भारतीय सिनेमा जगत में अपनी लीक से हटकर कहानियों के लिए पहचाने जाने वाले जाने-माने फिल्ममेकर अनुराग कश्यप ने अपनी कला के दम पर एक मुकाम हासिल किया है। आज उनके 54वें जन्मदिन के अवसर पर उनके शुरुआती दिनों के कड़े संघर्ष और सफलता की कहानी पर नजर डालते हैं। वह केवल एक निर्देशक ही नहीं, बल्कि एक मंझे हुए निर्माता, लेखक और अभिनेता भी हैं। हिंदी सिनेमा को ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’, ‘देव डी’ और ‘ब्लैक फ्राइडे’ जैसी कल्ट फिल्में देने वाले इस निर्देशक के काम को दर्शक बेहद पसंद करते हैं।
उत्तर प्रदेश से मुंबई तक का सफर
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में 10 सितंबर 1972 को जन्मे अनुराग कश्यप ने अपनी स्कूली शिक्षा देहरादून के ग्रीन स्कूल और ग्वालियर के सिंधिया स्कूल से पूरी की थी। उनके पिता की नौकरी ऐसी थी कि उनका बचपन देश के कई अलग-अलग शहरों में बीता। साल 1993 में अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने सपनों की नगरी मुंबई का रुख किया था। हालांकि, उनका यह शुरुआती सफर बेहद कठिनाइयों से भरा रहा और वह अपनी जेब में मात्र पांच हजार रुपये लेकर मायानगरी पहुंचे थे।
जब सड़कों और फुटपाथ पर गुजारनी पड़ी थीं रातें
आज के समय में करोड़ों और अरबों की संपत्ति के मालिक अनुराग कश्यप बेहद आलीशान जीवन जीते हैं। लेकिन एक ऐसा दौर भी था जब उन्हें रहने के लिए छत नहीं मिलने के कारण सड़कों और फुटपाथ पर सोकर रातें बितानी पड़ती थीं। उन्होंने अभावों से निकलकर सफलता की बुलंदी तक पहुंचने का यह सफर काफी संघर्षों के बाद तय किया है। फिल्म इंडस्ट्री में कुछ ही ऐसे निर्देशक हैं जिन्होंने अपनी अलग सोच और अनोखे अंदाज से खास जगह बनाई है, और उनमें अनुराग कश्यप का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। उन्होंने खुद एक साक्षात्कार में इस बात का खुलासा किया था कि शुरुआती दिनों में उन्हें किन मुश्किलों का सामना करना पड़ा था, और आज वह देश के सबसे चर्चित फिल्ममेकर्स में शुमार हैं।
मनोज बाजपेयी की सिफारिश ने पलट दी बाजी
साल 1998 में अनुराग कश्यप के जीवन में बड़ा बदलाव आया जब अभिनेता मनोज बाजपेयी ने निर्देशक राम गोपाल वर्मा के सामने उनके नाम की जोरदार सिफारिश की। उस दौरान मनोज बाजपेयी राम गोपाल वर्मा के साथ काम कर रहे थे और उन्होंने एक नए लेखक के तौर पर अनुराग का नाम सुझाया था। इसके बाद अनुराग को लोकप्रिय फिल्म ‘सत्या’ की स्क्रिप्ट पर काम करने का बड़ा अवसर मिला। इस प्रोजेक्ट के बाद उन्होंने धीरे-धीरे लेखन की दुनिया में अपनी पकड़ मजबूत की। उन्होंने ‘ऑटो नारायण’ जैसे प्रोजेक्ट पर भी काम किया और इसके बाद कई फिल्मों की पटकथा लिखीं। हालांकि, फिल्म ‘सत्या’ उनके फिल्मी सफर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई।
लेखक से लेकर निर्देशन की दुनिया तक का सफर
यह फिल्म न केवल मनोज बाजपेयी के अभिनय करियर को एक नई ऊंचाइयों पर ले गई, बल्कि अनुराग कश्यप को भी इंडस्ट्री में एक स्थापित और मजबूत लेखक के रूप में पहचान दिलाई। ‘सत्या’ की सफलता के बाद उन्होंने ‘शूल’ और ‘कौन’ जैसी चर्चित फिल्मों के लिए भी बेहतरीन काम किया। समय के साथ अनुराग ने निर्देशन के क्षेत्र में भी कदम रखा और ‘देव डी’, ‘गुलाल’, ‘ब्लैक फ्राइडे’ और ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ जैसी फिल्मों का निर्देशन करके अपनी एक अलग सिनेमाई पहचान बनाई, जो आज भी दर्शकों के जेहन में ताजा हैं।



















