भारतीय संगीत जगत में अपनी अनूठी गायकी और असीम बहुमुखी प्रतिभा के दम पर करोड़ों दिलों पर राज करने वाले महान गायक एसपी बालासुब्रमण्यम की 25 सितंबर को पुण्यतिथि है। उनका संपूर्ण जीवन सुरों की अनवरत साधना का ऐसा असाधारण दस्तावेज रहा है, जिसने भारतीय सिनेमा की कई पीढ़ियों को मंत्रमुग्ध किया। संगीत और कला के क्षेत्र में दिए गए उनके ऐतिहासिक योगदान को मान्यता देते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री, पद्म भूषण और मरणोपरांत देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से अलंकृत किया। इसके साथ ही उन्होंने अपने पूरे जीवनकाल में छह बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार हासिल करने की अद्वितीय उपलब्धि भी दर्ज की।
चार अलग भाषाओं में छह राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतने का कीर्तिमान
एसपी बालासुब्रमण्यम की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि उन्होंने केवल एक क्षेत्र या भाषा तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्हें जिन छह राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा गया, वे अलग-अलग भाषाओं की फिल्मों के गानों के लिए थे। इस ऐतिहासिक सफर की शुरुआत साल 1979 में तेलुगु फिल्म ‘शंकराभरणम’ से हुई थी, जिसके जरिए उन्हें पहला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। इसके फौरन बाद उत्तर भारत और बॉलीवुड में भी उनकी मखमली आवाज का जादू सिर चढ़कर बोलने लगा।
साल 1981 में रिलीज हुई हिंदी फिल्म ‘एक दूजे के लिए’ के मशहूर गीत ‘तेरे मेरे बीच में’ ने पूरे देश को उनका दीवाना बना दिया और इसके लिए उन्हें बेस्ट मेल प्लेबैक सिंगर का राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया गया। इसके बाद तेलुगु सिनेमा में उनकी बादशाहत लगातार कायम रही। साल 1983 में उन्होंने फिल्म ‘सागर संगमम’ और फिर साल 1988 में आई फिल्म ‘रुद्रवीणा’ के गीतों के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार अपने नाम किए। किसी भी किरदार के हाव-भाव और मिजाज के अनुकूल अपनी आवाज को ढाल लेने का उनका फन उन्हें अपने दौर के अन्य सभी गायकों से मीलों आगे रखता था।
दो दशकों तक लगातार चलता रहा राष्ट्रीय सम्मान का सफर
राष्ट्रीय मंच पर अपनी गायकी का परचम लहराने का यह सिलसिला लगभग बीस वर्षों तक अनवरत चलता रहा। साल 1995 में कन्नड़ फिल्म ‘संगीत सागर गानयोगी पंचाक्षर गवई’ में गाए गीतों के लिए उन्हें एक बार फिर बेस्ट मेल प्लेबैक सिंगर चुना गया। इस ऐतिहासिक सफर का छठा राष्ट्रीय पुरस्कार उन्हें इसके ठीक अगले ही साल 1996 में तमिल फिल्म ‘मिनसारा कनवु’ के चर्चित गीत ‘थंगा थमराई’ के लिए मिला। इस तरह उन्होंने तेलुगु, हिंदी, कन्नड़ और तमिल जैसी चार प्रमुख भारतीय भाषाओं में गाए गानों के दम पर छह राष्ट्रीय ट्रॉफियां अपने नाम कीं।
सिनेमाई पुरस्कारों के अलावा राष्ट्र निर्माण और सांस्कृतिक समृद्धि में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने साल 2001 में उन्हें पद्म श्री और साल 2011 में पद्म भूषण से सम्मानित किया। 25 सितंबर 2020 को उनका देहांत हो गया, जिसके बाद केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति सचिवालय की आधिकारिक अधिसूचना जारी कर साल 2021 में उन्हें मरणोपरांत पद्म विभूषण सम्मान से नवाजा।
राज्य स्तरीय सम्मान और अनगिनत उपाधियां
फिल्म उद्योग और संगीत सभाओं में एसपी बालासुब्रमण्यम का कद बेहद विशाल था। आंध्र प्रदेश सरकार के प्रतिष्ठित नंदी अवॉर्ड्स में उनका दबदबा कई वर्षों तक देखा गया, जहां उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने विभिन्न श्रेणियों में कुल 25 नंदी पुरस्कार जीते। इसके अतिरिक्त तमिलनाडु सरकार ने उन्हें अपने सर्वोच्च सांस्कृतिक सम्मान कलैमामणि अवॉर्ड से सम्मानित किया, जबकि साल 2008 में कर्नाटक सरकार ने उन्हें प्रतिष्ठित कर्नाटक राज्योत्सव अवॉर्ड प्रदान किया। इसके साथ ही कई विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधियां और अनगिनत अन्य प्रतिष्ठित सम्मान भेंट किए।
पांच दशकों का शानदार सफर और 40 हजार से अधिक गाने
एसपी बालासुब्रमण्यम का कलात्मक सफर पांच दशकों से भी अधिक समय तक फैला रहा। इस दौरान उन्होंने 16 विभिन्न भाषाओं में 40 हजार से ज्यादा गानों की रिकॉर्डिंग करके गायकी के इतिहास में एक नया मील का पत्थर स्थापित किया। हालांकि उनकी पहचान केवल एक पार्श्व गायक तक ही सीमित नहीं रही। उन्होंने कई फिल्मों में यादगार अभिनय किया, संगीत निर्देशन की बागडोर संभाली, फिल्मों के लिए डबिंग की और निर्माता के तौर पर फिल्म निर्माण में भी अपना उल्लेखनीय योगदान दिया। भले ही 25 सितंबर 2020 को वे इस भौतिक दुनिया को अलविदा कह गए, लेकिन उनके गाए कालजयी गीत आज भी करोड़ों श्रोताओं के दिलों में जीवित हैं।


















