हरियाणा के फरीदाबाद शहर को भले ही स्मार्ट सिटी बनाने के दावे किए जा रहे हों, लेकिन सोतई गांव की एक सड़क विकास की इस चमकदार तस्वीर पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। इस इलाके में रहने वाले दर्जनों परिवार बीते 51 वर्षों से एक पक्की सड़क के निर्माण की आस में दिन काट रहे हैं। विडंबना यह है कि जिस कच्चे रास्ते से ग्रामीण हर रोज गुजरने को मजबूर हैं, उससे महज 25 से 30 मीटर की दूरी पर जेवर एयरपोर्ट कनेक्टिविटी से जुड़े विशाल फ्लाईओवर का निर्माण कार्य चल रहा है। इसके बावजूद स्थानीय निवासियों के लिए आवागमन का यह प्राथमिक मार्ग आज भी कच्चा और बदहाल पड़ा है।
विशाल अवसंरचना के बगल में उपेक्षा का शिकार गांव
स्मार्ट सिटी फरीदाबाद के मुख्य मार्गों और शहरी चौराहों को जहां आधुनिक रूप दिया जा रहा है, वहीं सोतई गांव के भीतर अंदरूनी कनेक्टिविटी का हाल खस्ता बना हुआ है। जेवर एयरपोर्ट कनेक्टिविटी फ्लाईओवर की ढलान और उतार का हिस्सा इस रास्ते से करीब 100 मीटर के दायरे में आता है। इस विशाल बुनियादी ढांचा परियोजना के कारण आसपास की जमीनों और संपत्तियों के बाजार भाव में भारी उछाल आया है, परंतु इस कच्चे रास्ते की किस्मत नहीं बदली। बरसात का मौसम आते ही यह पूरा रास्ता कीचड़ में तब्दील हो जाता है, जिससे बच्चों, बुजुर्गों और महिला राहगीरों का पैदल निकलना तक दूभर हो जाता है।
1954 की चकबंदी से 2026 तक की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इस गांव में कच्चे मार्ग की समस्या का इतिहास काफी पुराना है। वर्ष 1954 में इस क्षेत्र में चकबंदी की प्रक्रिया पूरी हुई थी, लेकिन उस समय भी इस मार्ग को पक्का नहीं किया गया। वर्तमान में यहाँ बसे हुए परिवार मूल रूप से फरीदाबाद के पास स्थित दयालपुर गांव से ताल्लुक रखते हैं। इनके पूर्वजों ने वर्ष 1965 में सोतई गांव में कृषि और आवास हेतु भूमि खरीदी थी। इसके बाद वर्ष 1975 में इन परिवारों ने यहाँ स्थायी रूप से रहना शुरू किया था। वर्ष 1975 से लेकर वर्ष 2026 तक 51 साल का लंबा समय बीत चुका है, परंतु मार्ग की स्थिति जस की तस बनी हुई है।
ग्रामीण बबलू हुड्डा ने इस स्थिति पर दुख प्रकट करते हुए कहा, "1975 से 2026 तक 51 साल बीत चुके हैं, लेकिन रास्ते की हालत में कोई बदलाव नहीं आया।" उन्होंने याद दिलाया कि पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह कहा करते थे कि भारत की प्रगति का रास्ता देश के ग्रामीण क्षेत्रों से होकर ही गुजरता है। इसके अतिरिक्त, देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले सुरक्षा बलों में भी ग्रामीण पृष्ठभूमि के युवाओं का बड़ा योगदान रहता है। इसके बावजूद स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधि इस बुनियादी जरूरत की तरफ ध्यान देने में नाकाम रहे हैं।
ब्रिटिश काल के संदर्भ और ऐतिहासिक उपेक्षा
ग्रामीणों का कहना है कि आजादी से पहले अंग्रेजों के शासनकाल में सोहना के पास एक गांव को कच्चे रास्ते पर ही छोड़ दिया गया था, क्योंकि वहां के निवासी स्वतंत्रता संग्राम की क्रांतिकारी गतिविधियों में बढ़-चढ़कर भाग लेते थे। उस दौर में कागजों में उस गांव को कच्चे मार्ग वाला दर्जा दिया गया था। स्थानीय लोगों का सवाल है कि आजादी के इतने दशकों बाद आखिर किस कारण से इस रास्ते को प्रशासनिक व्यवस्था द्वारा उपेक्षित छोड़ दिया गया है। कई पंचवर्षीय योजनाएं आई और चली गईं, परंतु धरातल पर कोई सुधार दर्ज नहीं किया गया।
बहुस्तरीय मतदान के बावजूद जमीनी स्तर पर कोई सुधार नहीं
सोतई गांव में रहने वाले ये परिवार अपनी नागरिक जिम्मेदारियों को पूरी तरह निभाते हैं। वर्ष 2022 में सोतई गांव को फरीदाबाद नगर निगम की सीमा में शामिल कर लिया गया था, जिसके बाद से यहाँ नगर निगम का वार्ड पार्षद भी चुना जाता है। इसके अलावा, मूल रूप से दयालपुर गांव से जुड़े होने के कारण यहाँ के लोग दयालपुर के सरपंच पद के चुनाव में भी मतदान करते हैं। इसके साथ ही वे राज्य की विधानसभा और देश की लोकसभा के चुनावों में भी नियमित रूप से वोट डालते हैं। नगर निगम की तीसरी सरकार का कार्यकाल चल रहा है, फिर भी नेताओं और अधिकारियों की ओर से सिर्फ आश्वासन ही मिले हैं।
स्वयं के खर्च पर ईंटें बिछाने को विवश हुए निवासी
प्रशासनिक लापरवाही से परेशान होकर ग्रामीणों ने खुद ही अस्थायी समाधान तलाशने शुरू कर दिए हैं। सोतई गांव में जन्मे 26 वर्षीय मुकुल हुड्डा बताते हैं कि उनका जन्म इसी गांव में हुआ था और वे बचपन से इस रास्ते को इसी खस्ताहाल स्थिति में देखते आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि सड़क पर जलभराव और कीचड़ से बचने के लिए ग्रामीणों ने अपने निजी पैसों से ईंटें खरीदकर इस रास्ते पर बिछवाई हैं।
मुकुल हुड्डा ने स्थिति के बारे में जानकारी देते हुए कहा, "बचपन से ही मैं इस सड़क की दुर्दशा देखते आ रहा हूं।" उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि ग्रामीण अपनी तरफ से निजी खर्च करके ईंटें बिछाने और बारिश के बाद सड़क की मरम्मत का काम न करते, तो यहाँ से गुजरना पूरी तरह असंभव हो जाता। अनेक बार नगर निगम अधिकारियों, पार्षदों और स्थानीय नेताओं से गुहार लगाने के बावजूद इस 51 साल पुरानी समस्या का स्थायी समाधान अब तक नहीं निकल सका है।

















