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ग्वालियर से वैश्विक मंच तक: कैसे उस्ताद अमजद अली खान बने शास्त्रीय संगीत के सिरमौरमनोरंजन
9 अक्तू॰ 2026, 5:08 am (19 दिन पहले)· 2

ग्वालियर से वैश्विक मंच तक: कैसे उस्ताद अमजद अली खान बने शास्त्रीय संगीत के सिरमौर

ग्वालियर में जन्मे उस्ताद अमजद अली खान ने पारंपरिक सरोद वादन को नई दिशा दी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संगीत का परचम लहराया।

भारतीय शास्त्रीय रागों की दुनिया में जब भी सरोद का जिक्र आता है, उस्ताद अमजद अली खान की धुनें अपने आप जेहन में गूंजने लगती हैं। उनके वादन में परंपरा का गहरा अनुशासन और तारों पर उंगलियों की ऐसी सहज हरकत देखने को मिलती है जिसने दुनिया भर के श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया है। अपनी इसी बेमिसाल साधना की बदौलत उन्होंने संगीत प्रेमियों के बीच सरोद सम्राट के रूप में खास पहचान कायम की।

संगीत के आंगन में बीता बचपन और विरासत

मध्य प्रदेश के सांस्कृतिक शहर ग्वालियर में 9 अक्टूबर 1945 को जन्मे अमजद अली खान का ताल्लुक एक प्रतिष्ठित सांगीतिक घराने से है। वे ग्वालियर दरबार के जाने-माने दरबारी फनकार उस्ताद हाफिज अली खान के सबसे छोटे पुत्र हैं। घर की फिजा में हर वक्त राग और ताल की गूंज बनी रहती थी, जिसकी वजह से बेहद कम उम्र में ही उनका वाद्ययंत्रों से स्वाभाविक जुड़ाव हो गया।

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अपने वालिद के सानिध्य में उन्होंने सरोद पकड़ने के तरीके से लेकर सुरों के जटिल उतार-चढ़ाव की तालीम हासिल की। रियाज और कुदरती हुनर के इस संगम का नतीजा यह रहा कि उन्होंने केवल 12 वर्ष की उम्र में अपना पहला एकल प्रदर्शन पेश किया, जिसने उस दौर के वरिष्ठ जानकारों को भी चकित कर दिया था।

नई तकनीक और अंतरराष्ट्रीय फलक पर विस्तार

उस्ताद अमजद अली खान ने पुरानी बंदिशों के मूल ढांचे को नुकसान पहुंचाए बिना वादन में आधुनिक तकनीक का खूबसूरत समावेश किया। उनकी यह शैली न सिर्फ भारत के अलग-अलग कोनों में सराही गई, बल्कि उन्होंने सात समंदर पार भी श्रोताओं को सरोद की मिठास से परिचित कराया। उन्होंने वैश्विक मंचों पर भारतीय शास्त्रीय कला की प्रतिष्ठा बढ़ाई और विभिन्न विश्वविद्यालयों में विजिटिंग प्रोफेसर बनकर छात्रों का मार्गदर्शन किया। आने वाली पीढ़ियों को उन्होंने विरासत संभालने के तौर-तरीके सिखाए।

सम्मान और राष्ट्रीय पहचान

कला साधना के प्रति उनके आजीवन समर्पण को देखते हुए देश-विदेश के कई बड़े मंचों ने उन्हें प्रतिष्ठित अलंकरणों से विभूषित किया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्हें 1970 में यूनेस्को अवार्ड प्रदान किया गया। इसके बाद भारत सरकार ने 1975 में पद्म श्री और 1991 में पद्म भूषण से उनका गौरव बढ़ाया।

वर्ष 1989 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार दिया गया, जिसके बाद उन्हें इस संस्था की फेलोशिप भी मिली। साल 2001 में उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से अलंकृत किया गया। इसके अलावा देश-विदेश के कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधियों से सम्मानित किया है।

सवाल-जवाब

उस्ताद अमजद अली खान का जन्म कब और कहां हुआ था?
उनका जन्म 9 अक्टूबर 1945 को मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक शहर ग्वालियर में हुआ था।
उन्हें संगीत जगत में किस उपाधि से जाना जाता है?
अपनी विशिष्ट वादन शैली और निपुणता के कारण उन्हें सरोद सम्राट की उपाधि दी गई है।
उनके पिता कौन थे?
वे ग्वालियर राजघराने के प्रसिद्ध दरबारी संगीतकार उस्ताद हाफिज अली खान के सबसे छोटे बेटे हैं।
उन्होंने अपना पहला सोलो शो किस उम्र में प्रस्तुत किया था?
उन्होंने महज 12 साल की आयु में अपना पहला एकल प्रदर्शन मंच पर पेश किया था।
उस्ताद अमजद अली खान को कौन-कौन से मुख्य नागरिक सम्मान मिले हैं?
उन्हें 1975 में पद्म श्री, 1991 में पद्म भूषण और 2001 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया है।
उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कौन सा प्रमुख सम्मान मिला था?
उन्हें वर्ष 1970 में प्रतिष्ठित यूनेस्को अवार्ड से सम्मानित किया गया था।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 4

Sneha Kulkarni@sneha-kulkarni·18 दिन पहले

बचपन में ग्वालियर में एक संगीत समारोह में उस्ताद अमजद अली खान को लाइव सरोद बजाते सुना था, वह जादू आज भी कानों में गूंजता है।

Meera Joshi@meera-joshi·18 दिन पहले

स्नेहा, इतने करीब से उनका लाइव संगीत सुनना वाकई मानसिक शांति और गहरा सुकून देता है।

Aisha Khan@aisha-khan·18 दिन पहले

अमजद अली खान साहब का संगीत वाकई कमाल है, पर बचपन में बारह साल की उम्र में उन्होंने पहला सोलो परफ़ॉर्म दिया था, इस बात पर थोड़ा शक होता है। उस ज़माने में इतनी कम उम्र में ऐसा मुकाम हासिल करना थोड़ा बढ़ा-चढ़ाकर लगता है।

Tanvi Desai@tanvi-desai·18 दिन पहले

आयशा जी, तालीम और घराने की परंपरा हो तो बारह साल की उम्र में मंच पर उतरना नामुमकिन नहीं है।

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