रात के सन्नाटे में जब नींद आंखों से कोसों दूर हो, तो सिरहाने रखी घड़ी किसी दुश्मन जैसी लगने लगती है। बिस्तर पर लेटते ही मन सोचता है, चलो कम से कम सात घंटे की नींद तो मिल ही जाएगी। लेकिन एक घंटा बीत जाने के बाद भी जब आंखें खुली रहती हैं, तो हिसाब घटकर छह घंटे पर आ जाता है, और छह घंटे कोई बहुत ज्यादा नहीं होते। फिर भी नींद न आए तो यह आंकड़ा छह से भी नीचे खिसकता जाता है, और आखिरकार इंसान बस लेटा-लेटा यही सोचता रहता है कि सुबह उसकी हालत कितनी खराब रहने वाली है।
अगर यह किस्सा आपको जाना-पहचाना लग रहा है, तो परेशान होने की जरूरत नहीं, ऐसा सिर्फ आपके साथ नहीं होता। नींद पर काम करने वाले वैज्ञानिक बरसों से एक बात को पहचानते आए हैं, जिसे वे नींद खोने के डर में नींद खोना कहते हैं। यह अनिद्रा को बढ़ाने वाला एक जाना-माना कारण है। जरूरी नहीं कि यही आपकी नींद की असली वजह हो, लेकिन यह मौजूदा दिक्कत को और गंभीर बना देता है।
कैसे बनता है यह दुष्चक्र
मान लीजिए किसी छोटी सी वजह से आपको नींद आने में परेशानी हो रही है। रात में घड़ी देख-देखकर तनाव बढ़ता है, नींद खराब होती है और अगले दिन थकान हावी रहती है। धीरे-धीरे सोने के वक्त से ही डर लगने लगता है, क्योंकि मन जानता है कि आज रात भी वही सिलसिला दोहराया जाएगा। यह एक ऐसा फंदा है जो अपने आप कसता चला जाता है।
इसी झंझट में उलझकर बहुत से लोग नींद की दवाओं का सहारा लेने लगते हैं, जिनके अपने खतरे हैं। हर रात बेनाड्रिल जैसी दवा लेना सेहत के लिए ठीक नहीं है। साल 2023 में हुए एक अध्ययन में सामने आया कि घड़ी पर नजर टिकाए रखने की आदत, जिसे इसमें समय पर नजर रखने वाला व्यवहार कहा गया, लोगों को ऐसी दवाएं लेने की ओर धकेल सकती है जिनकी असल में उन्हें जरूरत ही नहीं होती। तो फिर इसकी जगह क्या किया जाए, आइए जानते हैं नींद के जानकार क्या सुझाते हैं।
घड़ी को नजरों से दूर कर दें
इस अध्ययन से जुड़े एक विशेषज्ञ का कहना है कि खुद से यह वादा करना बहुत काम आता है कि रात में समय नहीं देखेंगे। घड़ी का मुंह दूसरी तरफ घुमा दीजिए, उसकी डिस्प्ले ढक दीजिए, और अगर आप फोन पर वक्त देखते हैं तो उसे हाथ से दूर कहीं रख दीजिए। जब तक अलार्म नहीं बजा, तब तक रात ही है, और सच पूछिए तो इतना जान लेना ही काफी है।
घड़ी सामने न होने पर मन में यह डर उठ सकता है कि पता ही नहीं चलेगा कि पूरी नींद मिल रही है या नहीं। लेकिन असलियत यह है कि घड़ी सामने रहने पर भी आप घंटों का सही हिसाब नहीं लगा पाते। जिन घंटों को आप पूरी तरह जागा हुआ मान बैठते हैं, दरअसल उनमें भी आप बार-बार नींद में डूबते-उतराते रहते हैं और जितना सोचते हैं, उससे कहीं ज्यादा नींद ले चुके होते हैं।
ट्रैकर के आंकड़े तभी देखें जब वे मददगार हों
अगर आप घड़ी या फिटनेस ट्रैकर पहनकर सोते हैं जो आपकी नींद पर नजर रखता है, तो उसके आंकड़ों पर ध्यान सिर्फ तभी दीजिए जब वे आपको सुकून दें। सुबह उठकर आंकड़े देखकर अगर लगे कि अरे, मैंने तो सोचे से ज्यादा नींद ली, तो यह भरोसा जगाने वाली बात है। लेकिन अगर हर बार आंकड़े देखना उल्टा आपकी बेचैनी बढ़ाता है, तो ऐप खोलने की आदत छोड़ देना ही बेहतर है। वैसे भी ये ट्रैकर हमेशा शत-प्रतिशत सटीक नहीं होते, और अगर आपको लगे कि आपकी नींद खराब रही, तो भले ही असल में वह ठीक-ठाक रही हो, आप ज्यादा थकान महसूस कर सकते हैं।
नींद न आए तो शरीर को ढीला छोड़ दें
देर रात की इन घड़ियों के लिए एक तसल्ली देने वाली बात यह है कि जागते हुए भी अगर आप पूरी तरह शरीर को ढीला छोड़कर आराम करें, तो यह लगभग नींद जितना ही फायदेमंद होता है। आंखें मूंद लीजिए, मन को शांत कीजिए, और सबसे जरूरी बात, खुद को यह बताइए कि इस वक्त आपके शरीर को ठीक इसी की जरूरत है। इस तरह का आराम आपको ध्यान यानी मेडिटेशन जैसे कुछ लाभ दे सकता है, और एक धारणा तो यह भी है कि मेडिटेशन आपको नींद जैसे कुछ फायदे पहुंचाता है। यह बात सच हो या न हो, आधी रात को जागते हुए यह सोच मन को बड़ा सुकून देती है।
और अगर चिंता छोड़ने के लिए एक और वजह चाहिए, तो याद रखिए कि आराम करना खुद नींद तक पहुंचने के सबसे बेहतरीन रास्तों में से एक है। इसलिए आपको नींद आए या न आए, रात के बचे हुए घंटों को इस तरह आराम से बिताकर आप अपने शरीर और दिमाग दोनों की मदद ही कर रहे होते हैं।











