अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इन दिनों फीफा को धमकाने के आरोपों से घिरे हैं. वजह है अमेरिकी स्ट्राइकर फोलारिन बालोगुन को वर्ल्ड कप के एक मैच में मिला रेड कार्ड, जिसे बाद में वापस ले लिया गया. आमतौर पर फुटबॉल में रेड कार्ड मिलते ही खिलाड़ी पर अगले मैच का बैन लग जाता है, लेकिन इस मामले में नियम पलट दिया गया. कहा जा रहा है कि यह फैसला ट्रंप की फीफा को दी गई धमकी की वजह से बदला गया. यह पूरा विवाद अभी सुर्खियों में है, मगर फुटबॉल इतिहास में एक ऐसा वर्ल्ड कप भी दर्ज है जहां एक तानाशाह सीधे टीम के ड्रेसिंग रूम में घुस गया था और खिलाड़ियों को धमका दिया था.
बालोगुन को मिला रेड कार्ड और फिर वापसी
यह पूरा बवाल तब शुरू हुआ जब वर्ल्ड कप के एक मुकाबले में अमेरिका के स्टार स्ट्राइकर फोलारिन बालोगुन को रेड कार्ड दिखाया गया. फुटबॉल के नियमों के मुताबिक रेड कार्ड मिलते ही खिलाड़ी अगले मैच के लिए अपने आप बैन हो जाता है, यह एक सीधा और तय नियम है जिसमें आमतौर पर कोई ढील नहीं दी जाती. लेकिन इस बार यह फैसला पलट दिया गया और बालोगुन का रेड कार्ड वापस ले लिया गया. इसी वापसी को लेकर आरोप लगे कि यह ट्रंप की फीफा को दी गई धमकी का नतीजा है. यही मुद्दा अभी फुटबॉल जगत में सबसे ज्यादा चर्चा में है.
1978 का वर्ल्ड कप और अर्जेंटीना की मुश्किल घड़ी
21 जून 1978 की तारीख फुटबॉल इतिहास के सबसे विवादित दिनों में गिनी जाती है. उस साल वर्ल्ड कप की मेजबानी खुद अर्जेंटीना कर रहा था, लेकिन टूर्नामेंट से बाहर होने का खतरा उसी के सिर पर मंडरा रहा था. अर्जेंटीना ने इटली, फ्रांस और हंगरी जैसी दमदार टीमों को हराकर अपनी ताकत दिखाई थी, फिर भी दूसरे ग्रुप स्टेज में अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी ब्राजील से पिछड़ रहा था. उस दौर का फॉर्मेट आज से बिल्कुल अलग था. न तो नॉकआउट मैच होते थे और न ही जीत पर 3 पॉइंट मिलने का चलन था. नियम सीधा था, ग्रुप में टॉप करने वाली टीम सीधे फाइनल में नीदरलैंड्स से भिड़ती.
गोल के गणित ने बढ़ाया दबाव
मैच शुरू होने से पहले तस्वीर साफ थी. ब्राजील 5 पॉइंट्स और +5 गोल डिफरेंस के साथ टेबल में सबसे ऊपर था, जबकि अर्जेंटीना 3 पॉइंट्स और +2 गोल डिफरेंस के साथ दूसरे नंबर पर खड़ा था. फाइनल का टिकट पक्का करने के लिए अर्जेंटीना के पास सिर्फ एक ही रास्ता बचा था, अपना आखिरी लीग मैच कम से कम 4 गोल के अंतर से जीतना. यह कोई मामूली टारगेट नहीं था, बल्कि मेजबान टीम पर बना भारी दबाव था.
मैच के शेड्यूल पर भी उठे सवाल
आमतौर पर आखिरी दौर के मुकाबले किसी भी तरह की गड़बड़ी रोकने के लिए एक ही समय पर खिलाए जाते हैं. लेकिन 1978 में फीफा ने इससे उलट फैसला लिया. संगठन को डर था कि अगर दोनों मैच एक साथ हुए तो दर्शक स्टेडियम आने के बजाय घर बैठकर टीवी पर मैच देखना पसंद करेंगे. इसी वजह से अर्जेंटीना का मैच ब्राजील के मैच के खत्म होने के बाद रखा गया. नतीजा यह हुआ कि अर्जेंटीना की टीम मैदान में उतरने से पहले ही पूरी तरह जान चुकी थी कि आगे बढ़ने के लिए उसे ठीक कितने गोल चाहिए.
