उत्तर प्रदेश का ऐतिहासिक शहर आगरा दुनिया भर में अपनी वास्तुकला और मुख्य रूप से ताजमहल के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन इस ऐतिहासिक शहर की पहचान केवल इस विश्व प्रसिद्ध स्मारक तक ही सीमित नहीं है। आगरा में कई अन्य प्राचीन और ऐतिहासिक धरोहरें भी मौजूद हैं, जो देश के इतिहास और शिक्षा प्रणाली के विकास की गवाही देती हैं। इन्हीं में से एक बेहद महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित धरोहर है 176 साल पुराना सेंट जॉन्स कॉलेज। इस संस्थान का इतिहास बेहद समृद्ध और गौरवशाली रहा है, जिससे आज के समय में बहुत कम लोग पूरी तरह वाकिफ हैं। भारत की आजादी से काफी पहले, साल 1850 में स्थापित हुआ यह कॉलेज न केवल शिक्षा का एक बड़ा केंद्र रहा है, बल्कि देश के स्वतंत्रता संग्राम के कई अहम पड़ावों का साक्षी भी रहा है।
कॉलेज की स्थापना और विभिन्न विश्वविद्यालयों से जुड़ाव
सेंट जॉन्स कॉलेज की नींव ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान रखी गई थी। इतिहासकारों के अनुसार, इस कॉलेज की स्थापना साल 1850 में चर्च मिशनरी सोसाइटी द्वारा की गई थी। इस संस्थान की शैक्षणिक यात्रा और इसका प्रशासनिक इतिहास कई बड़े बदलावों से होकर गुजरा है। अपने शुरुआती दौर से लेकर अब तक यह कॉलेज देश के कई शीर्ष विश्वविद्यालयों से संबद्ध रहा है। जब देश में औपचारिक उच्च शिक्षा की शुरुआत हो रही थी, तब इस कॉलेज का संचालन और संबद्धता कलकत्ता विश्वविद्यालय के अधीन थी। इसके बाद, समय और प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुसार इसे इलाहाबाद विश्वविद्यालय से जोड़ दिया गया, जो उस दौर में उच्च शिक्षा का एक अन्य बड़ा और प्रतिष्ठित केंद्र था।
इस ऐतिहासिक कॉलेज के पहले प्रधानाचार्य ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के जाने-माने विद्वान बिशप वैल्फी फ्रेंच थे। उनके कुशल मार्गदर्शन में इस कॉलेज ने शिक्षा के क्षेत्र में नए मापदंड स्थापित किए। समय के साथ जब देश में नए विश्वविद्यालयों का गठन हुआ, तो इस कॉलेज की संबद्धता में भी बदलाव आया। साल 1927 में इस कॉलेज को आगरा विश्वविद्यालय से संबद्ध किया गया। इस विश्वविद्यालय को वर्तमान में डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है, और सेंट जॉन्स कॉलेज आज भी इसी विश्वविद्यालय से संबद्ध होकर अपनी शैक्षणिक सेवाएं दे रहा है।
भव्य वास्तुकला और 'बेबी किला' के नाम से पहचान
सेंट जॉन्स कॉलेज की इमारत केवल एक शैक्षणिक संस्थान नहीं है, बल्कि यह वास्तुकला का एक बेजोड़ नमूना भी है। लाल बलुआ पत्थरों से बनी यह भव्य इमारत अपनी अद्भुत संरचना के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। इतिहासकारों के अनुसार, इस शानदार इमारत का डिजाइन और निर्माण साल 1914 में प्रसिद्ध वास्तुकार सर स्विंटन जैकब द्वारा इंडो-इस्लामिक शैली में कराया गया था। दूर से देखने पर इसकी विशाल दीवारें, मेहराब और नक्काशीदार गुंबद किसी ऐतिहासिक किले का अहसास कराते हैं। लाल पत्थरों की यह खूबसूरत संरचना आज भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
इसकी इसी भव्यता और किले जैसी आकृति के कारण स्थानीय स्तर पर इसके साथ कई दिलचस्प कहानियां भी जुड़ी हुई हैं। आगरा के स्थानीय लोग इस इमारत को प्यार से "बेबी किला" भी कहते हैं। आगरा किले से मिलती-जुलती इसकी बनावट के कारण, पुराने समय में स्थानीय रिक्शा चालक विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए इसे "बेबी किला" कहकर दिखाया करते थे। कॉलेज की यह ऐतिहासिक और खूबसूरत इमारत छात्रों के लिए भी आकर्षण का केंद्र रही है, और आज भी बड़ी संख्या में छात्र यहां दाखिला लेने का सपना देखते हैं। इस प्रतिष्ठित कॉलेज में प्रवेश पूरी तरह से योग्यता यानी मेरिट सूची के आधार पर दिया जाता है।
टेलीग्राफी से लेकर आधुनिक पाठ्यक्रमों तक का सफर
शुरुआती दौर में सेंट जॉन्स कॉलेज में बहुत ही सीमित विषय और पाठ्यक्रम उपलब्ध थे। लेकिन समय की मांग और तकनीकी बदलावों के साथ इस संस्थान ने खुद को ढाला और नए कोर्स शुरू किए। वरिष्ठ इतिहासकार और आगरा कॉलेज के इतिहास विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर अनुराग पालीवाल के अनुसार, साल 1903 में इस कॉलेज में एक बेहद अनोखा कोर्स शुरू किया गया था। उस समय छात्रों को रेलवे में नौकरी पाने के योग्य बनाने के लिए यहां टेलीग्राफी की शिक्षा दी जाती थी।
धीरे-धीरे कॉलेज ने अपने शैक्षणिक दायरे को बढ़ाया। आज के समय में यह कॉलेज एक विशाल शिक्षा केंद्र का रूप ले चुका है, जहां हजारों छात्र-छात्राएं ज्ञान अर्जित कर रहे हैं। वर्तमान में यहां विज्ञान, वाणिज्य और कला संकाय के अंतर्गत कई तरह के स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं।
देश को दिए महान नेता और ऐतिहासिक पलों का गवाह
सेंट जॉन्स कॉलेज का इतिहास केवल बेहतरीन शिक्षा देने तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इस संस्थान ने देश को कई ऐसी महान हस्तियां दी हैं जिन्होंने राष्ट्र निर्माण में अमूल्य योगदान दिया। इस कॉलेज के पूर्व छात्रों की सूची में देश के कई बड़े राजनेता, प्रतिभावान इंजीनियर, जाने-माने डॉक्टर और प्रख्यात वकील शामिल रहे हैं। भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा भी इसी ऐतिहासिक कॉलेज के छात्र रहे थे, जिन्होंने यहां से उच्च शिक्षा प्राप्त की थी।
इस संस्थान के साथ देश के कई अन्य दिग्गज नेताओं के ऐतिहासिक पल भी जुड़े हुए हैं। वरिष्ठ इतिहासकार अनुराग पालीवाल बताते हैं कि साल 1958 में भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने इस कॉलेज में 'शताब्दी विंग' की आधारशिला रखी थी। इसके बाद, साल 1959 में देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इस विंग का उद्घाटन किया था। इस उद्घाटन समारोह के दौरान पंडित नेहरू ने इस कॉलेज को "ज्ञान का मंदिर" कहकर संबोधित किया था। देश के स्वतंत्रता आंदोलन और आधुनिक भारत के निर्माण की कई महत्वपूर्ण घटनाओं का गवाह रहा यह कॉलेज आज भी अपने सुनहरे इतिहास को समेटे हुए शिक्षा की अलख जगा रहा है।











