देश में कोचिंग के सबसे बड़े केंद्र कोटा में हर साल लाखों छात्र डॉक्टर और इंजीनियर बनने का सपना लेकर पहुंचते हैं। लेकिन परीक्षाओं की इस कड़ी प्रतिस्पर्धा और लगातार बदलती लाइफस्टाइल का सीधा असर युवाओं के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। कोटा के जाने-माने आई सर्जन डॉ. सुरेश पांडे ने कोचिंग करने वाले छात्रों में बढ़ रही आंखों की बीमारियों और मानसिक तनाव को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। उनके मुताबिक, रात के समय देर तक जागकर पढ़ाई करने की आदत छात्रों को कई तरह की शारीरिक और मानसिक बीमारियों की तरफ धकेल रही है। इसका सीधा बुरा असर उनकी पढ़ाई और परीक्षा के नतीजों पर भी देखने को मिल रहा है।
आंकड़ों की नजर से समझें आंखों पर बढ़ता दबाव और शरीर की प्राकृतिक घड़ी का बिगड़ना
कोटा में पिछले बीस वर्षों से छात्रों का इलाज कर रहे डॉ. सुरेश पांडे ने बताया कि रात के समय स्मार्टफोन, टैबलेट और कंप्यूटर जैसी डिजिटल स्क्रीन पर लगातार पढ़ाई करने से छात्रों में डिजिटल आई स्ट्रेन का खतरा बहुत ज्यादा बढ़ गया है। मेडिकल की भाषा में इस बीमारी को कंप्यूटर विजन सिंड्रोम भी कहा जाता है। बिना किसी ब्रेक के लगातार स्क्रीन की तरफ देखते रहने से आंखों में सूखापन यानी ड्राई आई, जलन होना, भारीपन महसूस होना, सिरदर्द और आंखों के भीतर तेज दर्द होने जैसी शिकायतें आम हो चुकी हैं। डॉक्टर ने बताया कि कई छात्र रात के शांत माहौल में पढ़ाई करने के लिए सुबह 4 बजे तक जागते रहते हैं। लेकिन यह आदत हमारे शरीर की प्राकृतिक जैविक प्रणाली के बिल्कुल उलट है।
नींद की कमी से याददाश्त और परीक्षा प्रदर्शन पर असर
रात के समय देर तक जागते रहने से दिमाग में बनने वाले मेलाटोनिन हार्मोन का स्तर कम होने लगता है। इस हार्मोन की कमी से इंसान की पूरी स्लीप साइकिल यानी सोने का चक्र बुरी तरह प्रभावित होता है। लगातार नींद पूरी न होने यानी क्रॉनिक स्लीप डेप्रिवेशन के चलते कई होनहार छात्र भी परीक्षाओं में अपनी योग्यता के अनुसार प्रदर्शन नहीं कर पाते हैं। वैज्ञानिक रूप से, जब तक शरीर को पर्याप्त नींद नहीं मिलती, तब तक दिमाग शॉर्ट-टर्म मेमोरी यानी अल्पकालिक स्मृति को लॉन्ग-टर्म मेमोरी यानी दीर्घकालिक स्मृति में नहीं बदल पाता है। इसका नतीजा यह होता है कि छात्र जो कुछ भी पढ़ते हैं, उसे याद रखने में असमर्थ हो जाते हैं और परीक्षा के दौरान उसे समय पर रिकॉल यानी याद नहीं कर पाते।
कोटा के 40 फीसदी छात्र मायोपिया की चपेट में
छात्रों के रहन-सहन और खान-पान में आए बदलाव के कारण दृष्टि दोष की समस्या गंभीर रूप लेती जा रही है। डॉ. पांडे के अनुसार, खराब लाइफस्टाइल, फास्ट फूड खाने की आदत, शारीरिक गतिविधियों से दूरी और धूप में पर्याप्त समय न बिताने के कारण कोटा के लगभग 40 प्रतिशत छात्र मायोपिया यानी निकट दृष्टि दोष से पीड़ित हो चुके हैं। यह एक बेहद चिंताजनक स्थिति है जो आने वाले समय में और ज्यादा गंभीर रूप अख्तियार कर सकती है।
तनाव और बीमारियों से बचने के कारगर उपाय
छात्रों को तंदुरुस्त रहने और पढ़ाई में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए डॉ. सुरेश पांडे ने कुछ बेहद उपयोगी सुझाव दिए हैं। उन्होंने सलाह दी है कि छात्रों को रात में 10 या 11 बजे तक सो जाना चाहिए और सुबह जल्दी 3 या 4 बजे उठकर अपनी पढ़ाई करनी चाहिए। ऐसा करने से शरीर की जैविक घड़ी यानी सर्केडियन रिदम पूरी तरह संतुलित रहती है। इसके अलावा, लगातार कई घंटों तक बैठकर पढ़ने की बजाय 2-2 घंटे के छोटे सेशन में पढ़ाई करनी चाहिए और हर सेशन के बीच में थोड़ा ब्रेक जरूर लेना चाहिए। रोजाना कम से कम 10 से 15 मिनट धूप में बिताना और प्रकृति के बीच टहलना भी बेहद जरूरी है। धूप के संपर्क में आने से आंखों में डोपामाइन का स्तर बढ़ता है, जो मायोपिया के खतरे को काफी हद तक कम करता है। इसके साथ ही, रोजाना कम से कम 30 मिनट तक योग, प्राणायाम या व्यायाम करना शरीर और दिमाग दोनों के लिए फायदेमंद साबित होता है।
तनाव कम करने के लिए अपनाएं DOSE फॉर्मूला
मानसिक तनाव को पूरी तरह नियंत्रित करने के लिए शरीर में चार बेहद जरूरी हैप्पी हार्मोन का संतुलित मात्रा में निकलना जरूरी है। डॉक्टर पांडे ने इसे DOSE फॉर्मूला का नाम दिया है। उनके अनुसार, मूवमेंट ही मेडिसिन है यानी शारीरिक सक्रियता ही सबसे बड़ी दवा है। यदि छात्र हर दिन कम से कम आधा घंटा योग, व्यायाम या फिर प्राणायाम जैसी गतिविधियों को देते हैं, तो शरीर में इन चारों हैप्पी हार्मोन्स का स्राव संतुलित रूप से होता है। इससे न केवल मानसिक तनाव का स्तर घटता है, बल्कि नींद भी गहरी आती है। साथ ही, पढ़ाई में एकाग्रता बढ़ती है और याद रखने की क्षमता मजबूत होती है।











