वर्तमान दौर में महिलाओं के बीच थायराइड से जुड़ी बीमारियां तेजी से पांव पसार रही हैं। अगर आंकड़ों पर गौर किया जाए तो पुरुषों की तुलना में महिलाओं को इस बीमारी का शिकार होने का खतरा कई गुना ज्यादा होता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के सामने हमेशा से यह बड़ा सवाल रहा है कि आखिर महिलाओं को ही यह समस्या सबसे ज्यादा क्यों प्रभावित करती है। क्या इसके मूल में केवल शारीरिक और हॉर्मोनल बदलाव छिपे हैं या फिर इसके पीछे महिलाओं की जीवनशैली, स्वभाव और मन में दबी हुई भावनाएं भी बड़ी भूमिका निभाती हैं?
चिकित्सा विज्ञान और हॉर्मोनल असंतुलन की भूमिका
अमेरिकन थायराइड एसोसिएशन समेत तमाम वैश्विक स्वास्थ्य संगठनों के आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि महिलाओं में हाइपोथायराइडिज्म और ऑटोइम्यून थायराइड विकार पुरुषों के मुकाबले पांच से आठ गुना अधिक सामान्य रूप से पाए जाते हैं। इसके प्राथमिक कारणों में महिलाओं के शरीर के भीतर होने वाले जटिल हॉर्मोनल बदलाव जैसे कि गर्भावस्था, मासिक धर्म चक्र और मेनोपॉज के साथ-साथ उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली की बनावट को जिम्मेदार ठहराया जाता है। जब कोई व्यक्ति अत्यधिक दबाव या मानसिक तनाव से गुजरता है, तो उसके शरीर में कोर्टिसोल और एड्रेनालाईन जैसे स्ट्रेस हॉर्मोन का स्तर बढ़ने लगता है। यह बढ़ा हुआ कोर्टिसोल मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस-पिट्यूटरी-एड्रेनालाईन एक्सिस को सीधे तौर पर बाधित कर देता है, जिससे थायराइड हॉर्मोन्स यानी टीएसएच, टी3 और टी4 का संतुलन बिगड़ जाता है।
भावनाओं को दबाना और थायराइड का सीधा संबंध
चिकित्सकों का मानना है कि महिलाओं में थायराइड विकारों के मामले तेजी से बढ़ने के पीछे केवल शारीरिक कारक नहीं हैं, बल्कि यह उनकी लगातार बढ़ती जीवनशैली की भागदौड़, तनाव और भावनाओं को अंदर ही अंदर घोंटकर रखने की आदत से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। सीनियर कंसलटेंट और एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. आलोक गुप्ता का कहना है, “जब कोई महिला लंबे समय तक अपनी बात खुलकर नहीं कह पाती या मानसिक तनाव को अंदर ही अंदर घोंटती रहती है, तो इसका असर सीधे तौर पर उनके हॉर्मोनल संतुलन और थायराइड ग्लैंड पर पड़ता है।” जब महिलाएं पारिवारिक या सामाजिक कारणों से अपने गुस्से और अपनी बात को लगातार दबाती हैं, तो उनका तंत्रिका तंत्र हमेशा फाइट या फ्लाइट मोड में बना रहता है, जिसका बुरा असर हॉर्मोन व्यवस्था पर पड़ता है। प्राचीन परंपराओं और योग विशेषज्ञों के मुताबिक भी गले के हिस्से को संवाद का केंद्र माना जाता है और घुटन या संवाद की कमी इस क्षेत्र को प्रभावित करती है, जिसे आधुनिक विज्ञान मानसिक तनाव के शारीरिक प्रभाव के रूप में देखता है।
थायराइड बढ़ने के प्रमुख वैज्ञानिक और शारीरिक कारण
चिकित्सा विज्ञान के अनुसार महिलाओं में यह समस्या उत्पन्न होने के पीछे कुछ खास वैज्ञानिक वजहें होती हैं
- हॉर्मोनल बदलाव: महिलाओं के जीवन में प्यूबर्टी, गर्भावस्था और मेनोपॉज के दौरान एस्ट्रोजन तथा प्रोजेस्टेरोन हॉर्मोन में बड़े पैमाने पर फेरबदल होते हैं, जो थायराइड ग्रंथी को अत्यधिक संवेदनशील बना देते हैं।
- रोग प्रतिरोधक क्षमता: महिलाओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता पुरुषों की तुलना में ज्यादा जटिल होती है और हाशिमोटो थायराइडाइटिस जैसी ऑटोइम्यून बीमारी महिलाओं में सबसे आम मानी जाती है जिसमें शरीर की अपनी कोशिकाएं थायराइड पर हमला करने लगती हैं।
- तनाव और जीवनशैली: घर और दफ्तर के बीच संतुलन साधने की निरंतर दौड़ में महिलाएं अक्सर अपने मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा कर बैठती हैं, जिससे उनके शरीर का कोर्टिसोल स्तर गड़बड़ा जाता है।
बचाव और जीवनशैली में बदलाव के उपाय
विशेषज्ञों का कहना है कि इस स्थिति से निपटने के लिए केवल दवाइयों पर निर्भर रहना काफी नहीं होता, बल्कि अपनी दिनचर्या और आदतों में भी जरूरी बदलाव करने होते हैं। महिलाओं को अपनी भावनाओं को दबाने के बजाय अपनों के सामने खुलकर अपनी बात रखनी चाहिए या फिर जरूरत पड़ने पर थेरेपी की मदद लेनी चाहिए। इसके अलावा योग, ध्यान और नियमित व्यायाम को अपनी दिनचर्या में शामिल करके तनाव को प्रबंधित किया जा सकता है। साथ ही साल में कम से कम एक बार टीएसएच, टी3 और टी4 की रक्त जांच जरूर करवानी चाहिए ताकि समय रहते सही कदम उठाए जा सकें।





















