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दुर्गा खोटे: कम उम्र में पति को खोने के बाद रूढ़ियों से लड़कर बनीं भारतीय सिनेमा की सशक्त पहचानमनोरंजन
22 सित॰ 2026, 12:15 am (23 मिनट पहले)· 0

दुर्गा खोटे: कम उम्र में पति को खोने के बाद रूढ़ियों से लड़कर बनीं भारतीय सिनेमा की सशक्त पहचान

दुर्गा खोटे ने महज 21 साल की उम्र में विधवा होने के बाद सामाजिक विरोध के बावजूद सिनेमा जगत में कदम रखा और अपने यादगार किरदारों से दादा साहेब फाल्के पुरस्कार तक का सफर तय किया।

भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर में जब संभ्रांत और पारंपरिक परिवारों की महिलाओं का फिल्मों में अभिनय करना सामाजिक दृष्टि से स्वीकार्य नहीं था, तब दुर्गा खोटे ने अकेले दम पर अपने बच्चों की परवरिश के लिए अभिनय को अपना पेशा बनाया। जन्म के समय वीटा लाड नाम पाने वाली इस कलाकार का थिएटर और अभिनय के प्रति लगाव बचपन में ही शुरू हो गया था, जब वह अपने पिता के साथ विभिन्न नाटक देखने जाया करती थीं। कम उम्र में ही उनका विवाह विश्वनाथ खोटे के साथ हुआ और इस शादी से उनके दो बेटे हुए। हालांकि, वैवाहिक जीवन अधिक समय तक सामान्य नहीं रह सका और केवल 21 वर्ष की आयु में ही पति के निधन के बाद वह विधवा हो गईं। दो छोटे बच्चों के लालन-पालन का भार और आर्थिक आत्मनिर्भरता की सख्त जरूरत ने उन्हें सिनेमा के क्षेत्र में उतरने का साहसी कदम उठाने के लिए प्रेरित किया।

पहली फिल्म की नाकामी और सामाजिक विरोध का सामना

साल 1931 में दुर्गा खोटे ने अपनी पहली फिल्म ‘फरेबी जाल’ के जरिए फिल्मी दुनिया में पदार्पण किया। बॉक्स ऑफिस और दर्शकों के बीच यह फिल्म सफल नहीं रही और इसे बेहद खराब प्रतिक्रिया मिली। उनकी आत्मकथा ‘मी दुर्गा खोटे’ में इस कठिन दौर का विस्तार से उल्लेख मिलता है। उस दौर में लाड और खोटे दोनों ही घराने समाज में काफी प्रतिष्ठित और सम्मानित माने जाते थे, जिसके चलते एक कुलीन परिवार की महिला के फिल्मों में काम करने को लेकर पहले से ही लोगों के बीच चर्चाएं चल रही थीं। पहली ही फिल्म के विफल होते ही महाराष्ट्रीयन समाज के एक बड़े वर्ग की भारी नाराजगी उनके ऊपर टूट पड़ी। सामाजिक असंतोष का आलम यह था कि उनके लिए अपने घर की दहलीज पार करना और बाहर निकलना तक दूभर हो गया था, जिससे वह एक तरह से घर में ही कैद होकर रह गई थीं।

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‘अयोध्येचा राजा’ से मिला बड़ा ब्रेक और मील के पत्थर

शुरुआती नाकामी और सामाजिक बंदिशों के बावजूद दुर्गा खोटे ने हार नहीं मानी और जल्द ही उनके करियर को एक ऐतिहासिक मोड़ मिला। साल 1932 में प्रदर्शित हुई मराठी सिनेमा की युगांतरकारी फिल्म ‘अयोध्येचा राजा’ में उन्होंने महारानी तारामती का अहम किरदार निभाया। इस भूमिका ने दर्शकों और समीक्षकों का दिल जीत लिया और उन्हें एक संजीदा व सम्मानित अभिनेत्री के तौर पर स्थापित कर दिया। इसके उपरांत उन्होंने ‘माया मच्छिंद्र’, ‘अमर ज्योति’, ‘भारत मिलाप’, ‘सीता’ और ‘पृथ्वी वल्लभ’ जैसी कई उल्लेखनीय कृतियों में अपने अभिनय का लोहा मनवाया। आगे चलकर उन्होंने भारतीय सिनेमा के इतिहास में दर्ज कुछ बेहद प्रतिष्ठित किरदार निभाए, जिनमें ‘मुगल-ए-आजम’ की महारानी जोधाबाई और ‘भरत मिलाप’ में कैकेयी का जीवंत चित्रण शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘बिदाई’, ‘बावर्ची’, ‘बॉबी’, ‘अभिमान’ और ‘कर्ज’ जैसी लोकप्रिय फिल्मों में भी उनके अभिनय की अमिट छाप रही। फिल्म ‘बिदाई’ में अपने उत्कृष्ट अभिनय के लिए उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का पुरस्कार भी प्रदान किया गया।

