उत्तराखंड की ऊंची पहाड़ियों में सदियों से कई ऐसी जड़ी-बूटियां उगती आई हैं, जिन्हें स्थानीय लोग सिर्फ खाने का जायका बढ़ाने के लिए ही नहीं, बल्कि छोटी-मोटी बीमारियों के घरेलू इलाज के लिए भी इस्तेमाल करते रहे हैं. आयुर्वेद में इनमें से कई पौधों को खास औषधीय गुणों वाला माना गया है और इनकी मांग आज भी बनी हुई है. रसोई के मसालों से लेकर दुर्लभ हिमालयी वनस्पतियों तक, यहां जानिए उत्तराखंड की वो 10 जड़ी-बूटियां, जो प्रकृति के खजाने जैसी हैं और सेहत के लिहाज से बेहद अहम मानी जाती हैं.
यह पूरी सूची पहाड़ के रसोईघर से लेकर आयुर्वेदिक दवाखानों तक फैली हुई है, जहां हर जड़ी-बूटी की अपनी अलग पहचान और उपयोगिता है.
खाने का जायका बढ़ाने वाली पहाड़ी जड़ी-बूटियां
जखिया उत्तराखंड की सबसे मशहूर जड़ी-बूटियों में गिनी जाती है. पहाड़ी घरों में दाल और सब्जियों में इसका तड़का लगाना आम बात है. इसमें प्रोटीन, फाइबर के साथ-साथ विटामिन ई और विटामिन सी जैसे पोषक तत्व मौजूद होते हैं, जिस वजह से इसे पाचन तंत्र के लिए लाभकारी माना जाता है. पहाड़ के लोग इसे अपने रोजमर्रा के खाने का हिस्सा बना चुके हैं. अगर कभी उत्तराखंड घूमने का मौका मिले, तो जखिया जरूर खरीदनी चाहिए, क्योंकि यह स्वाद के साथ-साथ सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद मानी जाती है.
जम्बू भी प्याज की ही प्रजाति का एक सुगंधित पौधा है, लेकिन यह सिर्फ ऊंचे हिमालयी इलाकों में ही उगता है. उत्तराखंड में इसे दाल, सब्जी, सूप और अचार में तड़के के तौर पर डाला जाता है. स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक जम्बू सर्दी-जुकाम, पेट की दिक्कतों, बुखार और पाचन में राहत देने वाला माना जाता है. इसकी खुशबू और स्वाद ही पहाड़ी खाने को बाकी जगहों के खाने से अलग बनाते हैं.
गंदरायण की जड़ों और तनों को सुखाकर मसाले के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. यह सिर्फ भोजन का स्वाद ही नहीं बढ़ाता, बल्कि पाचन सुधारने, एसिडिटी कम करने और कब्ज से राहत दिलाने में भी सहायक माना जाता है. पहाड़ी इलाकों में बच्चों के पेट दर्द के घरेलू इलाज के तौर पर भी इसका इस्तेमाल किया जाता रहा है. यही वजह है कि स्थानीय लोगों के बीच इसका महत्व आज भी बना हुआ है.
दिमाग तेज करने और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली वनस्पतियां
ब्राह्मी हिमालय की सबसे प्रसिद्ध औषधीय वनस्पतियों में शामिल है, जिसे आयुर्वेद में सीधे-सीधे ब्रेन बूस्टर कहा जाता है. माना जाता है कि यह याददाश्त बढ़ाने, मानसिक तनाव कम करने और एकाग्रता सुधारने में मदद करती है. इसके अलावा कफ और त्वचा से जुड़ी दिक्कतों में भी इसका इस्तेमाल होता है, साथ ही यह शरीर को ठंडक देने वाली भी मानी जाती है. आयुर्वेद में ब्राह्मी को खास दर्जा हासिल है और कई औषधियों में इसे शामिल किया जाता है.
