पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इस समय ऐतिहासिक रूप से अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। देश के भीतर घरेलू स्तर पर तेल और प्राकृतिक गैस का उत्पादन लगातार नीचे गिरता जा रहा है, जिसका सीधा असर यह हुआ है कि आम इस्तेमाल की बिजली से लेकर गाड़ियों के ईंधन तक के दाम आसमान छू रहे हैं। पाकिस्तान के सबसे बड़े लेकिन सबसे ज्यादा अशांत और पिछड़े माने जाने वाले बलूचिस्तान प्रांत की धरती के नीचे कुदरत का ऐसा बेशकीमती खजाना दबा हुआ है, जो पूरे देश की आर्थिक बदहाली को रातों-रात पलट सकता है। एक हालिया रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि पाकिस्तान भर में अब तक जितने भी कुएं खोदे गए हैं, उनमें से महज 6 फीसदी ही बलूचिस्तान की सीमा के भीतर आते हैं। इसका बेहद साफ मतलब यह है कि इस प्रांत के लगभग 94 फीसदी हिस्से और उसके भीतर छिपे असीम तेल व गैस भंडारों पर अब तक किसी की भी नजर नहीं पड़ी है और यह सारा खजाना पूरी तरह सुरक्षित और अनछुआ जमीन के नीचे ही दबा रह गया है।
जब बलूचिस्तान के बूते पर रोशन होता था पूरा देश
एक ऐसा दौर भी था जब बलूचिस्तान अकेला पूरे पाकिस्तान की ऊर्जा आवश्यकताओं की रीढ़ की हड्डी हुआ करता था। एक अखबार में छपे विस्तृत विश्लेषण के अनुसार, साल 1982 के दौरान अकेले बलूचिस्तान प्रांत से निकलने वाली गैस पाकिस्तान की कुल प्राकृतिक गैस की जरूरत का 82 फीसदी हिस्सा पूरा करती थी। उस समय इस पूरे तंत्र में सबसे बड़ा योगदान डेरा बुग्टी जिले का था, जहां सुई, लोटी, पीरकोह, उच और ज़िन जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण और बड़े गैस फील्ड्स स्थित हुआ करते थे। इनमें से भी मुख्य रूप से सुई गैस फील्ड से निकलने वाली गैस ने दशकों तक पाकिस्तान के घर-घर में चूल्हे जलाए और वहां के बड़े-बड़े उद्योगों को सुचारू रूप से चलाने में मदद की। हालांकि, वक्त बीतने के साथ-साथ यह भारी-भरकम योगदान लगातार घटता चला गया और स्थिति बेहद लाचारी वाली हो गई। साल 1982 में देश की कुल गैस सप्लाई में बलूचिस्तान की हिस्सेदारी जहां 82 फीसदी हुआ करती थी, वहीं साल 2005 में यह गिरकर केवल 25 फीसदी पर सिमट गई। वर्तमान हालात की बात करें तो आज भी बलूचिस्तान किसी तरह पाकिस्तान की कुल गैस सप्लाई का लगभग 20 फीसदी हिस्सा ही मुहैया करा पा रहा है।
94 फीसदी हिस्सा क्यों रह गया पूरी तरह अनछुआ
रिपोर्ट में इस बात का भी बेहद चौंकाने वाला खुलासा किया गया है कि पूरे पाकिस्तान में अब तक तेल और प्राकृतिक गैस की तलाश के मकसद से लगभग 1,250 कुएं खोदे जा चुके हैं। इसके बावजूद सबसे हैरान कर देने वाली बात यह है कि इनमें से बलूचिस्तान के हिस्से में केवल 6 फीसदी कुएं ही आए हैं, यानी आज भी 94 फीसदी विस्तृत इलाका खोजबीन से कोसों दूर अछूता पड़ा हुआ है। अब सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि इतना बड़ा और अमूल्य खजाना पैरों के नीचे होने के बावजूद पाकिस्तान आज तक इसका भरपूर इस्तेमाल क्यों नहीं कर पाया। इसकी सबसे बड़ी और मुख्य वजह पिछले दो दशकों से बलूचिस्तान में लगातार बद से बदतर होते सुरक्षा हालात हैं। बलूच आम जनता के मन में पाकिस्तान की केंद्रीय सरकार के खिलाफ भयंकर गुस्सा भरा हुआ है। वहां के स्थानीय लोगों का स्पष्ट आरोप है कि पाकिस्तान की सरकार और उसकी सेना मिलकर बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों को बेरहमी से लूटती है और उनका इस्तेमाल पंजाब तथा देश के अन्य हिस्सों को समृद्ध बनाने के लिए करती है, जबकि खुद बलूच जनता बदहाली और भीषण कंगाली में जीवन जीने को मजबूर है। इसी गहरी नाराजगी और असंतोष के चलते वहां बलूच स्वतंत्रता सेनानियों का प्रभाव काफी तेजी से बढ़ा, जिसके बाद से किसी भी तेल या गैस कंपनी के लिए उस क्षेत्र में जाकर काम करना सीधे तौर पर अपनी जान जोखिम में डालने के बराबर हो गया।
