उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले में स्थित एक बेहद खास और प्राचीन मंदिर इन दिनों श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र बना हुआ है। इस धार्मिक स्थल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां आने वाले भक्तों को एक ही स्थान पर भगवान शिव के सभी बारह ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करने का दुर्लभ अवसर प्राप्त होता है। यह पावन मंदिर न सिर्फ अपनी दिव्यता के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इसका इतिहास सीधे तौर पर महाभारत काल की पौराणिक कथाओं से भी जुड़ा हुआ है। मिनी काशी के रूप में पहचानी जाने वाली फर्रुखाबाद की इस पावन नगरी में सावन के महीने के दौरान लाखों शिव भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं और भगवान भोलेनाथ की आराधना करते हैं।
मंदिर के महंत उमेश शर्मा के अनुसार, इस ऐतिहासिक मंदिर की स्थापना पांडवों के अज्ञातवास और वनवास के दिनों में हुई थी। उस दौर में यह पूरा इलाका घने जंगलों से घिरा हुआ था और यहां आसपास कुम्हारों की एक बस्ती हुआ करती थी। उसी स्थान पर माता कुंती अपने पांचों पुत्रों यानी पांडवों के साथ रुकी थीं। माता कुंती ने ही अपने पुत्रों को उस स्थान पर भगवान शिव के शिवलिंग की स्थापना करने का निर्देश दिया था। इसके बाद युधिष्ठिर द्वारा लाए गए पावन शिवलिंग की स्थापना ऋषि धौम्य के मार्गदर्शन और मंत्रोच्चार के बीच की गई थी। समय के साथ इसी पावन स्थल को पांडेश्वर नाथ मंदिर के नाम से जाना जाने लगा।
इस धार्मिक स्थल का महत्व इसलिए भी बहुत अधिक बढ़ जाता है क्योंकि इसका सीधा नाता महाभारत काल की घटनाओं से है। इतिहास के पन्नों को खंगाले तो पता चलता है कि सदियों पहले जब आधुनिक फर्रुखाबाद शहर बसा भी नहीं था, तब इस भूभाग पर एक विशाल प्राचीन पीपल के पेड़ के पास बने चबूतरे पर पांडवों ने इन दिव्य शिवलिंगों की स्थापना की थी। मंदिर में पीढ़ी दर पीढ़ी सेवा दे रहे स्थानीय लोगों का कहना है कि उनके पूर्वज भी इसी मंदिर की सेवा में समर्पित रहे थे। मंदिर से जुड़े सेवादार अंकुश बताते हैं कि उनके बाबा और दादी भी यहां भगवान की सेवा किया करते थे और अब वह खुद भी इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए शिव आराधना में लीन रहते हैं।
सावन के पवित्र महीने में इस मंदिर की महत्ता और अधिक बढ़ जाती है और यहां का माहौल पूरी तरह से भक्तिमय हो जाता है। महंत उमेश शर्मा ने जानकारी दी है कि सावन का यह पावन महीना बेहद खास है क्योंकि इसका आरंभ और समापन दोनों ही विशेष पूजन कार्यक्रमों के साथ होते हैं। सावन के दिनों में यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं का तांता लगना शुरू हो जाता है। सुबह होते ही तड़के 4:30 बजे से ही भक्त मंदिर परिसर में कतारबद्ध होकर भगवान शिव के दर्शन और पूजन के लिए जुटने लगते हैं और अपनी हाजिरी लगाते हैं।
धार्मिक मान्यताओं और इतिहास के जानकारों के अनुसार, प्राचीन काल में गंगा नदी के तट के पास ही राजा द्रुपद का किला हुआ करता था और साथ ही ऋषि धौम्य का आश्रम भी वहीं पास में स्थित था। पांडवों ने अपने वनवास काल का एक लंबा हिस्सा इसी क्षेत्र में व्यतीत किया था। उस समय उनकी दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उस स्थान पर तीन प्रमुख कुएं हुआ करते थे जो जल की जरूरत को पूरा करते थे। आज भी इस परंपरा का निर्वहन करते हुए आसपास के क्षेत्रों के तमाम श्रद्धालु गंगा नदी के तट से पवित्र जल भरकर लाते हैं और पांडेश्वर नाथ मंदिर में पहुंचकर भगवान शिव का रुद्राभिषेक करते हैं। ऐसी दृण मान्यता है कि जो भी भक्त सच्ची श्रद्धा के साथ इस मंदिर में आता है, उसकी सभी मनोकामनाएं भगवान शिव निश्चित रूप से पूरी करते हैं।


















