मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा में पर्व-त्योहारों का ताना-बाना दशकों से बॉक्स ऑफिस पर भावनात्मक अपील पैदा करने का अचूक जरिया रहा है। दशकों तक पारिवारिक और रोमांटिक पटकथाओं में करवा चौथ के व्रत, दीवाली के उत्सव, होली के रंगों और लोहड़ी की अग्नि के इर्द-गिर्द भावनात्मक ड्रामे रचे जाते रहे हैं। 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे', 'हम दिल दे चुके सनम', 'बागवान' और 'बीवी नंबर 1' जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों ने इस सांस्कृतिक खांचे को सिनेमाई फलक पर मजबूती से स्थापित किया था। हालांकि वर्ष 2026 के दौर में हिंदी फिल्म उद्योग अपनी रचनात्मक परिधि का विस्तार करते हुए पूर्वांचल और बिहार के सबसे प्रतिष्ठित महापर्व छठ की ओर कदम बढ़ाता नजर आ रहा है।
बड़े बजट की फिल्मों में छठ अनुष्ठान की नई शुरुआत
इस ताजा सिनेमाई रुझान की शुरुआत तब चर्चा में आई जब अभिनेता सिद्धार्थ मल्होत्रा और अभिनेत्री तमन्ना भाटिया अभिनीत बहुप्रतीक्षित प्रोजेक्ट 'द वन' का गीत 'छठी मैया' सार्वजनिक पटल पर जारी हुआ। गायक विशाल मिश्रा के सुरों से सजे इस संगीत ट्रैक में पारंपरिक अनुष्ठानों को केंद्र में रखा गया है, जिसमें तमन्ना भाटिया पारंपरिक वेशभूषा में अर्घ्य देने के पूरे विहंगम दृश्य को साकार करती दिखी हैं। इस रिलीज के फौरन बाद एक अन्य महत्वपूर्ण फिल्म 'ये प्रेम मोल लिया' के शीर्षक गीत में भी यही मिजाज दोहराया गया। इसमें आयुष्मान खुराना और शरवरी वाघ पवित्र घाटों पर आस्था के इस महापर्व से जुड़ी विधियों को निभाते हुए दर्शकों के सामने आए हैं। दो बड़े समकालीन प्रोजेक्ट्स में इस तरह की सांस्कृतिक झांकी का एक साथ उभरना मात्र इत्तेफाक नहीं, बल्कि बदलती सिनेमाई सोच को रेखांकित करता है।
सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव और पटकथा की जरूरत
'द वन' के निर्माताओं का तर्क है कि मुख्यधारा के विशालकाय हिंदी सिनेमा में छठ पूजा को इतनी भव्यता और प्रमुखता से पहले कभी पेश नहीं किया गया था। लेखक और निर्माता अरुणाभ कुमार ने इस पूरे संदर्भ पर प्रकाश डालते हुए स्पष्ट किया कि इसे केवल किसी सतही आकर्षण के लिए कहानी में नहीं जोड़ा गया है। उनका कहना है कि वे स्वयं बिहार की मिट्टी से ताल्लुक रखते हैं, जिसके चलते इस पवित्र अनुष्ठान को पर्दे पर उतारने से पहले उन्होंने कई बार मंथन किया। इस उत्सव में शामिल गहरी श्रद्धा और प्रकृति से जुड़े वैज्ञानिक पहलुओं की समझ होने के कारण फिल्मांकन के वक्त हर छोटी-बड़ी बारीकी का विशेष ध्यान रखा गया। अरुणाभ कुमार ने रेखांकित किया कि कथानक का कालखंड ही इस महापर्व की अवधि में घटित होता है, जिसके चलते यह स्वाभाविक रूप से कहानी की रीढ़ बन गया।
अतीत के पन्नों में छठ का सिनेमाई सफर
