भारत के सुप्रीम कोर्ट ने छात्रों के व्यक्तिगत डेटा की प्राइवेसी को लेकर बड़ी चिंता जताई है और आधार कार्ड से जुड़े इस डिजिटल एजुकेशनल रजिस्ट्री सिस्टम की समीक्षा करने के निर्देश दिए हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (CBSE) को निर्देश दिया है कि वह APAAR ID योजना से जुड़ी डेटा सुरक्षा चिंताओं की गहराई से जांच करे। अदालत ने स्पष्ट किया है कि इस डिजिटल पहचान प्रणाली को डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) अधिनियम, 2023 के कड़े सुरक्षा मानकों के पूरी तरह अनुकूल होना चाहिए।
डेटा सुरक्षा और प्राइवेसी पर न्यायिक निर्देश
इस मामले की कानूनी सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने CBSE को न केवल इस डिजिटल रजिस्ट्री में सुरक्षा खामियों का विश्लेषण करने का आदेश दिया, बल्कि ओडिशा हाई कोर्ट द्वारा पहले जारी किए गए दिशानिर्देशों को भी लागू करने का निर्देश दिया। अदालत का यह फैसला यह सुनिश्चित करने के लिए आया है कि देश भर के लाखों छात्रों की संवेदनशील जानकारी पूरी तरह सुरक्षित रहे और किसी भी तरह के अनधिकृत उपयोग से बची रहे। इस योजना को DPDP अधिनियम, 2023 के दायरे में लाकर अदालत ने यह संदेश दिया है कि शैक्षणिक बोर्डों को डेटा संग्रह और स्टोरेज के मामले में पूरी तरह से पारदर्शी और जवाबदेह होना होगा।
यह मामला अभिषेक बक्सी द्वारा दायर एक याचिका के बाद सामने आया है, जिसमें तर्क दिया गया था कि आधार से जुड़े इस एजुकेशनल रजिस्ट्री का मौजूदा ढांचा नागरिकों के प्राइवेसी के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है। याचिका में छात्रों के डेटा की सुरक्षा के लिए मजबूत सुरक्षा उपायों की कमी पर चिंता जताई गई थी और कहा गया था कि यह प्रणाली 'भूल जाने के अधिकार' (Right to be Forgotten) का उल्लंघन करती है। यह अधिकार किसी भी व्यक्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है जो चाहता है कि उसका पुराना डेटा काम पूरा होने के बाद डिजिटल डेटाबेस से हटा दिया जाए।
क्या है APAAR ID योजना?
इस योजना की शुरुआत साल 2023 में शिक्षा मंत्रालय द्वारा की गई थी। इसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के तहत सुझाए गए प्रशासनिक और रिकॉर्ड-कीपिंग सुधारों के हिस्से के रूप में लागू किया गया है। इसे 'वन नेशन, वन स्टूडेंट आईडी' (एक देश, एक छात्र पहचान पत्र) के रूप में भी जाना जाता है। इस योजना के तहत देश के हर छात्र को 12 अंकों का एक विशिष्ट और स्थायी पहचान नंबर दिया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य छात्रों के सभी शैक्षणिक रिकॉर्ड, उपलब्धियों और योग्यताओं को एक ही डिजिटल प्रोफाइल में सुरक्षित रूप से दर्ज करना है।
रजिस्ट्री के मुख्य लाभ और विशेषताएं
यह डिजिटल पहचान प्रणाली भारत में शैक्षणिक प्रबंधन को आधुनिक बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण सुविधाएं प्रदान करती है। यह छात्रों के शैक्षणिक दस्तावेजों के लिए एक सुरक्षित डिजिटल वॉलेट की तरह काम करता है। इस रजिस्ट्री के मुख्य फायदों में शामिल हैं
