भारतीय बड़े पर्दे पर जब भी बर्फीली पहाड़ियों के बीच उड़ती हुई शिफॉन साड़ी और दिल छू लेने वाले संगीत की कल्पना की जाती है, तब सबसे पहला अक्स यश चोपड़ा का ही उभरता है। सिनेमाई फलक पर उन्होंने मानवीय जज्बातों को जिस नफासत से पेश किया, उसने दशकों तक दर्शकों को बांधे रखा। उन्होंने न केवल हिंदी सिनेमा में प्रेम कहानियों का व्याकरण बदला, बल्कि सामाजिक टकराव और आक्रोश से भरे किरदारों को भी उतनी ही शिद्दत से गढ़ा। एक नौजवान के तौर पर पंजाब से सपनों की नगरी पहुंचे इस फिल्मकार ने अपने पांच दशक के करियर में ऐसी लकीर खींची जिसे मिटाना नामुमकिन है।
लाहौर में बीता बचपन और लुधियाना का नया बसेरा
यश चोपड़ा का जन्म 27 सितंबर 1932 को अविभाजित भारत के लाहौर शहर में हुआ था, जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है। वे अपने माता-पिता की कुल आठ संतानों में सबसे छोटे थे। उनके पिता लाला विलायती राज चोपड़ा ब्रिटिश हुकूमत के दौर में पंजाब लोक निर्माण विभाग यानी पीडब्ल्यूडी में अकाउंटेंट का पद संभालते थे। लाहौर की गलियों में ही उनकी शुरुआती स्कूली पढ़ाई पूरी हुई थी। हालांकि, देश के विभाजन और बदलते हालात के बीच उनका पूरा परिवार सरहद पार कर भारत आ गया और पंजाब के लुधियाना में अपनी नई जिंदगी शुरू की।
भाई की उंगली थामकर सेट पर कदम और स्वतंत्र निर्देशन की शुरुआत
मायानगरी मुंबई में अपनी पहचान कायम करना आसान नहीं था, लेकिन परिवार में पहले से सक्रिय बड़े भाई और दिग्गज निर्देशक बीआर चोपड़ा का मार्गदर्शन उनके बहुत काम आया। उन्होंने फिल्म निर्माण की बुनियादी बारीकियां सीखने के लिए बीआर चोपड़ा के सहायक के रूप में काम शुरू किया। सेट पर कैमरे के एंगल से लेकर कलाकारों के निर्देशन की समझ विकसित करने के बाद, साल 1959 में उन्हें स्वतंत्र निर्देशक की कुर्सी मिली। उन्होंने सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देने वाली फिल्म ‘धूल का फूल’ बनाई, जिसने बॉक्स ऑफिस पर अपनी छाप छोड़ी और उनके स्वतंत्र सफर की ठोस नींव रख दी।
यश राज फिल्म्स का गठन और अमर प्रेम कहानियों का जादू
साल 1971 में यश चोपड़ा ने अपने सपनों को नया पंख देते हुए यश राज फिल्म्स की स्थापना की। इस बैनर ने आगे चलकर हिंदी फिल्म उद्योग का चेहरा ही बदल दिया। उन्होंने ‘वक्त’, ‘कभी-कभी’, ‘सिलसिला’, ‘चांदनी’, ‘लम्हे’, ‘दिल तो पागल है’ और ‘वीर-जारा’ जैसी फिल्मों का निर्माण और निर्देशन किया। इन कृतियों ने न केवल दर्शकों के दिलों को छुआ, बल्कि गानों के फिल्मांकन, पारिवारिक रिश्तों और रोमांस के अंदाज को एक अंतरराष्ट्रीय भव्यता भी प्रदान की।
अमिताभ का आक्रोश और शाहरुख का रूमानियत भरा अंदाज
यश चोपड़ा केवल खूबसूरत नजारों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने उस दौर के सामाजिक रोष को भी बखूबी परखा। उन्होंने ‘दीवार’ और ‘त्रिशूल’ जैसी फिल्मों के जरिए अमिताभ बच्चन के भीतर के आक्रोश को परदे पर उतारा, जिससे बच्चन को सिनेमा जगत में ‘एंग्री यंग मैन’ का ऐतिहासिक खिताब मिला। इसके उलट, जब नब्बे के दशक में नए दौर की शुरुआत हुई, तो उन्होंने ‘डर’ जैसी थ्रिलर के बाद शाहरुख खान के रोमांटिक पक्ष को संवारा। शाहरुख खान को ‘किंग ऑफ रोमांस’ बनाने में यश चोपड़ा के विजन का अहम योगदान माना जाता है, जिसके कारण कई लोग उन्हें शाहरुख का गॉडफादर भी कहते हैं।
विरासत की अगली पीढ़ी के हाथों में बागडोर
पांच दशकों तक सिनेमा पर राज करने वाले इस महान फिल्मकार के दुनिया को अलविदा कहने के बाद भी उनकी विरासत मजबूती से कायम है। आज उनके बड़े बेटे आदित्य चोपड़ा यश राज फिल्म्स की पूरी बागडोर संभालते हुए कंपनी को नए मुकाम पर ले जा रहे हैं। वहीं उनके छोटे बेटे उदय चोपड़ा ने कैमरे के सामने आकर कई फिल्मों में मुख्य अभिनेता के रूप में अपनी किस्मत आजमाई थी। यश चोपड़ा द्वारा स्थापित कलात्मक मानक आज भी नए निर्देशकों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं।

















