केरल के अदालती कमरों में कानूनी दलीलें पेश करने से लेकर भारतीय सिनेमा के पर्दे पर अपनी अदाकारी का परचम लहराने तक, ममूटी का जीवन संघर्ष, समर्पण और असीम प्रतिभा की एक अनुपम मिसाल प्रस्तुत करता है। बेहद कम लोग यह जानते हैं कि मलयालम फिल्म जगत के इस महानायक का असली नाम मुहम्मद कुट्टी पनापरम्बिल इस्माइल है। 7 सितंबर 1951 को केरल की धरती पर जन्मे इस कलाकार ने अपनी प्रारंभिक और उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद एर्नाकुलम स्थित गवर्नमेंट लॉ कॉलेज से वकालत की डिग्री प्राप्त की थी। कानून की पढ़ाई पूरी करने के पश्चात उन्होंने बाकायदा केरल की विभिन्न अदालतों में वकील के रूप में अभ्यास भी शुरू कर दिया था। हालांकि, कानून की किताबों के बीच भी उनके दिल में अभिनय के प्रति एक गहरा आकर्षण हमेशा बना रहा, जो अंततः उन्हें रुपहले पर्दे की ओर ले आया।
शुरुआती कदम और सिनेमा में पहली पहचान
ममूटी का फिल्मों से जुड़ाव पढ़ाई के दौरान ही शुरू हो गया था। उन्होंने साल 1971 में प्रदर्शित फिल्म ‘अनुभवंगल पालिचाकल’ के माध्यम से कैमरे के सामने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। इस फिल्म में उनका रोल बेहद छोटा था, लेकिन इसने उनके भीतर अभिनय की चिंगारी को जलाए रखा। कानूनी पेशे की व्यस्तताओं के बीच भी वह लगातार छोटे-मोटे अवसरों की तलाश करते रहे। शुरुआती दौर की चुनौतियों के बाद वर्ष 1980 में आई फिल्म ‘विल्क्कनुंडु स्वप्नंगल’ उनके करियर का पहला प्रमुख मोड़ साबित हुई। इस फिल्म में उनके प्रदर्शन को समीक्षकों और दर्शकों ने नोटिस किया, जिसके बाद उन्हें मुख्य भूमिकाएं मिलने का रास्ता साफ हो गया।
1980 के दशक का जलवा और स्टारडम की नींव
साल 1980 का दशक ममूटी के करियर के लिए एक स्वर्णिम दौर लेकर आया। इस दशक में उन्होंने लगातार एक से बढ़कर एक हिट फिल्में दीं और अपने अभिनय का लोहा मनवाया। ‘अहिंसा’, ‘संध्याक्कु विरिंजा पूवु’, ‘अथिरात्रम’, ‘यात्रा’, ‘निराकूट्टू’ और ‘न्यू दिल्ली’ जैसी फिल्मों ने उन्हें सफलता के शिखर पर पहुंचा दिया। इन फिल्मों की व्यावसायिक सफलता ने उन्हें हर घर में लोकप्रिय बना दिया। उनकी सबसे बड़ी खूबी यह रही कि उन्होंने खुद को किसी एक खास शैली के किरदारों तक सीमित नहीं रखा। वह गंभीर नाटकों से लेकर जबरदस्त एक्शन और थ्रिलर भूमिकाओं में समान रूप से सहज दिखाई दिए।
समीक्षकों की सराहना और ऐतिहासिक भूमिकाएं
व्यावसायिक सफलता हासिल करने के बावजूद ममूटी ने केवल स्टारडम के तमगे से संतोष नहीं किया। उन्होंने कलात्मक और चुनौतीपूर्ण पटकथाओं का चयन जारी रखा। उनके करियर में ‘ओरु वडक्कन वीरगाथा’, ‘मथिलुकल’, ‘विदेयन’ और ‘पोंथन माडा’ जैसी कालजयी फिल्में शामिल हैं, जिनमें किए गए उनके अभिनय की मिसाल आज भी दी जाती है। इसके अलावा, उन्होंने हिंदी भाषा की ऐतिहासिक फिल्म ‘डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर’ में भारत के संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर की मुख्य भूमिका को बड़े ही जीवंत रूप से पर्दे पर उतारा। इस किरदार के लिए उन्हें देशभर में अत्यधिक प्रशंसा प्राप्त हुई और यह उनके जीवन के सबसे यादगार अभिनय में गिना जाता है।
बहुभाषी पहचान और राष्ट्रीय सम्मान
ममूटी ने अपनी अभिनय क्षमता को केवल मलयालम भाषा की सीमाओं तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने तमिल, तेलुगु, हिंदी, कन्नड़ और यहां तक कि अंग्रेजी फिल्मों में भी अपनी अदाकारी का जादू बिखेरा। विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों की फिल्मों में काम करने के कारण उनकी लोकप्रियता पूरे भारत में फैल गई। अपने व्यापक करियर में वह 400 से अधिक फिल्मों में काम कर चुके हैं। उनकी असाधारण अभिनय कला के लिए उन्हें तीन बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्रदान किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त, उन्हें कई बार केरल राज्य फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर साउथ पुरस्कारों से नवाजा गया। भारतीय सिनेमा में उनके अमूल्य योगदान को सम्मानित करते हुए भारत सरकार ने वर्ष 1998 में उन्हें पद्म श्री पुरस्कार प्रदान किया था।
70 की उम्र पार भी काम के प्रति अटूट जुनून
ममूटी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि 70 वर्ष की उम्र पार कर लेने के बाद भी उनका काम के प्रति जुनून रत्ती भर कम नहीं हुआ है। आज के दौर में भी वह पारंपरिक ढर्रे से हटकर नए प्रयोग कर रहे हैं और युवा निर्देशकों के साथ चुनौतीपूर्ण कहानियां चुन रहे हैं। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि एक सच्चे कलाकार की कोई सीमा नहीं होती। एक वकील के रूप में करियर शुरू करके मलयालम सिनेमा का ‘मेगास्टार’ बनने तक की उनकी यात्रा आने वाली पीढ़ियों के लिए एक महान प्रेरणा है।


