निर्देशन, राष्ट्रीय सम्मान और आखिरी सफर

दुर्गा खोटे ने अपनी कला को केवल कैमरे के सामने अभिनय करने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि फिल्म निर्माण के तकनीकी और रचनात्मक पक्षों में भी सक्रिय भागीदारी निभाई। उन्होंने वर्ष 1937 में ‘साथी’ नामक फिल्म का स्वयं निर्माण और निर्देशन करके एक नई मिसाल कायम की। अपने करियर के परवर्ती वर्षों में उन्होंने विज्ञापनों, वृत्तचित्रों और टेलीविजन प्रोजेक्ट्स के निर्माण में भी अपना उल्लेखनीय योगदान दिया। कला के क्षेत्र में उनकी अप्रतिम सेवाओं को मान्यता देते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1968 में पद्मश्री सम्मान से नवाजा। इसके बाद वर्ष 1983 में उन्हें भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से विभूषित किया गया, जो भारत सरकार के डायरेक्टरेट ऑफ फिल्म फेस्टिवल के आधिकारिक अभिलेखों में भी दर्ज है। उनकी आखिरी प्रदर्शित फिल्म वर्ष 1983 में आई ‘दौलत के दुश्मन’ थी। सिनेमा जगत को अपने योगदान से समृद्ध करने वाली यह महान अभिनेत्री 22 सितंबर 1991 को 86 वर्ष की आयु में इस दुनिया को अलविदा कह गईं।

सवाल-जवाब

दुर्गा खोटे का असली नाम क्या था और उन्हें अभिनय की प्रेरणा कहां से मिली?
दुर्गा खोटे के जन्म का नाम वीटा लाड था। बचपन में अपने पिता के साथ नाटक और थिएटर देखने जाने के दौरान उनके भीतर अभिनय के प्रति रुचि जागी थी।
दुर्गा खोटे ने फिल्मों में काम करने का फैसला किन परिस्थितियों में लिया?
मात्र 21 साल की उम्र में पति विश्वनाथ खोटे के निधन के बाद दो बेटों की परवरिश और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने के लिए उन्होंने फिल्मों में काम करने का निर्णय लिया।
दुर्गा खोटे की पहली फिल्म कौन सी थी और उसे कैसी प्रतिक्रिया मिली?
उनकी पहली फिल्म 1931 में रिलीज हुई ‘फरेबी जाल’ थी, जो दर्शकों को पसंद नहीं आई और बॉक्स ऑफिस पर असफल रही।
पहली फिल्म के बाद दुर्गा खोटे को किन सामाजिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा?
उनकी आत्मकथा ‘मी दुर्गा खोटे’ के अनुसार, प्रतिष्ठित परिवार से होने के कारण फिल्म की विफलता के बाद उन्हें समाज की नाराजगी झेलनी पड़ी और उनका घर से निकलना तक मुश्किल हो गया था।
दुर्गा खोटे के अभिनय करियर को किस फिल्म से नई दिशा मिली?
साल 1932 में रिलीज हुई मराठी फिल्म ‘अयोध्येचा राजा’ में महारानी तारामती का किरदार निभाने के बाद उनके करियर को नई दिशा और पहचान मिली।
दुर्गा खोटे को कौन से बड़े राष्ट्रीय और सिनेमाई पुरस्कार मिले?
उन्हें 1968 में पद्मश्री, 1983 में दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड और फिल्म ‘बिदाई’ के लिए फिल्मफेयर बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था।
क्या दुर्गा खोटे ने निर्देशन के क्षेत्र में भी काम किया था?
हां, उन्होंने वर्ष 1937 में ‘साथी’ नामक फिल्म का निर्माण और निर्देशन किया था, और बाद के वर्षों में विज्ञापन, डॉक्यूमेंट्री तथा टीवी प्रोजेक्ट्स भी बनाए।
दुर्गा खोटे की अंतिम फिल्म कौन सी थी और उनका निधन कब हुआ?
उनकी अंतिम फिल्म ‘दौलत के दुश्मन’ 1983 में रिलीज हुई थी और 22 सितंबर 1991 को 86 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।
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