- केंद्रीय डिजिटल रिपोजिटरी: यह मार्कशीट, बोर्ड परीक्षा के सर्टिफिकेट, डिप्लोमा, डिग्री, स्कॉलरशिप और सह-पाठ्यचर्या (co-curricular) गतिविधियों के सर्टिफिकेट को एक ही स्थान पर सुरक्षित रखने का काम करता है।
- आसान ट्रांसफर सुविधा: जब छात्र एक स्कूल, कॉलेज या यूनिवर्सिटी से दूसरे संस्थान में जाते हैं, तो उनके शैक्षणिक इतिहास का वेरिफिकेशन और ट्रांसफर बहुत तेजी से और बिना किसी बाधा के हो जाता है।
- फर्जी दस्तावेजों पर लगाम: केंद्रीय स्तर पर सत्यापित (verified) डेटा होने के कारण नकली और डुप्लीकेट सर्टिफिकेट के मामलों में भारी कमी आती है।
- डिजीलॉकर से जुड़ाव: यह पूरी प्रणाली सुरक्षित डिजिटल प्लेटफॉर्म डिजीलॉकर के साथ जुड़ी हुई है, जिससे छात्र अपने दस्तावेजों को कभी भी और कहीं भी आसानी से देख और साझा कर सकते हैं।
- सरल प्रशासनिक प्रक्रिया: इससे छात्रों और शैक्षणिक संस्थानों दोनों के लिए कागजी काम बहुत कम हो जाता है और रिकॉर्ड का प्रबंधन आसान हो जाता है।
APAAR ID प्राप्त करने की चरण-दर-चरण प्रक्रिया
इस डिजिटल आईडी को प्राप्त करने के लिए छात्रों को अपने संबंधित स्कूल के माध्यम से एक निश्चित प्रक्रिया पूरी करनी होती है। इसमें निम्नलिखित चरण शामिल हैं
- छात्रों को अपने स्कूल जाकर अपनी बुनियादी जानकारी जैसे कि नाम, जन्म तिथि, लिंग, मोबाइल नंबर, माता-पिता का नाम और अपना आधार कार्ड नंबर जमा करना होता है।
- यदि छात्र नाबालिग है, तो स्कूल के लिए रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया शुरू करने से पहले उसके माता-पिता या कानूनी अभिभावक से लिखित सहमति लेना अनिवार्य है।
- स्कूल प्रशासन छात्र द्वारा दिए गए सभी दस्तावेजों और विवरणों की सत्यता की जांच करता है।
- सफल वेरिफिकेशन के बाद, 12 अंकों की विशिष्ट आईडी जेनरेट हो जाती है और इसे भविष्य के उपयोग के लिए छात्र के डिजीलॉकर खाते में जोड़ दिया जाता है।
सहमति का विवाद और ओडिशा हाई कोर्ट का फैसला
नाबालिग छात्रों के मामले में सहमति (consent) का मुद्दा इस योजना के केंद्र में रहा है। जब कोई छात्र नाबालिग होता है, तो उसका डेटा इकट्ठा करने से पहले माता-पिता की सहमति लेना कानूनी रूप से आवश्यक है। इस सहमति पत्र में स्पष्ट रूप से बताया जाता है कि छात्र का डेटा क्यों लिया जा रहा है, इसका उपयोग कैसे होगा और उनके शैक्षणिक रिकॉर्ड को कैसे सुरक्षित रखा जाएगा।
हालांकि, इस योजना के स्वैच्छिक (voluntary) होने को लेकर कुछ विवाद रहे हैं। पिछले साल ओडिशा हाई कोर्ट ने शिक्षा मंत्रालय को निर्देश दिया था कि वह इसके मॉडल सहमति पत्र में बदलाव करे। अदालत ने कहा था कि सहमति पत्र में माता-पिता को रजिस्ट्रेशन से इनकार करने या इसे अस्वीकार करने का स्पष्ट विकल्प मिलना चाहिए। हाई कोर्ट का मानना था कि यदि यह योजना स्वैच्छिक है, तो फॉर्म पर साफ शब्दों में लिखा होना चाहिए कि माता-पिता के पास इस सिस्टम से बाहर रहने (opt out) की पूरी आजादी है और ऐसा करने पर छात्र को किसी भी शैक्षणिक नुकसान का सामना नहीं करना पड़ेगा।



















