आज के डिजिटल दौर में जहां कोई भी व्यक्ति कुछ मिनट भी बिना मोबाइल या इंटरनेट के रहने की सोच नहीं सकता, वहीं भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक ऐसी ब्लॉकबस्टर फिल्म की रचना की गई जिसने सफलता के सभी पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. हम बात कर रहे हैं हाल ही में रिलीज हुई बेहद चर्चित फिल्म 'हनुमान अंश' की, जिसने अपनी बेहतरीन कहानी और आध्यात्मिक जुड़ाव से दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचने में सफलता हासिल की है. इस शानदार प्रोजेक्ट के लेखक, निर्देशक और निर्माता विशाल चतुर्वेदी हैं, जिन्होंने इस फिल्म को तैयार करने के लिए एक बेहद अनोखा और कठिन रास्ता चुना. उन्होंने खुद को बाहरी शोरगुल और आधुनिक उपकरणों से पूरी तरह दूर रखकर एक ऐसी कहानी लिखी, जिसने बॉक्स ऑफिस पर 200 करोड़ रुपये से अधिक की शानदार कमाई का नया आंकड़ा छू लिया है. भारतीय सिनेमाघर इन दिनों एक अभूतपूर्व सांस्कृतिक और आध्यात्मिक लहर का अनुभव कर रहे हैं, जहां दर्शकों का हुजूम फिल्म को देखने के लिए उमड़ रहा है.
आधुनिक तकनीक और इंटरनेट से बना ली थी दूरी
विशाल चतुर्वेदी ने इस फिल्म की पटकथा लिखने के दौरान जो तरीका अपनाया, वह आज के समय में लगभग नामुमकिन सा लगता है. जब वह नीम करोली बाबा के जीवन और उनकी पवित्र शिक्षाओं से प्रेरित इस कहानी को पन्नों पर उतार रहे थे, तब उन्होंने सबसे पहले अपने आसपास के सारे डिजिटल डिवाइसों को खुद से दूर कर दिया था. उनके कमरे में न तो कोई कंप्यूटर था, न लैपटॉप और न ही कोई दूसरा गैजेट. उन्होंने इस आध्यात्मिक यात्रा को बिल्कुल पारंपरिक शैली में ढालने का फैसला किया. विशाल ने पूरी कहानी को अपने हाथों से पेन और कागज का उपयोग करके लिखा. वह हर दिन नोट्स और सीन को कागज पर लिखते थे और फिर अपने सहायक को उन पन्नों की तस्वीरें भेजते थे. उनका सहायक उन हाथ से लिखे नोट्स को देखकर उन्हें डिजिटल रूप में टाइप करता था. इस अनोखे और शांत वातावरण ने उन्हें बिना किसी भटकाव के सीधे अपनी कहानी के मूल भाव पर ध्यान केंद्रित करने में मदद की.
पहले सीन को लिखने में क्यों लगे पूरे 45 दिन?
इस फिल्म के लेखन की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसकी शुरुआत करना सबसे कठिन साबित हुआ. विशाल चतुर्वेदी के अनुसार, पूरी पटकथा लिखना तो बहुत तेजी से संपन्न हो गया, लेकिन फिल्म के पहले दृश्य को अंतिम रूप देने में उन्हें पूरे 45 दिनों का लंबा समय लग गया. उनका स्पष्ट मानना था कि किसी भी फिल्म का पहला सीन ही दर्शकों को कहानी से जोड़ता है और आगे की पूरी यात्रा की नींव रखता है. अगर पहला दृश्य कमजोर रह जाए, तो दर्शकों की रुचि खत्म हो जाती है. यही वजह थी कि उन्होंने इस पर काफी मेहनत की. एक बार जब 45 दिनों की कड़ी मशक्कत के बाद पहला दृश्य पूरी तरह तैयार हो गया, तो उसके बाद का रास्ता बेहद आसान हो गया. इसके बाद की पूरी स्क्रिप्ट लिखने में उन्हें सिर्फ 15 से 20 दिनों का समय लगा और कहानी खुद-ब-खुद कागज पर उतरती चली गई.
निर्माताओं का अटूट भरोसा और गहरा अध्ययन
'हनुमान अंश' की इस बेमिसाल कहानी को सिर्फ एक कल्पना के तौर पर नहीं लिखा गया था, बल्कि इसके पीछे बहुत गहन शोध और वर्षों की पढ़ाई शामिल थी. विशाल चतुर्वेदी ने नीम करोली बाबा के जीवन दर्शन को गहराई से समझने के लिए व्यापक अध्ययन किया. इस पूरी प्रक्रिया में उन्हें अपने फिल्म निर्माताओं का भी भरपूर समर्थन मिला. निर्माताओं ने विशाल पर कहानी को जल्दबाजी में पूरा करने का कोई दबाव नहीं डाला. उन्होंने विशाल को अपनी रचनात्मकता का खुलकर उपयोग करने की पूरी छूट दी, जिससे वह बिना किसी तनाव के इस शानदार और संवेदनशील विषय पर काम कर सके. उनका यह दृष्टिकोण पूरी तरह से रंग लाया और आज यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर नए कीर्तिमान स्थापित कर रही है.
बॉक्स ऑफिस पर रचा नया कीर्मान
7 अगस्त को सिनेमाघरों में दस्तक देने वाली इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर जो करिश्मा किया है, वह ऐतिहासिक है. धीरे-धीरे दर्शकों का दिल जीतने वाली 'हनुमान अंश' ने अब तक 173 करोड़ रुपये से अधिक का शुद्ध कलेक्शन कर लिया है. वहीं, अगर भारत में इसके सकल (ग्रॉस) कलेक्शन की बात करें तो यह आंकड़ा 200 करोड़ रुपये की बड़ी सीमा को पार कर चुका है. इस फिल्म की अपार सफलता ने यह साफ कर दिया है कि किसी भी फिल्म के हिट होने के लिए विशाल बजट या नामचीन कलाकारों की फौज होना जरूरी नहीं है. अगर फिल्म की कहानी में सच्चाई हो, समर्पण हो और वह दर्शकों की भावनाओं से सीधे तौर पर जुड़ने में सक्षम हो, तो वह सफलता की नई ऊंचाई छू सकती है. हाथ से लिखे गए उन सादे पन्नों में जो भक्ति और निष्ठा छिपी थी, उसने आज भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक नया स्वर्णिम अध्याय जोड़ दिया है.



















