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धर्मेंद्र के चुलबुले अंदाज और राजेश खन्ना की देरी पर जया प्रदा ने खोले पुराने राजमनोरंजन
21 सित॰ 2026, 4:04 am (37 दिन पहले)· 0

धर्मेंद्र के चुलबुले अंदाज और राजेश खन्ना की देरी पर जया प्रदा ने खोले पुराने राज

जया प्रदा ने एक टेलीविजन शो में पुराने दिनों को याद करते हुए बताया कि धर्मेंद्र सबसे ज्यादा फ्लर्ट करते थे और राजेश खन्ना सेट पर रात को पहुंचते थे।

हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर के पर्दे के पीछे के किस्से सिनेमा प्रेमियों को हमेशा आकर्षित करते हैं। मशहूर अभिनेत्री जया प्रदा ने एक टेलीविजन कार्यक्रम के दौरान बीते जमाने के दिग्गज अभिनेताओं के कामकाज के तौर-तरीकों और अपने शुरुआती संघर्ष से जुड़े कई रोचक संस्मरण साझा किए। सोशल मीडिया पर दोबारा चर्चा में आए इस प्रसंग में उन्होंने उस दौर के सह-कलाकारों के स्वभाव, सेट पर उनके आने के समय और खुद के बेहद व्यस्त कामकाजी दिनचर्या का विस्तृत ब्योरा दिया।

सह-कलाकारों का मिजाज और सेट पर पहुंचने की आदतें

सिनेमा जगत में जितेंद्र, ऋषि कपूर और राजेश खन्ना जैसे दिग्गजों के साथ काम कर चुकीं और बाद में राजनीति का रुख करने वाली जया प्रदा एक बार राज बब्बर के साथ 'द कपिल शर्मा शो' में अतिथि के रूप में शामिल हुई थीं। बातचीत के दौरान जब उनसे यह पूछा गया कि उस दौर में सबसे ज्यादा फ्लर्ट कौन सा अभिनेता करता था, तो अभिनेत्री पहले तो थोड़ी झिझकीं, लेकिन फिर मुस्कुराते हुए उन्होंने धर्मेंद्र का नाम लिया। इस बेबाक जवाब को सुनकर वहां मौजूद दर्शक और साथी कलाकार अपनी हंसी नहीं रोक पाए।

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इसी बातचीत को आगे बढ़ाते हुए जब उनसे सेट पर सबसे देर से पहुंचने वाले कलाकार के बारे में सवाल किया गया, तो उन्होंने बिना किसी संकोच के राजेश खन्ना का नाम लिया। इस खुलासे के साथ ही उन्होंने दोनों कलाकारों के काम करने की भिन्न कार्यशैली को भी सामने रखा।

सुबह की तैयारी और रात को शूटिंग की चुनौती

दक्षिण भारतीय सिनेमा से अपने अभिनय करियर की शुरुआत करने वाली जया प्रदा ने बताया कि उन्हें सुबह तड़के सेट पर पहुंचने का अनुशासन सिखाया गया था। वह सामान्यतः सुबह 7 बजे तक शूटिंग स्थल पर पहुंच जाया करती थीं। मुंबई में काम करते समय जब उन्हें सुबह 9 बजे का कॉल टाइम मिलता था, तो वह समय से पहुंचकर अपना पूरा मेकअप और परिधान तैयार कर लेती थीं।

इसके विपरीत, राजेश खन्ना अक्सर काफी देर से आते थे और कई बार वह रात करीब 8 बजे सेट पर कदम रखते थे। जया प्रदा के अनुसार, सेट पर आने के बाद राजेश खन्ना पहले वड़ा पाव खाते थे, उसके बाद केवल एक शॉट फिल्माते थे और रात 9 बजे के आसपास काम समेटकर पैक-अप कर दिया जाता था। दिनभर तैयार होकर इंतजार करने के बाद इस तरह की कार्यशैली का सामना करना उनके लिए एक अनोखा और असहज अनुभव रहता था।

पांच शिफ्टों का काम और थका देने वाला सफर

अपने करियर के शुरुआती दौर को याद करते हुए जया प्रदा ने उस समय की शारीरिक और मानसिक चुनौतियों पर भी खुलकर बात की। उन्होंने खुलासा किया कि वह एक ही दिन में पांच अलग-अलग शिफ्टों में काम किया करती थीं, जिसके कारण उन्हें बिना रुके एक लोकेशन से दूसरी लोकेशन की यात्रा करनी पड़ती थी।

अपनी प्रसिद्ध फिल्म 'शराबी' के निर्माण के दिनों का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि उनका यात्रा कार्यक्रम कितना थका देने वाला होता था। वह शाम को ऊटी से ट्रेन लेकर चेन्नई पहुंचती थीं। चेन्नई हवाई अड्डे पर स्नान करने के बाद वह अगली उड़ान पकड़ती थीं और यात्रा के दौरान ही अपना मेकअप पूरा करती थीं। इसके बाद कोयंबटूर पहुंचकर वह सीधे शूटिंग स्थल पर काम शुरू करती थीं। उन दिनों आधुनिक सुविधाओं के अभाव में लगातार यात्रा करते हुए कई परियोजनाओं को संभालना बेहद कठिन काम था।

