बिहार की मिट्टी का साहित्यिक इतिहास बेहद समृद्ध रहा है। इस पावन भूमि से कई महान रचनाकारों और कवियों का गहरा नाता रहा है, जिन्होंने हिंदी, उर्दू, भोजपुरी और मैथिली भाषाओं में अमूल्य कृतियों का सृजन किया। रामधारी सिंह दिनकर, विद्यापति, नागार्जुन और रामवृक्ष बेनीपुरी जैसे दिग्गजों ने अपनी कलम से भारतीय साहित्य को नई ऊंचाइयां दीं। भारतीय सिनेमा को संवारने में भी बिहार के आरा से ताल्लुक रखने वाले एक महान गीतकार का अहम योगदान रहा है, हालांकि उनका जन्म पाकिस्तान के रावलपिंडी में हुआ था। अगर आप हिंदी संगीत के शौकीन हैं, तो उनके लिखे गीत आपके भी जेहन में जरूर होंगे। हालांकि, उन्होंने सिनेमाई दुनिया में अपनी मर्जी से नहीं बल्कि विकट परिस्थितियों के कारण कदम रखा था।
बचपन का शौक और कवि सम्मेलन
इस दिग्गज गीतकार को बचपन से ही कविताएं रचने का गहरा शौक था। जीवन में मां और बहन के निधन के बाद उन्हें केवल कविताओं के जरिए ही मानसिक शांति मिलती थी। आजीविका की तलाश में वे मुंबई पहुंचे और भारतीय रेलवे में नौकरी करने लगे। इसके साथ ही उन्होंने अपने लेखन के शौक को भी जिंदा रखा। वे लगातार कवि सम्मेलनों और मुशायरों में हिस्सा लेते रहते थे। ऐसे ही एक मुशायरे के दौरान उनकी मुलाकात राज कपूर से हुई, जो उनकी रचना 'जलता है पंजाब' से बेहद प्रभावित हुए। राज कपूर इस कविता को अपनी 1948 में आई फिल्म 'आग' के लिए खरीदना चाहते थे, लेकिन शैलेन्द्र ने इसे देने से साफ मना कर दिया क्योंकि वे अपनी कला को बेचना नहीं चाहते थे।
राज कपूर से मुलाकात और बरसात के गाने
समय का पहिया घूमा और जब शैलेन्द्र की पत्नी गर्भवती हुईं, तो उनके सामने भयंकर आर्थिक संकट खड़ा हो गया। मदद की उम्मीद में वे अपने एक अमीर मित्र के पास गए, लेकिन वहां से उन्हें निराशा ही हाथ लगी। जब उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझा, तो उन्होंने मजबूरी के तहत राज कपूर से संपर्क साधने का फैसला किया। उस दौरान राज कपूर अपनी फिल्म 'बरसात' की शूटिंग में व्यस्त थे। उन्होंने शैलेन्द्र की मजबूरी को अच्छी तरह समझा और उन्हें 500 रुपये के एवज में दो गीत लिखने का प्रस्ताव दिया। शैलेन्द्र ने तुरंत यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। उन्होंने पैसों की तंगी के कारण 'बरसात में' और 'पतली कमर' नामक दो गाने लिखे। इन दोनों ही बेहतरीन गीतों को संगीतबद्ध शंकर-जयकिशन की प्रसिद्ध जोड़ी ने किया था।
देशभर में छाए गीत और तीसरी कसम का सफर
साल 1949 में रिलीज हुई फिल्म 'बरसात' के साथ ही इस महान गीतकार के फिल्मी सफर का आगाज हुआ। इसके बाद शैलेन्द्र ने हिंदी सिनेमा को एक से बढ़कर एक नायाब गीत दिए। 'आवारा हूं' और 'मेरा जूता है जापानी' जैसे उनके लिखे गीत पूरे देश में जुबान पर चढ़ गए। उन्होंने अनगिनत फिल्मों के लिए सैकड़ों सुपरहिट गाने लिखे जिन्हें आज भी लोग गुनगुनाते हैं। सिनेमा जगत में अपनी मजबूत पकड़ बनाने के बाद शैलेन्द्र ने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रखा। उन्होंने फणीश्वर नाथ रेणु की प्रसिद्ध कहानी पर आधारित फिल्म 'तीसरी कसम' का निर्माण किया, जिसे प्रतिष्ठित नेशनल फिल्म अवॉर्ड से भी नवाजा गया। हालांकि, महज 43 वर्ष की कम उम्र में उनका निधन हो गया, लेकिन उनके रचे गए अमर गीत उन्हें हमेशा के लिए संगीत प्रेमियों के दिलों में जिंदा रखे हुए हैं।



















