पवित्र सावन का महीना चल रहा है और इस दौरान देश भर में कांवर यात्रा की प्राचीन परंपरा का पालन किया जा रहा है। इस कठिन धार्मिक यात्रा के तहत श्रद्धालु गंगा नदी से पवित्र जल भरकर अपने कंधे पर उठाते हैं और भगवान भोलेनाथ के शिवलिंग पर जलाभिषेक करते हैं। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि जो भी भक्त इस कठिन साधना को पूरा करते हैं, उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। उन्हें जीवन में बड़ी तरक्की मिलती है और उनके घर-परिवार में सुख-समृद्धि में लगातार वृद्धि होती है।
सावन के इस पावन महीने में झारखंड के देवघर स्थित प्रसिद्ध बाबा बैद्यनाथ मंदिर में देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी भारी संख्या में श्रद्धालु कांवर लेकर पहुंचते हैं। यह कांवर यात्रा केवल एक प्रकार की नहीं होती, बल्कि इसके कई अलग-अलग रूप और श्रेणियां हैं। इनमें से एक बेहद खास और कठिन प्रकार डाक यात्रा भी है। इस यात्रा से जुड़े कई कड़े और कड़े नियम होते हैं। इन सभी नियमों और यात्रा की विविध शैलियों के बारे में बैद्यनाथ मंदिर के एक प्रमुख तीर्थपुरोहित ने महत्वपूर्ण जानकारियां साझा की हैं।
तीर्थपुरोहित ने बताए यात्रा के प्रकार और विधान
देवघर के बाबा बैद्यनाथ मंदिर के जाने-माने तीर्थपुरोहित प्रमोद श्रृंगारी ने मीडिया को दी गई जानकारी में बताया कि सावन मास में कांवर यात्रा निकालने की परंपरा सदियों पुरानी है। कांवर यात्रा कई प्रकार की होती है जिनमें सबसे सामान्य रूप सामान्य कांवर यात्रा का है। इस पारंपरिक यात्रा के दौरान श्रद्धालु भगवा रंग के वस्त्र धारण करते हैं और अपने कंधे पर कांवर रखकर बोल बम के जयकारों और मंत्रों का उच्चारण करते हुए पैदल शिव मंदिर तक पहुंचते हैं.
इसके अलावा एक अत्यंत कठिन मार्ग दांडी यात्रा का होता है। इस विशेष दांडी यात्रा के अंतर्गत शिव भक्त जल उठाने वाले शुरुआती स्थान से लेकर शिवलिंग तक साष्टांग दंडवत करते हुए यानी जमीन पर लेटकर आगे बढ़ते हैं और दंड देते हुए ही मंदिर तक पहुंचते हैं, भले ही इस पूरी प्रक्रिया में कितना भी लंबा समय क्यों न लग जाए। एक अन्य कठिन प्रकार खड़ी यात्रा का होता है, जिसके दौरान शिव भक्त यात्रा के पूरे मार्ग में न तो कभी बैठ सकते हैं और न ही लेटकर सो सकते हैं। उन्हें लगातार खड़े ही रहना पड़ता है, और यह स्थिति तब तक बनी रहती है जब तक वे शिवलिंग पर जल अर्पित नहीं कर देते।
सबसे कठिन मानी जाती है डाक बम की यात्रा
विभिन्न प्रकार की कांवर यात्राओं में से डाक बम की यात्रा को सबसे अधिक कठिन और चुनौतीपूर्ण माना गया है। इस कठिन मार्ग में शिव भक्त पहले गंगा नदी के तट पर स्नान करते हैं और फिर संकल्प लेकर अपनी यात्रा आरंभ करते हैं। इसके बाद उन्हें बिना एक पल रुके और बिना कुछ खाए-पिए लगातार 24 घंटे के भीतर अपनी पूरी यात्रा तय करनी होती है और तय समय सीमा के अंदर ही भगवान शिव का जलाभिषेक करना पड़ता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जितनी अधिक तपस्या और हठयोग के साथ भगवान शिव की पूजा की जाती है, उतना ही अधिक शुभ फल भक्तों को प्राप्त होता है। यही कारण है कि डाक बम यात्रा को सबसे दुष्कर माना गया है और ऐसा विश्वास है कि इससे भगवान भोलेनाथ अति प्रसन्न होते हैं। यही वजह है कि हर साल तमाम कठिनाइयों के बावजूद बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस कठिन मार्ग से अपनी आस्था प्रकट करते हैं।



















