सूफी गायक कैलाश खेर की कहानी सुनने वालों को हैरान कर देती है, क्योंकि सुरों की यह दुनिया उन्हें एक नाकाम कारोबार और गहरे डिप्रेशन से होकर गुजरने के बाद मिली थी। आज वह हिंदी समेत 20 से ज्यादा भाषाओं में 700 से अधिक गाने गा चुके हैं, लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने से पहले उन्होंने बहुत कुछ खोया और फिर खुद को नए सिरे से गढ़ा।
संगीत से भरा बचपन
कैलाश खेर का जन्म 7 जुलाई 1973 को उत्तर प्रदेश के मेरठ में हुआ था। उनके पिता मेहर सिंह खेर लोक गायक थे, इसलिए घर का माहौल शुरू से ही संगीतमय रहा। बचपन से सुर-ताल के बीच पले-बढ़े कैलाश खेर का रुझान भी कम उम्र में ही संगीत की तरफ हो गया था, लेकिन उन्होंने अपने करियर की शुरुआत गाने से नहीं बल्कि कारोबार से करने का फैसला किया।
कारोबार में हुआ नुकसान, फिर डिप्रेशन का दौर
संगीत छोड़कर कैलाश खेर ने अपने एक दोस्त के साथ मिलकर हैंडीक्राफ्ट एक्सपोर्ट का बिजनेस शुरू किया। उन्हें भरोसा था कि यह कारोबार उन्हें आर्थिक तौर पर मजबूत बनाएगा, लेकिन योजना के उलट बिजनेस पूरी तरह ठप हो गया और उन्हें बड़ा आर्थिक झटका लगा। इस नाकामी ने सिर्फ उनकी जेब पर ही नहीं बल्कि उनकी मानसिक सेहत पर भी गहरा असर डाला। कैलाश खेर धीरे-धीरे डिप्रेशन में चले गए और खुद को अंदर से पूरी तरह टूटा हुआ महसूस करने लगे।
ऋषिकेश की यात्रा ने बदली जिंदगी
इस मुश्किल दौर से बाहर निकलने के लिए कैलाश खेर ने कुछ वक्त के लिए मुंबई और अपने बिजनेस से दूरी बना ली और ऋषिकेश चले गए। वहां उन्होंने गंगा के किनारे साधु-संतों के साथ लंबा वक्त बिताया। भजन, कीर्तन और वहां के आध्यात्मिक माहौल ने उन्हें भीतर से नई ऊर्जा दी और टूटे हुए मन को सहारा दिया। इसी दौर में उन्होंने तय किया कि अब वह अपनी बाकी जिंदगी पूरी तरह संगीत को समर्पित कर देंगे।
मुंबई में शुरू हुआ नया सफर
साल 2001 में कैलाश खेर एक बार फिर मुंबई पहुंचे, लेकिन इस बार इरादा कारोबार का नहीं बल्कि संगीत में करियर बनाने का था। शुरुआती दिन आसान नहीं थे। उन्होंने विज्ञापनों के लिए जिंगल्स गाकर और छोटे-छोटे प्रोजेक्ट्स करके अपनी पहचान बनानी शुरू की। धीरे-धीरे उनकी दमदार आवाज संगीत जगत के लोगों तक पहुंचने लगी और उन्हें फिल्मों में गाने गाने के मौके मिलने लगे।
'रब्बा इश्क ना होवे' से मिली पहचान, फिर रातों-रात बने स्टार
कैलाश खेर को उनका पहला बड़ा मौका फिल्म 'अंदाज' के गाने 'रब्बा इश्क ना होवे' से मिला। इस गाने ने उन्हें फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने में मदद की। इसके बाद आया गाना 'अल्लाह के बंदे हंस दे', जिसने पूरे देश में उन्हें एक नई पहचान दिलाई। यह गाना इतना पसंद किया गया कि कैलाश खेर लगभग रातों-रात स्टार बन गए। इसके बाद उन्होंने 'तेरी दीवानी', 'सैयां', 'बम लहरी' और 'जय जयकारा' जैसे कई गाने गाए, जो सुपरहिट साबित हुए।
'कैलासा' बैंड और 700 से ज्यादा गाने
अपनी अलग पहचान बनाने के लिए कैलाश खेर ने 'कैलासा' नाम से खुद का बैंड भी बनाया। इस बैंड के जरिए उन्होंने सूफी और लोक संगीत को नए और आधुनिक अंदाज में श्रोताओं तक पहुंचाया। अब तक कैलाश खेर हिंदी समेत 20 से ज्यादा भाषाओं में 700 से अधिक गानों को अपनी आवाज दे चुके हैं। इसके साथ ही उन्होंने देश-विदेश में हजारों लाइव कॉन्सर्ट भी किए हैं, जिनमें उनकी दमदार आवाज सुनने के लिए बड़ी तादाद में लोग जुटते रहे हैं।
पद्मश्री समेत मिले कई बड़े सम्मान
संगीत की दुनिया में कैलाश खेर के योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाजा। इसके अलावा उन्हें फिल्मफेयर समेत कई और बड़े पुरस्कार भी मिल चुके हैं। बॉलीवुड के अलावा उन्होंने भक्ति, सूफी और लोक संगीत की दुनिया में भी अपनी अलग पहचान बनाई है, और आज भी 'तेरी दीवानी', 'सैयां', 'अल्लाह के बंदे', 'बम लहरी' और 'जय जयकारा' जैसे उनके गाने लोगों की प्लेलिस्ट का हिस्सा बने हुए हैं।
हार से जीत तक का सफर
कैलाश खेर की कहानी यह सिखाती है कि हालात चाहे कितने भी मुश्किल क्यों न हो जाएं, अगर हौसला और जुनून बना रहे तो जिंदगी दोबारा शुरुआत करने का मौका जरूर देती है। एक नाकाम कारोबार और डिप्रेशन से निकलकर सूफी संगीत के बादशाह बनने तक का उनका सफर आज भी लाखों लोगों के लिए मिसाल है।











