वैवाहिक रिश्तों की पेचीदगियों और उनके गंभीर परिणामों पर टिप्पणी करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम बात कही है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि शादी एक ऐसा विरोधाभासी रिश्ता है जहां यदि पति-पत्नी अपने मनमुटाव को सही समय पर दूर नहीं करते हैं, तो एक अच्छा जीवनसाथी भी इंसान के लिए जी का जंजाल बन सकता है। न्यायमूर्ति विमल कुमार यादव की सिंगल बेंच ने एक व्यक्ति की आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की है। इस विशेष मामले में निचली अदालत ने एक शख्स को अपनी पत्नी के मुंह में कीटनाशक स्प्रे डालकर उसकी हत्या का प्रयास करने के आरोप में दोषी ठहराया था और उसे तीन साल कैद की सजा सुनाई थी, जिसे हाई कोर्ट ने साक्ष्यों की कमी के आधार पर खारिज कर दिया।
शादीशुदा जीवन और रिश्तों की जटिलताओं पर अदालत के विचार
न्यायमूर्ति विमल कुमार यादव ने अपने फैसले में इस बात पर जोर दिया कि विवाह की पूरी इमारत विश्वास और आपसी भरोसे के मजबूत स्तंभ पर टिकी होती है। जब तक दोनों साथी एक-दूसरे के साथ सुरक्षित महसूस करते हैं, तब तक वैवाहिक जीवन पटरी पर रहता है। हालांकि, यदि इस पवित्र बंधन में अविश्वास या दरार पैदा होने लगे, तो यह केवल पति-पत्नी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे परिवार को गहरी तबाही की ओर धकेल देता है।
अदालत ने कहा कि हालांकि वक्त बड़े से बड़े जख्मों को भर देता है, लेकिन आपसी रिश्तों के मामलों में देरी करना भारी पड़ सकता है और यह कई बार बेहद नकारात्मक परिणाम देता है। यदि छोटे-मोटे विवादों को वक्त रहते नहीं संभाला गया, तो स्थितियां इतनी बिगड़ जाती हैं कि उन पर काबू पाना असंभव हो जाता है। अदालत ने इस बात पर भी अपनी गहरी चिंता व्यक्त की कि वर्तमान समय में दंपतियों के बीच ऐसी हिंसक घटनाएं सामने आ रही हैं, जिनकी कुछ दशक पहले कोई कल्पना तक नहीं कर सकता था।
कीटनाशक पिलाने के आरोप से जुड़े विवाद की पृष्ठभूमि
यह पूरा कानूनी मामला नफे सिंह और उनकी पत्नी के बीच उपजा था, जिनका विवाह साल 2000 में हुआ था। शादी के महज एक साल के भीतर ही दोनों के बीच वैचारिक दूरियां बढ़ने लगीं और संबंध काफी हद तक बिगड़ गए। अभियोजन पक्ष का यह आरोप था कि साल 2001 में हुए एक विवाद के दौरान पति ने पहले तो अपनी पत्नी को गिलास में बेगॉन कीटनाशक पिलाने का प्रयास किया था। जब पीड़ित पत्नी ने उसे पीने से साफ इंकार कर दिया, तो पति ने कथित तौर पर सीधे डिब्बे से कीटनाशक उसके गले में उड़ेल दिया था।
इस सनसनीखेज घटना के बाद पति और उसकी सास के खिलाफ संबंधित धाराओं में एफआईआर दर्ज की गई थी। विचारण के दौरान निचली अदालत ने सास को तो पहले ही आरोपों से मुक्त कर दिया था, लेकिन पति को हत्या के प्रयास के आरोप में तीन साल की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ उसने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
हाई कोर्ट द्वारा आरोपी पति को बरी किए जाने के मुख्य आधार
हाई कोर्ट ने अपील पर विचार करते हुए पाया कि अभियोजन पक्ष ऐसा कोई भी ठोस सबूत पेश करने में पूरी तरह असफल रहा जो आरोपी के जरूरी आपराधिक इरादे और घटना की जानकारी को पुख्ता तौर पर साबित कर सके। अदालत ने यह माना कि कमजोर और अपर्याप्त साक्ष्यों के बल पर किसी व्यक्ति को दोषी करार देना कानून की नजर में बेहद असुरक्षित है। इसी बिनाह पर अदालत ने पति को संदेह का लाभ देते हुए सभी आरोपों से बरी करने का फैसला सुनाया।
दूसरी ओर, आरोपी पति ने अपने ऊपर लगाए गए तमाम आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए उन्हें झूठा बताया था। उसका पक्ष यह था कि उसकी पत्नी उसकी विधवा मां के साथ एक छत के नीचे नहीं रहना चाहती थी। पत्नी की जिद थी कि वे लोग किसी अलग मकान में रहें, और इसी बात को लेकर घर में लगातार झगड़े होते थे। कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी रेखांकित किया कि किसी भी गंभीर अपराध को कानून की अदालत में साबित करने के लिए सिर्फ मौखिक आरोप होना काफी नहीं होता, बल्कि मजबूत सबूतों की जरूरत होती है।



















