सनातन परंपरा में आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी के पावन पर्व के तौर पर मनाया जाता है। यह पावन दिन संकटहर्ता भगवान श्री गणेश को पूर्णतया समर्पित है, जहां भक्तजन अपने जीवन की सभी बाधाओं, कष्टों और संकटों से मुक्ति पाने के लिए गणपति बप्पा के विघ्नराज स्वरूप का विधि-विधान से पूजन करते हैं। मान्यता है कि इस विशेष तिथि पर सच्चे हृदय से उपवास रखने और गणेश जी की आराधना करने से परिवार में सुख, शांति तथा अटूट समृद्धि का वास होता है। दिनभर निर्जला अथवा फलाहार व्रत रखने वाले श्रद्धालु रात्रि में चंद्र दर्शन तथा चंद्रमा को विधिवत अर्घ्य अर्पित करने के बाद ही अपना व्रत खोलते हैं। इस संपूर्ण अनुष्ठान में पौराणिक व्रत कथा का पाठ अथवा श्रवण करना अनिवार्य माना गया है, क्योंकि इसके बिना व्रत का संपूर्ण फल अधूरा रह जाता है।
बाणासुर की पुत्री उषा का स्वप्न और अनिरुद्ध से वियोग की व्याकुलता
इस पावन पर्व से जुड़ी प्राचीन पौराणिक कथा के अनुसार, असुरराज बाणासुर की पुत्री उषा एक समय अपने शयनकक्ष में गहरी नींद में सो रही थी। उसी सुषुप्तावस्था के दौरान उसने स्वप्न में एक अत्यंत रूपवान राजकुमार अनिरुद्ध को देखा। स्वप्न में ही दोनों का परस्पर अनुराग हुआ और उषा ने उन्हें अपने पति के रूप में स्वीकार कर लिया। जब उषा की आंख खुली और उसने अनिरुद्ध को अपने पास नहीं पाया, तो वह वियोग की गहरी पीड़ा से तड़प उठी। उसका मन इतना व्यथित और विचलित हो गया कि सांसारिक सुख-सुविधाओं के बावजूद उसके चित्त को कहीं भी शांति नहीं मिल रही थी। उसने अपनी परम सखी चित्रलेखा के समक्ष अपनी विरह व्यथा व्यक्त की। चित्रलेखा के पास अद्भुत कलात्मक क्षमता के साथ-साथ जादुई और मायावी विद्याओं का भी गहरा ज्ञान था।
अपनी सखी की व्याकुलता देखकर चित्रलेखा ने त्रिभुवन में विचरण करने वाले सभी देवताओं, गंधर्वों, दैत्यों और मानव राजकुमारों के हूबहू चित्र तैयार किए। उषा ने जब क्रमबद्ध तरीके से सभी चित्रों को देखा, तो अचानक उसकी दृष्टि भगवान श्री कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध के रेखाचित्र पर ठहर गई। उषा ने तुरंत अपनी सखी को पुकार कर कहा कि यही वह पुरुष हैं, जिन्हें मैंने अपने स्वप्न में देखा था और जिनके साथ मेरा पाणिग्रहण संस्कार संपन्न हुआ था। उषा ने दृढ़तापूर्वक कहा कि चाहे जो हो जाए, इस व्यक्ति को खोजकर लाया जाए, अन्यथा वह वियोग के असहनीय दुख में अपने प्राणों का त्याग कर देगी। अपनी सखी के प्राणों की रक्षा करने के उद्देश्य से चित्रलेखा विभिन्न लोकों और राज्यों में खोज करती हुई अंततः भव्य द्वारकापुरी आ पहुंची।
द्वारका से अनिरुद्ध का मायावी हरण और द्वारका में मचा कोहराम