6-0 की जीत और पहला वर्ल्ड कप खिताब
मैदान पर वही हुआ जिसकी शायद ही किसी को उम्मीद थी. अर्जेंटीना ने पेरू को 6-0 से रौंद दिया और गोल डिफरेंस में ब्राजील को पछाड़ते हुए फाइनल का टिकट अपने नाम कर लिया. इसके बाद फाइनल में अर्जेंटीना ने नीदरलैंड्स को 3-1 से हराकर अपना पहला वर्ल्ड कप खिताब जीत लिया. लेकिन यह जीत जितनी शानदार दिखी, उतनी ही विवादों में भी घिर गई और आज तक इस पर सवाल उठते रहे हैं.
ड्रेसिंग रूम में तानाशाह की सीधी एंट्री
दावों के मुताबिक मैच शुरू होने से ठीक पहले अर्जेंटीना के तानाशाह जॉर्ज राफेल विडेला खुद पेरू के ड्रेसिंग रूम में जा पहुंचे. उनके साथ उस समय अमेरिका के विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर भी मौजूद थे. वहां विडेला ने पेरू के तानाशाह का भेजा हुआ एक संदेश खिलाड़ियों को पढ़कर सुनाया, जिसमें दोनों देशों की पुरानी दोस्ती का हवाला दिया गया था. दिखने में यह एक सामान्य सा शुभकामना संदेश था, लेकिन खिलाड़ियों के लिए इसके पीछे छिपा मतलब साफ था, यह मैच हार जाने का इशारा भर था.
लोन और अनाज की मदद बनी सवालों की वजह
मैच खत्म होने के ठीक 10 दिन बाद अर्जेंटीना सरकार ने पेरू को एक बड़ा लोन दिया, वो भी नॉन-रिफंडेबल क्रेडिट के तौर पर, यानी इस रकम को कभी वापस चुकाने की जरूरत ही नहीं थी. इतना ही नहीं, मैच से ठीक पहले अर्जेंटीना ने पेरू को मुफ्त में 35 हजार टन अनाज भी भेजा था, जैसी मदद आमतौर पर किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा के समय ही भेजी जाती है. इन दोनों घटनाओं के आपस में जुड़े होने ने ही इस मैच को दशकों तक शक के घेरे में रखा.
आरोपों से इनकार, लेकिन सालों बाद कबूलनामा
अर्जेंटीना की सरकार और उसके खिलाड़ी हमेशा इन आरोपों को सिरे से खारिज करते रहे. उल्टा उनका दावा रहा कि ब्राजील ने पेरू के खिलाड़ियों को अर्जेंटीना को हराने के लिए रिश्वत देने की कोशिश की थी. पेरू के कुछ खिलाड़ियों ने भी हार की वजह थकान और टीम के भीतर आपसी मतभेद बताई. लेकिन सालों बाद तस्वीर का दूसरा रुख भी सामने आया. पेरू के स्टार खिलाड़ी जुआन कार्लोस ओब्लिटास, जोस वेलास्केज़ और जर्मन लेगुआ ने खुलकर स्वीकार किया कि उन्हें अर्जेंटीना सरकार की तरफ से रिश्वत और धमकियां दोनों मिली थीं. वेलास्केज़ ने तो एक कदम आगे जाकर उन खिलाड़ियों के नाम भी उजागर कर दिए जिन्होंने कथित तौर पर पैसे लिए थे, इस लिस्ट में उनके अपने कप्तान हेक्टर चुम्पिटाज़ का नाम भी शामिल था. हालांकि जिन खिलाड़ियों के नाम लिए गए, उन्होंने इन आरोपों से हमेशा साफ इनकार किया.