तुलसी सिर्फ उत्तराखंड ही नहीं, पूरे भारत की सबसे मशहूर औषधीय वनस्पतियों में से एक है. आयुर्वेद में इसे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली जड़ी-बूटी माना गया है. सर्दी-जुकाम, खांसी, गले की खराश और वायरल संक्रमण से निपटने के लिए तुलसी का इस्तेमाल सदियों से होता आया है. उत्तराखंड के कई घरों में तुलसी का पौधा धार्मिक और औषधीय, दोनों वजहों से लगाया जाता है.
जटामांसी भी हिमालय के ऊंचे इलाकों में पाई जाने वाली एक जानी-मानी औषधीय वनस्पति है. आयुर्वेद में इसे मानसिक तनाव, थकान, अनिद्रा और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी परेशानियों में उपयोगी बताया गया है. इसकी जड़ों का इस्तेमाल कई आयुर्वेदिक दवाओं के साथ-साथ सुगंधित उत्पादों में भी किया जाता है. हिमालय की यह दुर्लभ जड़ी-बूटी अपने औषधीय गुणों की वजह से आज भी बेहद कीमती मानी जाती है.
आयुर्वेदिक चिकित्सा में अहम भूमिका निभाने वाली जड़ी-बूटियां
कूट उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण औषधीय पौधा है. इसकी जड़ों और तनों का इस्तेमाल आयुर्वेदिक औषधियों को बनाने में किया जाता है. इसे सूजन, अस्थमा, मुंह के छालों, पाचन से जुड़ी समस्याओं और शारीरिक कमजोरी में लाभकारी माना जाता है. लंबे अरसे से पहाड़ी क्षेत्रों में इसे घरेलू उपचार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा है, और आयुर्वेदिक चिकित्सा में इसकी मांग लगातार बनी रहती है.
कुटकी हिमालय की दुर्लभ औषधीय जड़ी-बूटियों में शुमार है. आयुर्वेद में इसे लीवर की दिक्कतों, गले की खराश, श्वसन रोगों और पाचन संबंधी परेशानियों के लिए फायदेमंद बताया जाता है. कई आयुर्वेदिक दवाओं में कुटकी का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन विशेषज्ञों की सलाह है कि इसका सेवन हमेशा किसी योग्य चिकित्सक की राय लेने के बाद ही करना चाहिए.
राज्य वृक्ष बुरांश और बेशकीमती कीड़ा जड़ी
उत्तराखंड का राज्य वृक्ष बुरांश अपने चमकदार लाल फूलों और औषधीय गुणों के लिए दूर-दूर तक मशहूर है. इसके फूलों से बनने वाला शरबत गर्मियों के मौसम में खासा लोकप्रिय होता है और इसे शरीर को ताजगी देने के साथ-साथ श्वसन तंत्र मजबूत करने में सहायक माना जाता है. आयुर्वेद में भी बुरांश का इस्तेमाल कई औषधियों में किया जाता है. देवभूमि घूमने आने वाले पर्यटक अक्सर इसका रस और अन्य उत्पाद अपने साथ ले जाना पसंद करते हैं. अब पहाड़ों में बुरांश की चाय समेत कई तरह के उत्पाद भी मिलने लगे हैं, जिनका सेवन सेहत के लिए बेहद लाभदायक बताया जाता है.
यारसा गम्बु, जिसे आमतौर पर कीड़ा जड़ी के नाम से जाना जाता है, उत्तराखंड के पिथौरागढ़, धारचूला और मुनस्यारी के ऊंचे हिमालयी इलाकों में पाई जाती है. इसे शक्तिवर्धक माना जाता है और कुछ पारंपरिक औषधीय उपयोगों के लिए भी जाना जाता है. इसकी अंतरराष्ट्रीय मांग इतनी ज्यादा है कि इसकी कीमत लाखों रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है. यही वजह है कि यारसा गम्बु स्थानीय लोगों की आजीविका का भी एक बड़ा जरिया बन चुकी है.