द्वारकापुरी पहुंचकर चित्रलेखा ने अपनी मायावी दृष्टि से राजमहल में शयन कर रहे अनिरुद्ध को पहचान लिया। उसने अपनी आसुरी माया और तांत्रिक सिद्धियों के बल पर आधी रात के समय सो रहे अनिरुद्ध को शय्या समेत उठा लिया और आकाश मार्ग से उड़ते हुए बाणासुर की राजधानी में सुरक्षित रूप से प्रविष्ट हो गई। वहां उसने अनिरुद्ध को गुप्त स्थान पर छिपा दिया। दूसरी ओर, द्वारका में जब प्रातःकाल अनिरुद्ध अपने कक्ष से गायब मिले, तो पूरे महल में हाहाकार मच गया। अनिरुद्ध के पिता प्रद्युम्न अपने प्रिय पुत्र के अचानक लापता होने के सदमे को बर्दाश्त नहीं कर सके और पुत्र शोक की भीषण पीड़ा से ग्रसित होकर एक असाध्य बीमारी की चपेट में आ गए।
अपने पुत्र प्रद्युम्न की यह दयनीय दशा और पौत्र अनिरुद्ध के इस तरह रहस्यमय ढंग से गायब होने की खबर से स्वयं भगवान श्री कृष्ण भी अत्यंत व्याकुल और उद्विग्न हो उठे। अनिरुद्ध की दादी माता रुक्मिणी भी गहरे अवसाद में डूब गईं और फूट-फूट कर रोने लगीं। खिन्न और संतप्त मन से रुक्मिणी ने श्री कृष्ण से कातर स्वर में कहा कि हमारे प्रिय पौत्र का किसी शत्रु ने अपहरण कर लिया है या वह स्वयं किसी कारणवश हमें छोड़कर चला गया है। उन्होंने अत्यंत भावुक होकर घोषणा की कि यदि उनके पौत्र का शीघ्र पता नहीं चला, तो वह प्रभु के समक्ष ही अपने प्राण त्याग देंगी। इस विकट पारिवारिक संकट को सुलझाने के लिए भगवान श्री कृष्ण तत्काल यादवों की सभा में पहुंचे।
लोमश ऋषि का मार्गदर्शन और विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी व्रत का अनुष्ठान
यादवों की उस सभा में दिव्य तपस्वी लोमश ऋषि पधारे हुए थे। भगवान श्री कृष्ण ने मुनिवर के चरणों में प्रणाम किया और द्वारका पर टूटे इस अकूत संकट की पूरी व्यथा विस्तार से सुनाई। श्री कृष्ण ने विनीत भाव से पूछा कि हे मुनिवर, कृपा करके बताएं कि हमारे कुल के दीपक पौत्र अनिरुद्ध को कौन छलपूर्वक ले गया है अथवा वह अपनी स्वेच्छा से कहीं चला गया है, क्योंकि उसकी माता पुत्र वियोग में मृत्युशैया पर पड़ी हैं। लोमश ऋषि ने अपनी दिव्य दृष्टि से संपूर्ण घटनाक्रम का अवलोकन किया और श्री कृष्ण से कहा कि बाणासुर की कन्या उषा की सखी चित्रलेखा ने अनिरुद्ध का अपहरण किया है और उसे बाणासुर के महल में छिपा कर रखा गया है।
ऋषि लोमश ने भगवान श्री कृष्ण को इस भयंकर संकट से मुक्ति पाने का सटीक उपाय सुझाते हुए कहा कि आप आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का विधिवत व्रत और अनुष्ठान करें। यह व्रत भगवान गणेश के विघ्नराज स्वरूप की असीम कृपा प्राप्त कराता है और इसके प्रभाव से आपका पौत्र अनिरुद्ध सकुशल वापस लौट आएगा। भगवान श्री कृष्ण ने ऋषि की आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए विधिपूर्वक इस संकष्टी चतुर्थी का व्रत संपन्न किया। इस व्रत के दिव्य प्रभाव और पुण्यबल से श्री कृष्ण ने बाणासुर की विशाल सेना को युद्ध में धूल चटा दी और उसके अहंकार को चूर करते हुए उसकी एक हजार भुजाओं को काट डाला। बाणासुर पर मिली यह विजय और अनिरुद्ध की सकुशल वापसी विघ्नराज व्रत के चमत्कारिक प्रभाव से ही संभव हुई थी। शास्त्र कहते हैं कि यह व्रत मनुष्य की सभी बाधाओं और विपत्तियों को समूल नष्ट कर देता है।



















