आधुनिक चिकित्सा पद्धति में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का दखल लगातार बढ़ रहा है, और अब यह महिलाओं में स्तन कैंसर की समय रहते पहचान करने में भी काफी मददगार साबित हो रहा है। स्तन के एक्स-रे यानी मैमोग्राम की रिपोर्ट का विश्लेषण करने में इस तकनीक के इस्तेमाल से शुरुआती स्तर पर ही बीमारी को पकड़ने की संभावनाएं मजबूत हुई हैं। इसके साथ ही ऐसी प्रणालियों पर भी शोध चल रहा है जो किसी महिला की मौजूदा सेहत और जरूरी जानकारी के आधार पर अगले पांच वर्षों के दौरान बीमारी उभरने के जोखिम का पहले ही आकलन कर सकें। अमृता हॉस्पिटल के ब्रेस्ट क्लीनिक की सीनियर कंसल्टेंट डॉ. श्वेता राजदान के अनुसार, यह आधुनिक तकनीक रोग की पहचान, गांठों के विश्लेषण और सुदूर इलाकों तक विशेषज्ञों की सेवाएं पहुंचाने में स्वास्थ्य तंत्र की बड़ी ताकत बन सकती है।
जांच की सटीकता में बीस फीसदी तक का इजाफा
स्तन कैंसर के मामलों में जितनी जल्दी बीमारी की पहचान होती है, मरीज के पूरी तरह ठीक होने की संभावना उतनी ही अधिक रहती है। मैमोग्राम की जांच में तकनीकी सहायता जुड़ने से डॉक्टरों को सूक्ष्म बदलावों को पकड़ने में सहूलियत मिल रही है। दुनिया भर में विभिन्न स्तरों पर किए गए चिकित्सीय अध्ययनों में यह पाया गया है कि मैमोग्राम के दौरान कंप्यूटर आधारित विश्लेषण का सहारा लेने पर कैंसर पकड़ने की दर में 15 से 20 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की जा सकती है। इससे रेडियोलॉजिस्ट को संदिग्ध टिश्यू की पहचान करने में अतिरिक्त स्पष्टता मिलती है और शुरुआती गांठें नजरअंदाज होने से बच जाती हैं।
पांच साल पहले खतरे का पूर्वानुमान और मौजूदा सीमाएं
वैज्ञानिकों ने ऐसे परिष्कृत एल्गोरिदम तैयार किए हैं जो मरीज के व्यक्तिगत और चिकित्सीय रिकॉर्ड को परख कर यह अनुमान लगा सकते हैं कि अगले पांच वर्षों में उसे स्तन कैंसर होने का कितना खतरा है। हालांकि, इस तरह की प्रणालियां अभी बड़े पैमाने पर परीक्षण के दौर से गुजर रही हैं और इन्हें सामान्य चिकित्सकीय अभ्यास में हर मरीज पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता है। इसके प्रयोग के लिए मरीज की स्पष्ट सहमति लेना कानूनी और नैतिक रूप से अनिवार्य है, साथ ही आकलन से सामने आने वाले संभावित जोखिमों और नतीजों के बारे में संबंधित व्यक्ति को विस्तार से समझाना भी जरूरी होता है ताकि किसी भी तरह का मानसिक तनाव न पैदा हो।
घने टिश्यू और बायोप्सी के मामलों में तकनीकी सहायता
कम उम्र की महिलाओं में स्तन के टिश्यू आमतौर पर काफी घने होते हैं, जिसके कारण साधारण मैमोग्राम में संदिग्ध गांठों और सामान्य टिश्यू के बीच अंतर करना डॉक्टरों के लिए काफी पेचीदा साबित होता है। इस स्थिति में यह तकनीक सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट करने में सहायक बनती है, जिससे यह समझना आसान हो जाता है कि दिखने वाली संरचना एक सामान्य टिश्यू है या कोई खतरनाक गांठ। इसके अलावा, किसी गांठ के कैंसरयुक्त होने की आशंका का विश्लेषण करके यह डॉक्टरों को यह तय करने में सहायता करती है कि मरीज को बायोप्सी की जरूरत है या नहीं। यद्यपि बायोप्सी कराने का अंतिम फैसला डॉक्टर ही मरीज की संपूर्ण शारीरिक स्थिति और अन्य जांचों के आधार पर लेते हैं, लेकिन इससे बेवजह की जाने वाली आक्रामक प्रक्रियाओं पर लगाम लगाने में सहायता मिलती है।
ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार
भारत के सुदूर और ग्रामीण क्षेत्रों में स्तन कैंसर को लेकर बुनियादी जागरूकता की भारी कमी देखी जाती है। इसी वजह से कई महिलाएं शरीर में गांठ महसूस होने के बावजूद समय पर अस्पताल नहीं पहुंचतीं और जब तक बीमारी सामने आती है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है। यदि ग्रामीण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों या छोटे अस्पतालों में मैमोग्राम की सुविधा दी जाए और वहां से डिजिटल डेटा को इस तकनीक तथा टेली-कंसल्टेशन के जरिए बड़े शहरों के विशेषज्ञों से साझा किया जाए, तो दूरदराज के मरीजों को भी तुरंत सटीक परामर्श मिल सकता है। संदिग्ध मामलों की प्राथमिक स्तर पर ही पहचान हो जाने से मरीजों को सही समय पर बड़े चिकित्सा केंद्रों में भेजा जा सकेगा। आगामी दस वर्षों के भीतर यह तकनीक पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव लाने की क्षमता रखती है।



















