हिंदू पंचांग के मुताबिक भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि से आश्विन मास की अमावस्या तिथि तक का समय पितृ पक्ष के रूप में मनाया जाता है। इस पावन कालखंड में लोग अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान प्रकट करते हैं और उनकी आत्मिक शांति के लिए श्राद्ध, पिंडदान तथा तर्पण जैसे जरूरी कर्मकांड संपन्न करते हैं। धार्मिक आस्था है कि इन दिनों किए गए विधिवत अनुष्ठानों से पूर्वज संतुष्ट होकर अपने वंशजों को संपन्नता और शांति का वरदान प्रदान करते हैं। हालांकि, इन कर्मकांडों को पूरा करने के लिए शास्त्रों में बेहद स्पष्ट और कड़े नियम निर्धारित किए गए हैं, जिनका पालन न करने पर अनुष्ठान का पूरा फल व्यर्थ हो सकता है।
पितृ कर्म में लोहे के उपयोग पर निषेध
हरिद्वार स्थित नारायणी शिला के मुख्य पुजारी पंडित मनोज त्रिपाठी के अनुसार, पितृ पक्ष की पूरी अवधि में लोहे से निर्मित किसी भी प्रकार की वस्तु का न तो उपयोग करना चाहिए और न ही उसका दान करना चाहिए। ज्योतिषीय मान्यताओं में लोहे का संबंध शनि और राहु जैसे ग्रहों से जोड़ा गया है। इसके अलावा, लोहे को तामसिक ऊर्जा तथा नकारात्मक प्रभावों का प्रतीक माना जाता है। चूंकि श्राद्ध कर्म एक अत्यंत सात्विक और देवतुल्य आराधना की श्रेणी में आता है, इसलिए तामसिक मानी जाने वाली इस धातु का स्पर्श या प्रयोग अनुष्ठान की मूल भावना के प्रतिकूल बैठता है।
भोजन और तर्पण में अशुद्धि का खतरा
पंडित मनोज त्रिपाठी बताते हैं कि अगर कोई जातक इन दिनों लोहे के बर्तनों में पितरों के लिए भोजन तैयार करता है, खाना परोसता है या फिर लोहे के पात्रों का दान करता है, तो इससे पितर अप्रसन्न हो जाते हैं। परंपरा के अनुसार, श्राद्ध अथवा तर्पण के समय लोहे के संपर्क में आने से अन्न और जल अशुद्ध तथा दूषित माने जाते हैं। ऐसा भोजन पितर स्वीकार नहीं करते और अतृप्त अवस्था में ही अपने लोक वापस लौट जाते हैं, जिसके चलते परिवार में पितृ दोष और अन्य परेशानियां उत्पन्न होने की आशंका रहती है।
किन धातुओं के बर्तनों का करें चयन
पितरों की तृप्ति और पूजा की पवित्रता बनाए रखने के लिए केवल शुद्ध धातुओं का ही चयन करने की सलाह दी जाती है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोज के लिए तांबा, पीतल, चांदी अथवा कांसा जैसी धातुओं से बने बर्तनों का ही उपयोग किया जाना चाहिए। इन पावन धातुओं के पात्रों के माध्यम से अर्पित किया गया जल और अन्न सीधे पितरों को तृप्त करता है और जातक को दीर्घकालिक पुण्य फल प्राप्त होता है।


















