों को हटाना अत्यंत अनिवार्य हो गया था। सरकार ने अदालत में स्पष्ट किया कि संबंधित स्थान के आसपास कोई अतिरिक्त या उपयुक्त भूमि उपलब्ध न होने के कारण उसी स्थान पर (इन-सीटू) पुनर्वास प्रदान करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं था। इस कारण इन तीन बस्तियों के कुल 717 पंजीकृत निवासियों को शहर के बाहरी इलाके सावदा घेवरा में पुनर्वसित करने की योजना तैयार की गई है।

सावदा घेवरा में बुनियादी सुविधाएं और DUSIB को निर्देश

हालांकि खंडपीठ ने याचिकाकर्ता निवासियों के इस तर्क को खारिज कर दिया कि यह बेदखली 'दिल्ली स्लम एंड JJ पुनर्वास और स्थानांतरण नीति, 2015' के प्रावधानों का उल्लंघन करती है, लेकिन अदालत ने प्रशासनिक अधिकारियों को उनके वादों पर मजबूती से बांध दिया है। उच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि सावदा घेवरा में निवासियों के लिए बिजली आपूर्ति, घरेलू एलपीजी कनेक्शन, बच्चों के लिए नजदीकी स्कूल, सार्वजनिक परिवहन के लिए बस पास, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (डिस्पेंसरी) तथा अन्य बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता के संबंध में दिए गए सभी आश्वासनों को समयबद्ध तरीके से पूरा किया जाए। इसके अलावा, दिल्ली अर्बन शेल्टर इम्प्रूवमेंट बोर्ड (DUSIB) को स्पष्ट हिदायत दी गई है कि वह प्रभावित परिवारों के घरेलू सामान और संपत्ति को सावदा घेवरा स्थित नए आवंटित आवासों तक सुरक्षित पहुंचाने के लिए आवश्यक परिवहन सहायता प्रदान करे।

एकल पीठ के आदेश के खिलाफ अपील की पृष्ठभूमि

यह महत्वपूर्ण आदेश झुग्गी बस्तियों के निवासियों द्वारा दायर की गई उन अपीलों पर आया है, जिनमें एकल न्यायाधीश के 11 मई के फैसले को चुनौती दी गई थी। पूर्व में एकल पीठ ने निवासियों को जगह खाली करने के लिए केवल 15 दिनों की मोहलत दी थी और बेदखली की प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। खंडपीठ ने अपने फैसले में ध्यान दिलाया कि प्रशासन द्वारा पहली बार अक्टूबर 2025 में ही इन अवैध कब्जों को हटाने के संबंध में कारण बताओ और खाली करने के नोटिस जारी कर दिए गए थे। चूंकि इस पूरी प्रक्रिया में पहले ही पर्याप्त समय बीत चुका है, इसलिए अदालत ने निवासियों को नए स्थान पर पूरी तैयारी के साथ स्थानांतरित होने के लिए 15 दिनों की समयावधि को बढ़ाकर अब छह सप्ताह कर दिया है।

सवाल-जवाब

दिल्ली हाई कोर्ट ने झुग्गी बस्तियों को खाली करने के लिए कितना समय दिया है?
हाई कोर्ट ने निवासियों को अपने घर खाली करके सावदा घेवरा जाने के लिए छह सप्ताह का समय दिया है।
किन-किन झुग्गी बस्तियों के निवासियों पर यह आदेश लागू होता है?
यह फैसला लोक कल्याण मार्ग स्थित भाई राम कैंप, मस्जिद कैंप और डीआईडी कॉलोनी के 717 निवासियों पर लागू होता है।
केंद्र सरकार ने बेदखली के पीछे क्या कारण बताया था?
सरकार ने तर्क दिया कि ये झुग्गियां एक सक्रिय एयर फोर्स स्टेशन से सटे सुरक्षा क्षेत्र में हैं और रक्षा बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए इन्हें हटाना जरूरी था।
अदालत ने पुनर्वास प्रक्रिया की निगरानी के लिए क्या व्यवस्था की है?
अदालत ने एक सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी की अध्यक्षता में मॉनिटरिंग कमेटी गठित की है जो सावदा घेवरा में बुनियादी सुविधाओं और पुनर्वास की निगरानी करेगी।
सावदा घेवरा में स्थानांतरित हो रहे लोगों को कौन-कौन सी सुविधाएं दी जाएंगी?
निवासियों को स्कूल, बिजली, एलपीजी कनेक्शन, बस पास, डिस्पेंसरी और घरेलू सामान ले जाने के लिए DUSIB द्वारा परिवहन सहायता प्रदान की जाएगी।
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टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·45 मिनट पहले

प्रधानमंत्री आवास और वायु सेना स्टेशन जैसे उच्च सुरक्षा वाले क्षेत्रों के पास स्थित झुग्गी बस्तियों को हटाने का यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिकों के पुनर्वास अधिकारों के बीच के बारीक संतुलन को रेखांकित करता है। दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा छह सप्ताह की मोहलत देना और पूर्व न्यायिक अधिकारी के नेतृत्व में निगरानी समिति का गठन करना यह सुनिश्चित करता है कि विस्थापन केवल प्रशासनिक कार्रवाई न बनकर मानवीय बने। हालांकि, इन-सीटू पुनर्वास की अनुपलब्धता के कारण 717 परिवारों का सावदा घेवरा जैसे बाहरी इलाके में जाना और वहां बुनियादी सुविधाओं का समय पर मिलना एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती साबित होगा, जिस पर भविष्य में अदालत की कड़ी नजर रहेगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·45 मिनट पहले

राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवीय अधिकारों का यह मामला स्पष्ट करता है कि कानून-व्यवस्था और न्याय प्रणाली के समक्ष सुरक्षा सर्वोपरि है, परंतु अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी की अध्यक्षता में गठित होने वाली मॉनिटरिंग कमेटी की यह जिम्मेदारी होगी कि सावदा घेवरा में बिजली, पानी और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं का समयबद्ध क्रियान्वयन सुनिश्चित हो। यदि प्रशासन तय अवधि में सुविधाएं देने में विफल रहा, तो यह कानूनी पेंच और अदालत की अवमानना का कारण बन सकता है, जिस पर हमारी नजर रहेगी।

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