भारतीय फिल्म उद्योग में कुछ ऐसे सितारे हुए हैं जिन्होंने केवल अपने अभिनय से ही नहीं बल्कि अपनी शानदार लेखनी से भी दर्शकों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ी। ऐसे ही बहुमुखी कलाकारों में कादर खान की गिनती होती है, जिन्होंने पर्दे पर खलनायक बनकर खौफ पैदा किया, बेहतरीन कॉमेडी से लोगों को लोटपोट किया और ऐसे संवाद रचे जो आज भी लोगों की जुबान पर हैं। उनकी कलम से जुड़ा एक ऐसा ही यादगार संस्मरण अमिताभ बच्चन की प्रसिद्ध फिल्म ‘मुकद्दर का सिकंदर’ से जुड़ा हुआ है।
सोलह पन्नों का वह खास दृश्य और निजी दर्द
वर्ष 1978 में प्रदर्शित हुई यह फिल्म अमिताभ बच्चन के करियर की सबसे कामयाब और यादगार फिल्मों में शुमार की जाती है। इसमें उनके अभिनय के साथ-साथ उनके बोले गए तीखे और भावुक संवादों ने दर्शकों के दिलों को गहराई से छुआ था। इस सिलसिले में सबसे दिलचस्प बात यह है कि फिल्म के एक महत्वपूर्ण हिस्से के लिए कादर खान ने 16 पन्नों का एक लंबा और विस्तृत दृश्य तैयार किया था। इस विशेष हिस्से को लिखते समय उन्होंने केवल फिल्म की कहानी की मांग को ही पूरा नहीं किया, बल्कि अपने जीवन के निजी दुखों और अनुभवों को भी उन शब्दों में पिरोया था।
प्रकाश मेहरा की प्रतिक्रिया और अमिताभ की हैरानी
जब कादर खान ने इस विशाल पटकथा को फिल्म के निर्देशक और निर्माता प्रकाश मेहरा के सामने रखा, तो वह भी इसके भावनात्मक प्रभाव से बेहद प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। हालांकि, जब यह स्क्रिप्ट अमिताभ बच्चन के पास पहुंची, तो इतने लंबे चौड़े हिस्से को देखकर वह असमंजस में पड़ गए। उन्हें इस बात की चिंता सता रही थी कि इतने बड़े संवाद को याद रखना और कैमरे के सामने बिल्कुल सटीक भावनाओं के साथ उतारना किसी भी कलाकार के लिए आसान काम नहीं होगा। यही वजह थी कि उन्होंने इस पूरे हिस्से को छोटा करने का सुझाव दिया था।
जब कमरे में बंद होकर सुनी गई पटकथा
उस समय कादर खान किसी अन्य प्रोजेक्ट की शूटिंग में व्यस्त थे और कुछ समय बीतने के बाद उन्हें अमिताभ बच्चन की तरफ से मिलने का बुलावा भेजा गया। कादर खान को पहले यह अंदेशा हुआ कि शायद उनके द्वारा लिखे गए हिस्से में कोई खामी निकाल दी गई है या उसमें भारी बदलाव करने की बात होगी। लेकिन जब वे वहां पहुंचे तो नजारा पूरी तरह से अलग था। एक पुराने साक्षात्कार में इस घटना को याद करते हुए उन्होंने बताया था कि अमिताभ बच्चन ने कमरे में मौजूद बाकी सभी लोगों को बाहर जाने के लिए कह दिया था। इसके बाद उन्होंने कादर खान को अपने सामने बैठकर पूरा दृश्य सुनाने के लिए कहा।
अमिताभ की आंखों में आए आंसू
जैसे ही कादर खान ने अपनी खास शैली में उस दृश्य को पढ़ना शुरू किया, शब्दों में छिपा हुआ दर्द और उसकी असली भावना धीरे-धीरे बाहर आने लगी। उस प्रस्तुति को सुनते-सुनते अमिताभ बच्चन इस कदर भावुक हो गए कि उनकी आंखों से आंसू छलक आए। उन्हें तब यह अहसास हुआ कि मामला केवल लंबे संवादों को याद करने का नहीं है, बल्कि उन शब्दों के पीछे एक सच्ची और गहरी पीड़ा छिपी हुई है। इस दिल को छू लेने वाले अनुभव के बाद उन्होंने कादर खान से आग्रह किया कि वह आगे से भी अपने लिखे हुए संवादों को अपनी आवाज में रिकॉर्ड करके उन्हें भेज दिया करें, ताकि उनके असली भाव को अच्छी तरह समझा जा सके।
काबुल से मुंबई तक का संघर्षपूर्ण सफर
कादर खान का निजी जीवन भी किसी फिल्मी पटकथा से कम संघर्षपूर्ण नहीं रहा था। उनका जन्म साल 1937 में काबुल शहर में हुआ था और बाद में उनका पूरा परिवार मुंबई आ बसा था। शुरुआती दौर में उन्हें भारी आर्थिक तंगी और बेहद कठिन हालातों का सामना करना पड़ा था, लेकिन तमाम मुश्किलों के बावजूद उनका शिक्षा और कला के प्रति प्रेम कभी कम नहीं हुआ। उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की और मुंबई के एमएच साबू सिद्दीक पॉलिटेक्निक संस्थान में लेक्चरर के रूप में अपनी सेवाएं दीं। शिक्षण कार्य से समय निकालकर वह लगातार रंगमंच और थिएटर से जुड़े रहे।
सत्तर के दशक में संवाद लेखक के रूप में पहचान
सत्तर के दशक के दौरान उन्होंने फिल्म जगत में एक सशक्त डायलॉग राइटर के रूप में अपनी मजबूत पहचान बनानी शुरू कर दी थी। राजेश खन्ना अभिनीत फिल्म ‘रोटी’ से उन्हें इंडस्ट्री में एक बड़ी सफलता और खास पहचान हासिल हुई। इसके बाद मनमोहन देसाई और प्रकाश मेहरा जैसे नामी निर्देशकों के साथ उनके सहयोग ने उन्हें बॉलीवुड के शीर्ष लेखकों की श्रेणी में ला खड़ा किया। उन्होंने ‘अमर अकबर एंथनी’, ‘परवरिश’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’, ‘लावारिस’, ‘नसीब’ और ‘कुली’ जैसी तमाम सुपरहिट फिल्मों के लिए बेहतरीन संवाद लिखे। उनकी सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वह हर किरदार की जरूरत के अनुसार भाषा के अंदाज को पूरी तरह बदल देते थे।
साल 1973 में आई फिल्म ‘दाग’ के जरिए उन्होंने एक अभिनेता के तौर पर भी फिल्मों में कदम रखा। आने वाले वर्षों में अभिनेता गोविंदा के साथ उनकी जोड़ी को दर्शकों ने बेशुमार प्यार दिया। ‘दुल्हे राजा’, ‘कुली नंबर 1’ और ‘हीरो नंबर 1’ जैसी फिल्मों में उनकी कॉमिक टाइमिंग ने लोगों को हंसा-हंसाकर लोटपोट कर दिया। शब्दों के जरिए किसी भी साधारण किरदार में जान फूंक देने की उनकी कला ही उन्हें अन्य कलाकारों से अलग बनाती थी।


