हालांकि यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है कि भारतीय सिनेमा ने छठ को पहली बार 2026 में ही पहचाना है। ऐतिहासिक दस्तावेजों पर नजर डालें तो इस महापर्व की उपस्थिति दशकों पुरानी रही है। साल 1961 में प्रदर्शित हुई फिल्म 'भैया' में छठ के अनुष्ठानों पर आधारित एक गीत शामिल किया गया था, जिसके बोल 'सुपवे नरियरवे' थे। उस दौर के कृष्ण-धवल दृश्यों में पूरी सादगी के साथ सूप और डलिया में नैवेद्य लेकर घाटों तक जाने और जल में खड़े होकर सूर्य वंदना करने के दृश्य दर्ज किए गए थे। उस गीत में विख्यात गायिका ऊषा मंगेशकर ने अपनी मधुर आवाज दी थी, जिसका संगीत निर्देशन बी.एन शर्मा ने संभाला था। वहीं इस पारंपरिक रचना के बोल प्रेम धवन और विंध्यवासिनी देवी की कलम से निकले थे। उस ऐतिहासिक प्रयोग और आज के प्रस्तुतिकरण में मुख्य अंतर यह है कि अब इसे एक विशालकाय मेनस्ट्रीम ब्लॉकबस्टर के प्रमुख गाने के रूप में तराशा जा रहा है।
दर्शकों की नई ताकत और बॉक्स ऑफिस का भूगोल
सिनेमा उद्योग की इस रणनीति के पीछे दर्शकों की जनसांख्यिकी और आर्थिक समीकरण भी छिपे हैं। बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश की हिंदी भाषी पट्टी किसी भी फिल्म की व्यावसायिक सफलता तय करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जब कन्नड़ फिल्म उद्योग के यश अथवा तेलुगु सिनेमा के अल्लू अर्जुन जैसे बड़े पैन-इंडिया सितारे अपनी फिल्मों के प्रचार के लिए इन राज्यों के छोटे शहरों का रुख करते हैं, तो यह बात स्वतः सिद्ध हो जाती है कि जमीनी दर्शकों की उपेक्षा संभव नहीं है। आधिकारिक आंकड़ों का विश्लेषण करें तो उत्तर प्रदेश सरकार के अनुसार, उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और मुंबई मिलकर फिल्मों की कुल टिकट बिक्री का एक अहम हिस्सा जुटाते हैं। इन क्षेत्रों के संयुक्त योगदान से किसी भी फिल्म की बॉक्स ऑफिस कमाई का लगभग 60% हिस्सा निकलकर आता है। ऐसे में क्षेत्रीय आस्था के प्रतीकों को बड़े कैनवास पर उभारना सीधे तौर पर करोड़ों दिलों को छूने की कवायद है।
थिएटरों का अभाव और पटना से जुड़ा मंदिर का कथानक
सिनेमाई वितरण की जटिलताओं पर बात करते हुए जाने-माने गीतकार जावेद अख्तर पहले ही यह चिंता जाहिर कर चुके हैं कि हमारे देश में विशाल दर्शक वर्ग के अनुपात में सिनेमाघरों की भारी किल्लत है। इस संरचनात्मक कमी के कारण सुदूर कस्बों के लोग बड़े पर्दे तक पहुंच ही नहीं पाते। इसका एक ज्वलंत उदाहरण उत्तराखंड का बागेश्वर नगर है, जहां घनी आबादी और बड़ा बाजार होने के बावजूद एक भी सिंगल स्क्रीन अथवा मल्टीप्लेक्स थिएटर मौजूद नहीं है। भारत भर में ऐसे अनेक नगर हैं जहां सिनेमा प्रेमियों को स्क्रीन नसीब नहीं होती। इन सबके बीच फिल्मों की विषयवस्तु स्थानीय भूगोल को प्रमुखता दे रही है। उदाहरण के लिए 'द वन' की कथाभूमि बिहार की राजधानी पटना से लगभग 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित करीब 400 साल पुराने एक देवी मंदिर और उससे जुड़ी पौराणिक मान्यताओं के ताने-बाने पर आधारित है। यही वजह है कि जब कहानी का आधार ही इस अंचल का है, तो महापर्व छठ का गीत उसमें आत्मा की तरह घुलमिल गया है।


