सवाल-जवाब

जया प्रदा ने सबसे ज्यादा फ्लर्ट करने वाला अभिनेता किसे बताया?
जया प्रदा ने मुस्कुराते हुए धर्मेंद्र को उस दौर का सबसे ज्यादा फ्लर्ट करने वाला अभिनेता बताया।
सेट पर सबसे देर से कौन सा अभिनेता पहुंचता था?
जया प्रदा के अनुसार, राजेश खन्ना सेट पर सबसे ज्यादा देर से आते थे और कई बार वह रात 8 बजे पहुंचते थे।
राजेश खन्ना सेट पर आने के बाद क्या करते थे?
वह सेट पर आकर पहले वड़ा पाव खाते थे, फिर केवल एक शॉट देते थे और रात करीब 9 बजे काम खत्म कर देते थे।
जया प्रदा के सेट पर पहुंचने का सामान्य समय क्या होता था?
दक्षिण के अनुशासन के कारण वह सुबह 7 बजे पहुंच जाती थीं और मुंबई में 9 बजे के कॉल टाइम पर पूरी तरह तैयार रहती थीं।
फिल्म 'शराबी' के समय जया प्रदा का यात्रा कार्यक्रम कैसा था?
वह ऊटी से ट्रेन लेकर चेन्नई जाती थीं, एयरपोर्ट पर नहाकर फ्लाइट में मेकअप करती थीं और फिर कोयंबटूर पहुंचकर शूटिंग करती थीं।
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टिप्पणियाँ 5

Kavya Nair@kavya-nair·36 दिन पहले

यह लेख भारतीय सिनेमा के स्वर्ण युग के एक अनूठे पहलू को उजागर करता है, जो फिल्म पर्यटन और स्टूडियो संस्कृति के विकास को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। उस दौर के सेट की कार्यशैली और सितारों के तौर-तरीके आज के सुनियोजित फिल्म निर्माण और वैश्विक पर्यटन रुझानों से पूरी तरह भिन्न हैं। इस तरह के संस्मरण सिने-पर्यटन को बढ़ावा देने वाले स्थानों और ऐतिहासिक स्टूडियो दौरों के प्रति दर्शकों की रुचि को और अधिक गहरा करते हैं।

Arjun Mehta@arjun-mehta·36 दिन पहले

यह संस्मरण मात्र फिल्मी किस्सागोई नहीं, बल्कि उस दौर की उस संगठनात्मक और श्रम-संस्कृति का दस्तावेज है जहाँ अनुशासन और अनियंत्रित स्टारडम के बीच संतुलन बनाना कलाकारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी। जब कोई कलाकार एक ही दिन में पांच-पांच शिफ्टों और भारी भौगोलिक दूरियों के बीच समन्वय बैठाता है, तो वह केवल कला नहीं बल्कि भीषण शारीरिक व मानसिक श्रम का संस्थागत रूप होता है।

Tanvi Desai@tanvi-desai·36 दिन पहले

जया प्रदा के ये खुलासे उस दौर की कार्यसंस्कृति और स्टारडम के अंतर्विरोधों को बहुत करीब से दिखाते हैं। जहाँ एक ओर दक्षिण भारतीय सिनेमा से प्रशिक्षित अभिनेत्रियों का कड़ा अनुशासन था, वहीं मुंबई के मुख्यधारा के सितारों की अपनी अलग टाइमिंग और शैली हुआ करती थी। इस तरह के किस्से केवल पुरानी यादें नहीं हैं, बल्कि यह बताते हैं कि कैसे अलग-अलग कार्यप्रणालियों के बीच सामंजस्य बैठाकर फिल्मों का निर्माण होता था। वर्तमान ओटीटी और डिजिटल युग की अनुशासित शूटिंग संस्कृतियों की तुलना में यह अतीत का एक बेहद दिलचस्प और व्यावहारिक पहलू है।

Aisha Khan@aisha-khan·36 दिन पहले

तनवी के इस विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए यह देखना दिलचस्प है कि कैसे इन पुरानी कार्यशैलियों की यादें आज के सोशल मीडिया दौर में तुरंत वायरल कंटेंट बन जाती हैं। जब दिग्गज कलाकार चैट शो में ऐसे संस्मरण साझा करते हैं, तो यह दर्शकों को वर्तमान नियंत्रित और कॉर्पोरेट-संचालित ओटीटी संस्कृतियों के विपरीत उस दौर के स्टारडम और सहज अराजकता की एक झलक देता है। यह प्रवृत्ति साबित करती है कि पुरानी पीढ़ियों के पर्दे के पीछे के किस्से आज भी बॉक्स ऑफ़िस और पॉप कल्चर की चर्चाओं को बड़े पैमाने पर आकर्षित करने की क्षमता रखते हैं।

Sneha Kulkarni@sneha-kulkarni·36 दिन पहले

यह साक्षात्कार केवल पुरानी यादों का पिटारा नहीं है, बल्कि उस दौर की कार्यसंस्कृति और आज की ओटिटी तथा स्टूडियो प्रणाली में आए बड़े बदलाव को रेखांकित करता है। दक्षिण और मुंबई सिनेमा की कार्यशैली का यह अंतर बताता है कि कैसे अनुशासन और स्टार कल्चर ने दशकों तक फ़िल्म निर्माण की गति को प्रभावित किया है।

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