जैन संप्रदाय के सबसे पवित्र पर्युषण पर्व के दौरान राजस्थान के सिरोही जिले में स्थित प्राचीन जैन देवालयों में धर्मप्रेमी जनता की भारी चहल-पहल देखी जा रही है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी ने अपने जीवनकाल में इस क्षेत्र में भ्रमण किया था। सिरोही की पावन धरा पर उनके चरण पड़ने की वजह से यह पूरा इलाका कई शताब्दियों से जैन धर्मावलंबियों के लिए एक प्रमुख केंद्र बना हुआ है। इस क्षेत्र में बिखरे कई सिद्धपीठ न केवल स्थापत्य कला की दृष्टि से अद्वितीय हैं, बल्कि उनके साथ अनेक पौराणिक कथाएं भी जुड़ी हुई हैं।
पावापुरी तीर्थ: स्थापत्य कला और जीव दया का संगम
सिरोही जिले की रेवदर तहसील के अंतर्गत आने वाला पावापुरी जैन तीर्थ श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। जैन समाज के प्रतिनिधि महावीर जैन के अनुसार यह स्थल संपूर्ण भारत में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। पावापुरी का मुख्य मंदिर भगवान शंकेश्वर पार्श्वनाथ तथा भगवान महावीर स्वामी को समर्पित किया गया है। मंदिर परिसर की उत्कृष्ट बनावट, दीवारों पर उकेरी गई प्राचीन कलाकृतियां और स्थानीय कलाकारों द्वारा बनाई गई मनमोहक चित्रकारी बरबस ही दर्शनार्थियों का ध्यान अपनी ओर खींच लेती हैं।
इस विशाल परिसर के भीतर भगवान श्री महावीर स्वामी का चौमुखा जल मंदिर, श्री अजीतनाथ भगवान केंद्र, सरस्वती मंदिर और पक्षीघर जैसे कई दर्शनीय स्थल बने हुए हैं। धार्मिक महत्व के साथ-साथ यह स्थान जीव दया और करुणा के लिए भी जाना जाता है। यहां बहुत बड़े पैमाने पर पशु कल्याण केंद्र संचालित होता है, जहां हजारों की संख्या में असहाय, बीमार और लावारिस गायों व मवेशियों की निरंतर देखभाल की जाती है।
बामनवाड़ जैन तीर्थ: 'कण कीलन उपसर्ग' और जीवित स्वामी की महिमा
पिंडवाड़ा तहसील के वीरवाड़ा गांव के निकट स्थापित बामनवाड़ जैन तीर्थ का धार्मिक ग्रंथों में विशेष उल्लेख है। जैन परंपरा के अनुसार इस मंदिर का निर्माण भगवान महावीर स्वामी के ज्येष्ठ भ्राता राजा नंदीवर्धन द्वारा करवाया गया था। जनश्रुति और धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक भगवान महावीर के कानों में कीलें ठोकने की अत्यंत पीड़ादायक घटना, जिसे 'कण कीलन उपसर्ग' कहा जाता है, इसी भूमि पर घटित हुई थी।
प्राचीन जैन साहित्यों में इस पावन स्थान का नाम 'ब्राह्मण वाटक' दर्ज है, जो समय बीतने के साथ परिवर्तित होकर बामनवाड़ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। इस मंदिर में भगवान महावीर स्वामी की मूंगे के समान लाल रंग की पद्मासन मुद्रा में विराजमान लगभग 60 सेंटीमीटर ऊंची अत्यंत प्रभावक प्रतिमा स्थापित है, जिसे श्रद्धालु 'जीवित स्वामी' के नाम से पूजते हैं। दूर-दराज से आने वाले यात्रियों की सुविधा के लिए मंदिर परिसर में सुसज्जित धर्मशाला और विशाल भोजनशाला की व्यवस्था उपलब्ध है।
नांदिया तीर्थ और चंडकौशिक की प्रसिद्ध कथा
सिरोही की पिंडवाड़ा तहसील में स्थित नांदिया गांव का जैन मंदिर भी एक बेहद पवित्र धरोहर माना जाता है। यहां स्थापित मूलनायक प्रतिमा के बारे में मान्यता है कि यह भगवान महावीर स्वामी के जीवनकाल में ही उनके भाई नंदीवर्धन ने निर्मित करवाई थी। इसी कारण इसे भगवान महावीर का सजीव स्वरूप माना जाता है।
मंदिर के समीप स्थित एक छोटी पहाड़ी का संबंध भगवान महावीर और विषधर सर्प 'चंडकौशिक' के प्रसिद्ध प्रसंग से जोड़ा जाता है। इसके अलावा, मंदिर की अद्भुत निर्माण शैली और परिसर में बने 52 देवकुलिकाओं के जिनालय भक्तों और पर्यटकों को समान रूप से आकर्षित करते हैं।
वीरवाड़ा और अजारी तीर्थ का सांस्कृतिक महत्व
जिले के अजारी और वीरवाड़ा गांव में स्थित प्राचीन मंदिर भी जैन संस्कृति के मुख्य स्तंभ हैं। अजारी तीर्थ में श्वेत संगमरमर से निर्मित भगवान महावीर स्वामी की अति सुंदर प्रतिमा मूलनायक के रूप में स्थापित है, और यह देवालय भी 52 जिनालयों से सुशोभित है। वहीं दूसरी ओर, प्राचीन काल में 'वीर कुलिका' या 'वीर वटक' नाम से जाने जाने वाले वीरवाड़ा क्षेत्र का महावीर मंदिर अपनी स्थापत्य कला और प्राचीनता के लिए प्रसिद्ध है।

















