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अभिनेता संजय मिश्रा ला रहे हैं आत्मकथा, मंच पर राष्ट्रीय सम्मान लेते वक्त याद आए थे पितामनोरंजन
25 सित॰ 2026, 8:41 pm (32 दिन पहले)· 0

अभिनेता संजय मिश्रा ला रहे हैं आत्मकथा, मंच पर राष्ट्रीय सम्मान लेते वक्त याद आए थे पिता

संजय मिश्रा की आत्मकथा 'हम सीखते-सीखते रह गए' का विमोचन अगले वर्ष विश्व पुस्तक मेले में होगा। इस किताब में उन्होंने अपने जीवन, संघर्ष और पिता के साथ गहरे रिश्ते को पिरोया है।

भारतीय सिनेमा, रंगमंच और टेलीविजन जगत में अपने स्वाभाविक अभिनय की गहरी छाप छोड़ने वाले अभिनेता संजय मिश्रा अब अपनी जीवनगाथा को कलमबद्ध कर रहे हैं। कई दशकों के लंबे सफर और राष्ट्रीय पुरस्कार जैसे प्रतिष्ठित मुकाम तक पहुंचने के बाद, उन्होंने अपनी पहली आत्मकथा की औपचारिक घोषणा कर दी है। उनकी यह किताब 'हम सीखते-सीखते रह गए' शीर्षक के तहत पाठकों के बीच आएगी, जिसका प्रकाशन पेंगुइन स्वदेश द्वारा किया जा रहा है।

विश्व पुस्तक मेले में होगा विमोचन

इस बहुप्रतीक्षित आत्मकथा को अगले साल जनवरी माह में आयोजित होने वाले विश्व पुस्तक मेले के दौरान आधिकारिक तौर पर जारी किया जाएगा। लंबे अरसे से पर्दे पर तरह-तरह के किरदारों में जान फूंकने वाले संजय मिश्रा अपनी इस रचना के माध्यम से जीवन के उन अनदेखे अध्यायों को सामने लाएंगे, जो अब तक आम दर्शकों की नजरों से ओझल रहे हैं। पुस्तक में उनके करियर के उतार-चढ़ाव, व्यक्तिगत संघर्ष, विभिन्न दौर के खट्टे-मीठे तजुर्बे और जीवन की महत्वपूर्ण सीखों का गहरा ब्योरा मिलेगा।

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पिता को समर्पित किए जिंदगी के पन्ने

अपनी इस पहली पुस्तक को उन्होंने अपने पिता की पावन स्मृति को समर्पित किया है। अपने जीवन के सबसे बड़े सम्मान के क्षण को साझा करते हुए वे काफी भावुक नजर आए। राष्ट्रीय स्तर पर जब उन्हें रजत कमल प्रदान करने के लिए मंच पर आमंत्रित किया गया था, तो वह पल उनके लिए भावनात्मक रूप से बेहद संवेदनशील था। उन्होंने याद किया कि उस गौरवशाली क्षण में उनके पिता सशरीर मौजूद नहीं थे, लेकिन उनकी आंखों की नमी में समाए हुए थे। अपने पैतृक नाम 'संजय शम्भूनाथ मिश्रा' के उच्चारण के साथ ही उन्हें अपने तमाम बिछड़े आत्मीय जनों की याद सताने लगी थी।

सहज भाषा और आत्मीय शैली में पिरोए संस्मरण

संजय मिश्रा का मानना है कि औपचारिक उच्च शिक्षा की सीमाओं के बावजूद वे अपनी जिंदगी के अहसासों को पूरी शिद्दत से दर्ज करेंगे, ताकि पाठक उनके जज्बातों को सीधे महसूस कर सकें। उनकी लेखन शैली में भी उनके अभिनय जैसी ही सादगी और जमीनी जुड़ाव नजर आता है। पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया की प्रकाशक वैशाली माथुर ने इसे संस्थान के लिए बेहद गर्व का अवसर बताया है। उन्होंने उल्लेख किया कि संजय मिश्रा के पिता ने भी पूर्व में बनारस विषय पर इसी प्रकाशन गृह के साथ एक पुस्तक लिखी थी। अब उसी साहित्यिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए अभिनेता अपने संस्मरणों के जरिए पाठकों को जीवन, संस्कृति और इंसानी संवेदनाओं की समृद्ध दुनिया से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।

सवाल-जवाब

संजय मिश्रा की आत्मकथा का क्या नाम है?
संजय मिश्रा की आत्मकथा का नाम 'हम सीखते-सीखते रह गए' है।
संजय मिश्रा की यह किताब कब और कहां जारी होगी?
यह किताब अगले वर्ष जनवरी में आयोजित होने वाले विश्व पुस्तक मेले में जारी की जाएगी।
इस पुस्तक का प्रकाशन कौन सा संस्थान कर रहा है?
इस पुस्तक का प्रकाशन पेंगुइन स्वदेश द्वारा किया जा रहा है।
संजय मिश्रा ने अपनी यह किताब किसे समर्पित की है?
उन्होंने अपनी इस आत्मकथा को अपने पिता की स्मृति को समर्पित किया है।
संजय मिश्रा के पिता ने किस विषय पर पुस्तक लिखी थी?
संजय मिश्रा के पिता ने पेंगुइन के लिए बनारस विषय पर पुस्तक लिखी थी।
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