श्रावण मास में भगवान शिव की भक्ति का विशेष महत्व होता है और इस वर्ष सावन के महीने में कुल चार सोमवार के व्रत रखे जा रहे हैं। इन सभी में 17 अगस्त को पड़ने वाला तीसरा सावन सोमवार व्रत धार्मिक दृष्टि से अत्यंत दुर्लभ और फलदायी माना जा रहा है। इस दिन सावन के तीसरे सोमवार के साथ ही नाग पंचमी का पावन पर्व भी मनाया जाएगा। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, पूरे 23 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद यह अद्भुत महासंयोग बना है। इससे पहले ऐसा धार्मिक और खगोलीय योग वर्ष 2003 में देखने को मिला था। इस खास दिन पर महादेव और नाग देवता का एक साथ पूजन करने से साधकों को अनंत पुण्य की प्राप्ति होगी।
23 साल बाद बना नाग पंचमी और सोमवार का दुर्लभ योग
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी का त्योहार मनाया जाता है। इस बार 17 अगस्त को सावन का तीसरा सोमवार और शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि एक ही दिन पड़ रही है। ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि ऐसा महासंयोग 23 साल पहले 2003 में पड़ा था। इस पावन तिथि पर भगवान शिव के साथ नाग देवता का जलाभिषेक और रुद्राभिषेक करने का विशेष विधान है। इस दुर्लभ दिन पर विशेष अनुष्ठान करने से ज्योतिषीय दोषों से राहत मिलती है। मुख्य रूप से जिन जातकों की कुंडली में कालसर्प दोष या नाग दोष मौजूद है, वे इस दिन पूजा-अर्चना करके इन दोषों का निवारण कर सकते हैं। इसके अलावा शनि, राहु और केतु ग्रहों के अशुभ प्रभावों को शांत करने के लिए भी यह दिन सर्वोत्तम माना गया है।
सिंह संक्रांति समेत बन रहे ये 5 बड़े शुभ योग
17 अगस्त को पड़ने वाले तीसरे सावन सोमवार के दिन केवल नाग पंचमी का ही महासंयोग नहीं है, बल्कि इस दिन कई अन्य महत्वपूर्ण खगोलीय और ज्योतिषीय योग भी एक साथ बन रहे हैं। इस दिन सूर्य देव अपनी स्वराशि सिंह में प्रवेश करेंगे, जिससे सिंह संक्रांति का पर्व भी मनाया जाएगा। सिंह संक्रांति के साथ-साथ इस शुभ दिन पर निम्नलिखित विशेष योगों का निर्माण हो रहा है
- रवि योग: सूर्य देव की कृपा से कार्यों में सफलता और आरोग्यता प्रदान करने वाला योग।
- त्रिग्रही योग: तीन प्रमुख ग्रहों की एक ही राशि में उपस्थिति से बनने वाला दुर्लभ योग।
- हंसराज योग: जीवन में मान-सम्मान, ज्ञान और उच्च पद की प्राप्ति कराने वाला शुभ योग।
- बुधादित्य योग: बुद्धिमत्ता, व्यापारिक वृद्धि और करियर में उन्नति देने वाला योग।
इन सभी शुभ योगों के बीच व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा करने पर घर-परिवार से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सुख-शांति तथा समृद्धि का आगमन होता है।
शिवजी और नाग देवता का अटूट संबंध
सनातन धर्म में नाग पंचमी के दिन नाग देवता की पूजा का विशेष महत्व है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, नागों का सीधा संबंध देवाधिदेव महादेव से माना गया है, क्योंकि भगवान शिव स्वयं अपने गले में वासुकी नाग को आभूषण के रूप में धारण करते हैं। यही कारण है कि नाग पंचमी और सावन सोमवार का एक साथ आना अत्यंत फलदायी माना जाता है। इस दिन शिव मंदिर जाकर शिवलिंग पर जल अर्पित करने के साथ-साथ नाग देवता की प्रतिमा या चित्र का पूजन किया जाता है। श्रद्धालु इस पावन अवसर पर शिवजी और नाग देव से अपने परिवार की सुरक्षा, आरोग्य और समस्त संकटों के नाश की प्रार्थना करते हैं।
समुद्र मंथन की कथा और जल अर्पण का विधान
सावन के महीने में शिवजी को जल चढ़ाने की परंपरा के पीछे एक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। मान्यता है कि देवताओं और असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन के दौरान जब कालकूट नामक भयानक विष निकला, तो उसके ताप से सृष्टि को बचाने के लिए भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया था। विष के तीव्र प्रभाव और जलन को शांत करने के लिए समस्त देवताओं ने भगवान शिव पर शीतल जल और अन्य पवित्र वस्तुएं अर्पित की थीं। तभी से सावन के महीने में शिवलिंग पर जल चढ़ाने और जलाभिषेक करने की प्रथा चली आ रही है।
सावन सोमवार के व्रत के दिन श्रद्धालुओं को प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इसके पश्चात शिव मंदिर जाकर शिवलिंग का जलाभिषेक करना चाहिए। पूजन के दौरान शिवलिंग पर जल, दूध, गंगाजल, बेलपत्र, धतूरा, भस्म और ताजे पुष्प अर्पित किए जाते हैं। इसके साथ ही 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जाप और शिव चालीसा का पाठ करने से महादेव अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।



















