उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक सुल्तानपुर जिले में गोमती नदी के तटवर्ती क्षेत्र में बसा मठिया धाम अपनी असाधारण भौगोलिक स्थिति और बनावट के कारण चर्चा का विषय बना रहता है। सामान्य मंदिरों की तुलना में इस पावन स्थल की बनावट बेहद अनूठी है, क्योंकि समय के थपेड़ों और भीषण बाढ़ की विभीषिका झेलने के बाद भी यह अपनी जगह पर मजबूती से खड़ा है। स्थानीय मान्यता और संरचनात्मक स्वरूप के अनुसार, इस पूरे मंदिर का दो हिस्सा जमीन के अंदर धंस चुका है, जबकि केवल एक ही तल बाहर दिखाई पड़ता है। वर्तमान में जिस गर्भगृह में मुख्य प्रतिमा स्थापित है, वहां तक पहुंचने के लिए आने वाले हर श्रद्धालु को अत्यंत संकरे रास्ते से होकर और अपना सिर पूरी तरह झुकाकर प्रवेश करना होता है।
जमीन में धंसी संरचना और संकरा प्रवेश द्वार
सुल्तानपुर के निजाम पट्टी गांव में स्थित यह पवित्र धाम दूर से देखने पर किसी साधारण देवालय की तरह ही दिखाई देता है। हालांकि जैसे ही कोई व्यक्ति इसके बिल्कुल नजदीक पहुंचता है, मंदिर की अनूठी वास्तुकला साफ तौर पर चौंकाने लगती है। समय के बीतने के साथ मंदिर के दो बड़े हिस्से भूतल के नीचे समा गए हैं। अब जमीन से ऊपर केवल इसका ऊपरी भाग शेष रह गया है, जहां पूजा-अर्चना संपन्न होती है। गर्भगृह के भीतर जाने का मार्ग इतना संकरा और नीचा है कि कोई भी भक्त बिना झुके भीतर कदम नहीं रख सकता। यह विशिष्ट शारीरिक मुद्रा यहां आने वाले हर व्यक्ति को स्वाभाविक रूप से नतमस्तक कर देती है, जो इस प्राचीन स्थल को समूचे क्षेत्र के अन्य धार्मिक स्थलों से बिल्कुल अलग पहचान दिलाती है।
लखौरी ईंटों का निर्माण और मजबूती की तकनीक
मठिया धाम की दीवारों और बनावट का अध्ययन करने पर प्राचीन भारतीय निर्माण शैली के कई अद्भुत पहलू सामने आते हैं। इस मंदिर का इतिहास कलमबद्ध करने वाले अमरेंद्र नाथ द्विवेदी का कहना है कि इसके ढांचे में पारंपरिक लखौरी ईंटों का सलीके से उपयोग किया गया है। लखौरी ईंटें और बेहद चौड़ी दीवारें पुरानी वास्तुकला की प्रमुख पहचान मानी जाती हैं, जो प्रतिकूल मौसम और प्राकृतिक झटकों को सहन करने की जबरदस्त क्षमता रखती हैं। मंदिर की इन्हीं मजबूत दीवारों के कारण यह भीषण बाढ़ जैसी आपदाओं का सामना करने में सक्षम रहा है। जहां तक इसके दो हिस्सों के जमीन में धंसने का सवाल है, तो इसे लेकर कई तरह के स्थानीय अनुमान लगाए जाते हैं। कई लोग इसे किसी बड़ी प्राकृतिक हलचल या भूगर्भीय घटना से जोड़ते हैं, यद्यपि इसकी ठोस और प्रामाणिक वैज्ञानिक वजह आज तक पूरी तरह उजागर नहीं हो पाई है।
धार्मिक परंपराएं और साल में दो बड़े भंडारे
भौगोलिक और स्थापत्य बदलावों के बावजूद इस पावन परिसर में लोगों का विश्वास सदियों से जस का तस बना हुआ है। मंदिर के पुजारी वीरेंद्र कुमार तिवारी के अनुसार, मठिया धाम में प्रतिवर्ष दो बार बहुत बड़े धार्मिक अनुष्ठानों और सामूहिक भंडारों का आयोजन किया जाता है। इन विशेष अवसरों पर आसपास के क्षेत्रों के साथ-साथ दूर-दराज के इलाकों से भी भारी संख्या में भक्त दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर में प्रतिष्ठित मठिया माता को मुख्य रूप से बताशे और पारंपरिक लड्डुओं का भोग अर्पित करने की पुरानी परंपरा है। गोमती नदी की कलकल बहती धारा और आसपास फैले घने वृक्षों की छांव इस पूरे परिसर को अत्यंत शांत और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर बना देती है। यह पावन धाम केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि सुल्तानपुर की प्राचीन लोक विरासत का जीता-जागता प्रमाण भी है।



















