भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम दौर में कई ऐसी अभिनेत्रियां हुईं जिन्होंने अपनी अदाकारी से दर्शकों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ी। ऐसी ही एक दिग्गज अभिनेत्री थीं श्यामा, जिनका असली नाम खुर्शीद अख्तर था। उनका जन्म साल 1935 में लाहौर के एक मुस्लिम परिवार में हुआ था, लेकिन उनकी किस्मत उन्हें मायानगरी मुंबई खींच लाई। उन्होंने बेहद कम उम्र में ही अभिनय की दुनिया में कदम रख दिया था और आगे चलकर कई यादगार फिल्मों में मुख्य भूमिकाएं निभाईं। उस दौर में उनके नाम को लेकर अक्सर लोगों में यह गलतफहमी रहती थी कि वह हिंदू हैं, क्योंकि उन्होंने फिल्मों में आने के बाद अपना नाम श्यामा रख लिया था।
बाल कलाकार से लेकर मुख्य भूमिकाओं तक का सफर
खुर्शीद अख्तर से श्यामा बनीं इस अभिनेत्री ने 1940 के दशक में मुंबई का रुख किया था। बचपन से ही उन्होंने फिल्मों में छोटे-मोटे रोल करना शुरू कर दिए थे और कड़ी मेहनत के बल पर उन्होंने हिंदी तथा पंजाबी सिनेमा में अपनी एक खास जगह बनाई। पचास और साठ के दशक तक आते-आते वह इंडस्ट्री का एक बेहद जाना-पहचाना नाम बन चुकी थीं। अपने लंबे और शानदार करियर के दौरान उन्होंने लगभग 150 फिल्मों में अपने अभिनय का हुनर दिखाया। उन्होंने शुरुआती दौर में लीड रोल तो निभाए ही, साथ ही अपने करियर के एक बड़े हिस्से में बेहतरीन सपोर्टिंग किरदार भी निभाए जिन्होंने फिल्मों की सफलता में अहम भूमिका निभाई।
सिल्वर स्क्रीन पर चमकीं और दी कई सुपरहिट फिल्में
श्यामा ने अपने फिल्मी सफर में एक से बढ़कर एक सुपरहिट फिल्मों में काम किया और जबरदस्त लोकप्रियता हासिल की। उनकी प्रमुख फिल्मों में छू मंतर, भाई-भाई, माई-बाप, छोटी बहन, राज की बात, जानवर, मस्ताना, शारदा, भाभी, बरसात की रात, तराना, आर-पार, मिलन, सावन भादो और हथियार जैसी तमाम बेहतरीन फिल्में शामिल हैं। अपने अभिनय के दम पर उन्होंने दर्शकों के बीच खास पहचान बनाई। लंबे समय तक सिनेमा जगत को अपनी सेवाएं देने के बाद उन्होंने साल 1989 में आई फिल्म हथियार के बाद अभिनय से पूरी तरह संन्यास ले लिया।
पारसी सिनेमैटोग्राफर से हुआ प्यार और शादी
अभिनेत्री की निजी जिंदगी भी हमेशा सुर्खियों में रही। साल 1953 में उन्होंने जाने-माने सिनेमैटोग्राफर फली मिस्त्री के साथ सात फेरे लिए। दोनों के बीच प्यार फिल्म सजा के सेट पर काम करने के दौरान परवान चढ़ा था। श्यामा जहां एक मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखती थीं, वहीं उनके पति फली मिस्त्री पारसी समुदाय से थे। फली मिस्त्री ने हिंदी सिनेमा में सिनेमैटोग्राफी के क्षेत्र में बहुत नाम कमाया था और यह माना जाता है कि उन्होंने ही इंडस्ट्री को एक कैमरामैन के असली महत्व से अवगत कराया था।
करियर के खातिर दस साल तक छिपाई शादी की बात
श्यामा ने फली मिस्त्री के साथ अपने वैवाहिक बंधन को पूरे 10 साल तक दुनिया की नजरों से छिपाकर रखा था। इसके पीछे उनका सबसे बड़ा डर यह था कि यदि उनकी शादी की बात सार्वजनिक हो गई, तो उन्हें फिल्मों में काम मिलना बंद हो जाएगा। वह उस दौर में जी रही थीं जब यह एक आम धारणा हुआ करती थी कि शादी करने या मां बनने के बाद किसी भी अभिनेत्री का करियर समाप्त हो जाता है। वह किसी भी कीमत पर अपने अभिनय करियर को खतरे में नहीं डालना चाहती थीं, इसलिए उन्होंने अपनी शादी को एक बड़ा राज बनाए रखा।
मातृत्व के बाद सामने आया शादी का सच
हालांकि, शादी का यह राज ज्यादा दिनों तक छिपा नहीं रह सका। जब श्यामा मां बनने वाली थीं, तब उनकी शादी की खबर आखिरकार सबके सामने आ गई। इस दंपति के तीन बच्चे हुए, जिनमें दो बेटे फारुख और रोहिन तथा एक बेटी शिरीन शामिल थे। समय का पहिया घूमा और साल 1979 में उनके पति फली मिस्त्री का निधन हो गया। पति की मृत्यु के बाद भी श्यामा ने हमेशा के लिए मुंबई में ही रहने का फैसला किया और आखिरी समय तक यहीं रहीं।
अंतिम दिन और परिवार की विरासत
फेफड़ों में संक्रमण के कारण 14 नवंबर 2017 को 82 वर्ष की आयु में श्यामा का निधन हो गया, जिससे हिंदी सिनेमा का एक चमकता सितारा हमेशा के लिए बुझ गया। उनके बड़े बेटे फारुख मिस्त्री ने अपने पिता के नक्शेकदम को चुनते हुए सिनेमैटोग्राफी को ही अपना करियर बनाया। फारुख फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से ग्रेजुएट हैं और उन्होंने साल 2018 में आई फिल्म अंग्रेजी में कहते हैं के लिए सिनेमैटोग्राफी का काम किया था। श्यामा का फिल्मी सफर और उनका संघर्ष आज भी पुराने दौर के सिनेमा प्रेमियों के जेहन में जिंदा है।


