स्थानीय आबादी के हिस्से आई केवल अनदेखी और लाचारी
विश्लेषण में इस बात पर भी विशेष रूप से जोर दिया गया है कि जिन जिलों से बड़े पैमाने पर तेल और गैस का उत्पादन होता है, वहां मिलने वाली अकूत कमाई और स्थानीय क्षेत्र के विकास के बीच जमीन-आसमान का बहुत बड़ा अंतर साफ दिखाई देता है। बलूचिस्तान के जिन विशिष्ट इलाकों से हर साल अरबों रुपये मूल्य की गैस और तेल निकाला जाता है, वहां के मूल निवासी आज भी बुनियादी नागरिक सुविधाओं के लिए बुरी तरह तरस रहे हैं। तेल और गैस निकालने वाली कंपनियों से सरकार को हर साल भारी-भरकम रॉयल्टी, प्रोडक्शन बोनस और विभिन्न प्रकार के टैक्स के रूप में अरबों रुपये प्राप्त होते हैं, लेकिन इसके बावजूद डेरा बुग्टी और उसके आसपास के तमाम इलाके पाकिस्तान के सबसे अधिक पिछड़े और गरीब क्षेत्रों में गिने जाते हैं। इन इलाकों में स्थानीय आम जनता के लिए न तो ढंग के अस्पताल मौजूद हैं, न ही पढ़ने के लिए अच्छे स्कूल हैं और पीने के लिए साफ पानी का भी भारी संकट है। विडंबना यह है कि जिस सुई इलाके की गैस ने पूरे पाकिस्तान को सालोसाल ऊर्जा दी, उसी क्षेत्र के कई गांवों में आज की तारीख में भी गैस के कनेक्शन तक मुहैया नहीं कराए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, जब सरकारी तंत्र अपनी मूलभूत जिम्मेदारियों को पूरा करने में बुरी तरह विफल रहता है, तो स्थानीय नागरिकों के भीतर निराशा और खुद को देश से बेगाना समझने की भावना घर कर जाती है। यही मूल वजह है कि बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा जैसे प्रांतों में सरकार तथा सेना के खिलाफ सुलग रही बगावत की आग बुझने का नाम नहीं ले रही है।
क्या बिना शांति के कभी बाहर आ पाएगा यह छिपा हुआ खजाना
यदि पाकिस्तान सचमुच अपने देश में लगातार गिरते जा रहे तेल और प्राकृतिक गैस के उत्पादन को संभालना चाहता है, तो उसे सबसे पहले बलूचिस्तान के भीतर शांति और भरोसे का माहौल कायम करना होगा। हालांकि, यह स्पष्ट है कि शांति केवल बंदूकों के जोर पर या सैन्य कार्रवाई के माध्यम से कभी हासिल नहीं की जा सकती है। इसके लिए सबसे पहले बलूच समुदाय के साथ सच्चे अर्थों में संवाद और जुड़ाव स्थापित करना बेहद जरूरी होगा। जब तक बलूच जनता को उनके अपने ही संसाधनों पर उनका वैध अधिकार नहीं दिया जाएगा और उनके इलाकों में आधुनिक अस्पताल, गुणवत्तापूर्ण स्कूल तथा रोजगार के नए अवसर विकसित नहीं किए जाएंगे, तब तक दुनिया की कोई भी घरेलू या विदेशी कंपनी वहां सुरक्षित वातावरण में खुलकर काम नहीं कर पाएगी। अगर आने वाले समय में बलूचिस्तान में स्थायी शांति बहाल होती है और उस 94 फीसदी अनछुए हिस्से में नए सिरे से खोजबीन का काम शुरू किया जाता है, तो यह कदम न केवल पाकिस्तान के भीषण ऊर्जा संकट को पूरी तरह समाप्त कर सकता है, बल्कि देश को भारी-भरकम विदेशी मुद्रा खर्च करके महंगे दामों पर तेल-गैस आयात करने की मजबूरी से भी राहत दिला सकता है। लेकिन फिलहाल बलूचिस्तान का यह बेशकीमती खजाना पूरी तरह से सुरक्षा संकट की भेंट चढ़ चुका है और पाकिस्तान केवल अपनी अदूरदर्शिता और नासमझी के कारण भयंकर कंगाली के दौर से गुजरने को मजबूर है।


















